मेरी आवाज़ को बंद न करो वरना ……….

आज आलोचना की हर आवाज़ कुचली जा रही है. यह रेंगता हुआ फ़ासीवाद है.

सवाल यह भी नहीं है कि पुण्यप्रसून कितने महान हैं. हमें आज सबसे पहले देश में लोकतंत्र को कुचले जाने की फ़िक्र है. इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे मसले बेमानी हो गये हैं….

उज्ज्वल भट्टाचार्य

यह इस बात की चिंता नहीं है कि पुण्य प्रसून के घर में आज चुल्हा जलेगा या नहीं. पत्रकारों का आर्थिक शोषण, उनकी मनमानी छंटनी सबसे पहले उनके संगठनों का मामला है, और तभी राजनीति जगत का.

सवाल यह भी नहीं है कि पुण्यप्रसून कितने महान हैं.

हमें आज सबसे पहले देश में लोकतंत्र को कुचले जाने की फ़िक्र है. इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे मसले बेमानी हो गये हैं.

आज आलोचना की हर आवाज़ कुचली जा रही है. यह रेंगता हुआ फ़ासीवाद है.

यह ज़रूरी नहीं है कि वाजपेई, खांडेकर व अभिसार शर्मा के साथ हमारी सहानुभूति हो.

वे हमारे विरोध और प्रतिरोध के सिपाही नहीं हैं; उसके केंद्र में नहीं हैं; उसके प्रतीक नहीं हैं.

व्यवस्था को लोकतंत्र मानते हुए वे उसके अंग हैं. इस लोकतंत्र के बारे में उनकी ग़लतफ़हमी है. यह एक प्यारी और ज़रूरी ग़लतफ़हमी है. यह – अंग्रेज़ी में कहा जाय तो – snobbery of intellect and creativity है, जिसके बिना हमारा सामुदायिक जीवन बेहद ग़रीब हो जाएगा.

इस snobbery के चलते वे इस व्यवस्था में अपनी एक भूमिका देखते हैं : सवाल करने की भूमिका, आलोचना करने की भूमिका, सत्यान्वेशी की भूमिका. व्यवस्था के अंग के रूप में.

व्यवस्था का इस रूप में अंग बनने की उनकी भूमिका को नकारा गया है. हमारी व्यवस्था आज उस मोड़ पर है, जहां सवालों का, आलोचना का, सच्चाई को कुरेदने की कोशिशों का गला दबाया जा रहा है.

और यही हमारी विरोध के, प्रतिरोध के केंद्र में है.

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