झारखंड प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ी मौजूदा सरकार की समस्या है?

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ी: क्या यह किसी एक सरकार की देन है?

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों को लेकर एक बार फिर छात्रों का गुस्सा सड़कों पर है। JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

मौजूदा विवाद के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज़ हैं। विपक्ष , हेमंत सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि वह छात्रों से बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की कोशिश कर रही है।

लेकिन सवाल, क्या झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ी सिर्फ़ मौजूदा सरकार की समस्या है? नहीं। झारखंड के गठन यानी वर्ष 2000 के बाद से ही JPSC की भर्ती परीक्षाएं किसी न किसी विवाद से घिरती रही हैं। कभी परिणामों पर सवाल उठे, कभी उत्तर कुंजी पर विवाद हुआ, कभी इंटरव्यू में दिए गए अंकों को लेकर सवाल उठे और कभी परीक्षा प्रक्रिया अदालत तक पहुंची। 2026 में सामने आई एक विस्तृत पड़ताल में भी कहा गया है कि JPSC की लगभग हर बड़ी सिविल सेवा परीक्षा के साथ किसी न किसी तरह का विवाद जुड़ा रहा है।

कहानी बहुत पुरानी है

आज JPSC और JSSC को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनकी जड़ें मौजूदा सरकार से काफी पहले की हैं। वर्ष 2012 में झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC की स्थापना के बाद अब तक हुई परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच CBI से कराने का आदेश दिया था। अदालत के सामने परीक्षा और चयन प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियों के आरोप रखे गए थे।

विशेष रूप से दूसरी JPSC सिविल सेवा परीक्षा का मामला बेहद गंभीर था। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक़, विजिलेंस की प्रारंभिक जांच में 172 चयनित उम्मीदवारों में से 37 की उत्तर पुस्तिकाओं और इंटरव्यू रिकॉर्ड की नमूना जांच की गई, जिसमें 19 उम्मीदवारों के चयन को प्रथम दृष्टया संदिग्ध पाया गया था। इसके बाद मामले की CBI जांच का रास्ता खुला।

CBI ने बाद में नियुक्तियों में अनियमितता को लेकर मामले दर्ज किए। इनमें तत्कालीन JPSC अध्यक्ष और आयोग के सदस्यों सहित कई लोगों के नाम सामने आए थे।

इसका मतलब साफ़ है, भर्ती परीक्षाओं पर सवाल आज पहली बार नहीं उठे हैं।

फिर किसी एक पार्टी को जिम्मेदार ठहराना कितना सही?

यहीं से राजनीति और असली समस्या अलग-अलग दिखाई देने लगती है। झारखंड में अलग-अलग दौर में अलग-अलग राजनीतिक गठबंधन और दल सत्ता में रहे हैं। लेकिन JPSC-JSSC जैसी संस्थाओं की प्रशासनिक संरचना, परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्र तैयार कराने वाली एजेंसियां, परिणाम तैयार करने की व्यवस्था और निगरानी का ढांचा लंबे समय तक बना रहा। इसलिए हर विवाद के बाद सिर्फ़ यह कहना कि “यह उस पार्टी की सरकार का घोटाला है”, समस्या की पूरी तस्वीर सामने नहीं रखता।

मिसाल के तौर पर, 2012 में जिस JPSC विवाद पर हाईकोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया था, वह मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के समय का मामला नहीं था। यानी परीक्षा व्यवस्था में संस्थागत कमज़ोरियां बहुत पहले से मौजूद थीं।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पुरानी समस्या होना किसी मौजूदा सरकार को जवाबदेही से मुक्त नहीं करता। जिस सरकार के कार्यकाल में कोई परीक्षा आयोजित होती है, उस सरकार की जिम्मेदारी है कि परीक्षा निष्पक्ष हो, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहे, परीक्षा केंद्रों की निगरानी हो और किसी शिकायत पर समय रहते कार्रवाई हो।

हेमंत सोरेन सरकार के सामने मौजूदा चुनौती

आज की स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि मौजूदा विवाद सीधे JPSC और JSSC की विश्वसनीयता से जुड़ गया है। 2024 के JSSC-CGL परीक्षा को लेकर कथित पेपर लीक के आरोप लगे थे। मामला अदालत तक पहुंचा। हालांकि झारखंड हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के फैसले में यह भी दर्ज है कि SIT को संगठित तरीके से वास्तविक प्रश्नपत्र लीक होने का पर्याप्त सबूत नहीं मिला था

जांच में यह जरूर सामने आया कि कुछ आरोपियों ने अभ्यर्थियों से पैसे ऐंठने के लिए प्रश्नपत्र और उत्तर उपलब्ध कराने का दावा किया था। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि कई सवाल पिछले वर्षों के SSC-CGL और अन्य परीक्षाओं के प्रश्नों से दोहराए गए थे। इसलिए “पेपर लीक साबित हो गया” कहना उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से अधिक मजबूत दावा होगा।

यानी यहां भी तथ्य और आरोप को अलग रखना जरूरी है। लेकिन छात्रों की बेचैनी सिर्फ़ किसी एक पेपर के लीक होने या न होने से पैदा नहीं हुई है।उनका बड़ा सवाल है, क्या उन्हें उस व्यवस्था पर भरोसा है जिसमें वे अपनी ज़िंदगी के कई साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा रहे हैं?

