जौहर यूनिवर्सिटी, जंतरमंतर पर धरना और आमरण अनशन

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Ali Aadil khan
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

अब देश में शिक्षा और शिक्षा केंद्रों की रक्षा के लिए लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा? साक्षरता और RESEARCH BASED PROGRAMMES पर दुनिया के मुल्क अपने बजट में लगतार इज़ाफ़ा कर रहे हैं. सरकारें आती और जाती रहती हैं या किसी देश में DICTATORSHIP भी अगर है तो EDUCATION पर तथा SCIENCE AND TECHNOLOGY PROGRAMMES में लगातार तरक़्क़ी हो रही है.

भारत में जबसे हिन्दू राष्ट्र का शोर हुआ है तब से सरकारों ने शिक्षा संस्थानों को बंद करने का सिलसिला जारी कर दिया है . मानो हिन्दू राष्ट्र में शिक्षा या शिक्षा संस्थानों की कोई ज़रुरत नहीं पड़ेगी.

और वैसे भी इस देश की जनता ने वर्तमान पार्टी को राम मंदिर के लिए और हिन्दू राष्ट्र के लिए वोट दिया है, शिक्षा के लिए तो नहीं दिया होगा। मंदिर मिल गया हिन्दू राष्ट्र भी बन गया, हर तरफ हिन्दू राष्ट्र का माहौल है .

फिलहाल देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा प्रणाली के सुधार और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर धरना चल रहा है. इसके पीछे राजनितिक घटनाक्रम क्या है पक्ष और विपक्ष किस दृष्टि से इस पूरे प्रकरण को देख रहे हैं.

राहुल गाँधी या उनकी विचारधारा बक़ौल उनके इस पूरे सरकारी नाटक को अलग तरह देखती है!! लेकिन अवाम चेंज चाहती है. उसी के लिए लोग अपनी क़ुरबानी दे रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया वाला २ करोड़ युथ कहाँ चला गया उसको जनता अभी भी ढून्ढ रही है यह अलग बहस है.

मगर सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का मक़सद शिक्षा में लगातार धान्द्ली और CORRUPTION, मौजूदा शिक्षा नीति और पूरा सरकारी SYSTEM में कमियों को दूर करने से सम्बंधित है. कुल मिलाकर सोनम वांगचुक सरकार की वर्तमान नीतियों से खासे नाराज़ तो हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले 10 वर्षों में 94000 स्कूलों में ताला लग जाना कोई छोटी घटना नहीं है. शिक्षा के सम्बन्ध में सरकार के रुख को समझने के लिए यह आंकड़ा काफी है.

फिलहाल उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। हाल ही में रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने विश्वविद्यालय परिसर की 40 में से 38 इमारतों को बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्मित बताते हुए उनको BULDOZ करने का आदेश जारी किया है। इसके बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और शिक्षा जगत में तीखी प्रतिक्रिया और विरोध देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा हालिया महीनों में प्रदेश में 52 इंजीनियरिंग COLLEGES भी बंद किये जा चुके हैं, लेकिन वो नक़्शा पास न करने की वजह से नहीं बल्कि इंजीनियरिंग में STUDENTS की दिलचस्पी कम होने की वजह बताई गई है. जिसके चलते कॉलेज का खर्च पूरा न होने की बात कहकर इनको बंद किया गया है.

NORTH INDIA में AMU के अलावा कोई बड़ा संस्थान ऐसा नहीं था जहाँ से ख़ास तौर से मुस्लिम समुदाय के STUDENTS को उच्च शिक्षा के अवसर मिल सकें. ऐसे में अली जोहर यूनिवर्सिटी पर सरकार की तरफ से बुलडोज़र की कार्रवाई को शिक्षित और हुनरमंद समाज की जगह अपराधी और भ्रष्ट समाज के निर्माण किये जाने के रूप में देखा जारहा है.

यह विवाद UNIVERSITY की ईमारत के BULDOZ होने का नहीं, बल्कि उन हजारों छात्रों