14वीं JPSC परीक्षा ने विवाद को फिर भड़का दिया

2026 में 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा को लेकर विवाद ने पुराने सवालों को फिर जिंदा कर दिया। परीक्षा प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष और पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांग्ते का इस्तीफा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बना। इसके बाद छात्रों का आंदोलन और तेज़ हुआ।

अब सरकार पर दबाव बढ़ा और 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा रद्द करने की घोषणा की। सरकार ने दो अन्य JPSC परीक्षाओं को भी रद्द करने और TDPL द्वारा आयोजित परीक्षाओं की जांच कराने की बात कही।

यह फैसला छात्रों की एक बड़ी मांग को स्वीकार करने जैसा है, लेकिन इससे एक और सवाल पैदा होता है—अगर परीक्षा रद्द करनी पड़ी, तो जिम्मेदारी किसकी है?

सिर्फ़ परीक्षा रद्द कर देना समाधान नहीं है। जिन छात्रों ने महीनों और वर्षों तैयारी की, उनके समय और पैसे का क्या? जिनकी उम्र सरकारी नौकरी की अधिकतम सीमा के करीब पहुंच रही है, उनके अवसरों का क्या? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या अगली परीक्षा पर उन्हें भरोसा होगा?

BJP सरकार का दौर भी सवालों से परे नहीं, लेकिन तस्वीर थोड़ी अलग

Raghubar Das के नेतृत्व वाली BJP सरकार के लगभग पांच साल के कार्यकाल में JPSC की कोई सिविल सेवा परीक्षा आयोजित नहीं हुई थी। यानी उस दौर में JPSC सिविल सेवा परीक्षा में कथित पेपर लीक जैसी समस्या का सवाल ही अलग रूप लेता है—वहां बड़ी समस्या भर्ती प्रक्रिया के ठप या धीमे पड़ने की थी।

दूसरी तरफ़, हेमंत सोरेन सरकार ने सत्ता में आने के बाद लंबित भर्तियों को आगे बढ़ाने और कई वर्षों का बैकलॉग खत्म करने की कोशिश की। 7वीं से 10वीं JPSC परीक्षाएं संयुक्त रूप से आयोजित की गईं और बाद में 11वीं से 13वीं परीक्षा भी कराई गई।

असली समस्या सिस्टम है

इस पूरे मामले को अगर थोड़ा गहराई से देखें तो समस्या तीन स्तरों पर दिखाई देती है। पहला—संस्थागत कमजोरी। JPSC और JSSC जैसी संस्थाओं को राजनीतिक दबाव से मुक्त, तकनीकी रूप से मजबूत और जवाबदेह बनाना जरूरी है।

दूसरा—परीक्षा संचालन में बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता। अगर परीक्षा का बड़ा हिस्सा किसी निजी एजेंसी को दिया जाता है तो प्रश्नपत्र की सुरक्षा, डेटा की गोपनीयता, सर्वर सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और कर्मचारियों की जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

तीसरा—शिकायतों पर भरोसेमंद और स्वतंत्र जांच। जब छात्र खुद उसी व्यवस्था से जांच की मांग करने लगें जिसके खिलाफ शिकायत है, तो स्वाभाविक रूप से उनके मन में संदेह पैदा होता है। यही कारण है कि मौजूदा आंदोलन में छात्र स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं और विपक्ष CBI जांच की मांग उठा रहा है।

और यहां राजनीति से आगे बढ़कर एक सवाल पूछना होगा

अगर BJP सत्ता में थी तो क्या परीक्षा व्यवस्था की सारी कमियां BJP की थीं? अगर JMM-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में है तो क्या आज की हर गड़बड़ी सिर्फ़ JMM की है?

नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सरकारें जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि सही सवाल यह है—जिस सरकार के कार्यकाल में परीक्षा हो रही है, वह अपनी जिम्मेदारी कितनी ईमानदारी से निभा रही है?

और उससे भी बड़ा सवाल:  क्या सरकार बदलने के साथ परीक्षा व्यवस्था बदलती है, या वही सिस्टम, वही कमजोरियां और वही ठेकेदार/एजेंसियां नए राजनीतिक चेहरे के साथ आगे बढ़ते रहते हैं?

छात्रों को राजनीतिक भाषण नहीं, भरोसा चाहिए

झारखंड और पूरे देश का युवा किसी पार्टी से नौकरी नहीं मांग रहा। वह अपनी मेहनत के बदले एक निष्पक्ष मौका मांग रहा है। एक छात्र के लिए प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ़ दो-तीन घंटे का पेपर नहीं होती।इसके पीछे कई साल की पढ़ाई होती है। परिवार का खर्च , उम्र निकलने का डर होता है।

कई बार नौकरी छोड़कर तैयारी करने का फैसला होता है। और सबसे बढ़कर—एक उम्मीद होती है कि अगर वह मेहनत करेगा तो परिणाम उसकी मेहनत के आधार पर आएगा। जब वही छात्र परीक्षा के बाद पेपर लीक, सेटिंग, गलत उत्तर कुंजी, परिणाम विवाद या परीक्षा रद्द होने की खबर सुनता है, तो नुकसान सिर्फ़ एक परीक्षा का नहीं होता, उसका भरोसा टूटता है।

सरकारें बदलती रहीं, सवाल वही रहे

इसलिए झारखंड और देश की प्रतियोगी परीक्षाओं की धांदली को सिर्फ़ BJP बनाम JMM, या सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई बना देना सही नहीं है, बल्कि मौजूदा सरकार से उसके कार्यकाल की गड़बड़ियों का जवाब पूछा जाए, लेकिन पुराने रिकॉर्ड को मिटाकर पूरी समस्या का राजनीतिक ठीकरा सिर्फ़ एक पार्टी पर न फोड़ा जाए।

क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक की लड़ाई किसी पार्टी को हराने या किसी को जिताने की नहीं बल्कि  असली लड़ाई उस सिस्टम को बदलने की है, जिसमें एक गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र अपनी जवानी के कई साल सिर्फ़ इस भरोसे पर लगा देता है कि एक दिन उसकी मेहनत का नतीजा उसे मिलेगा।

 

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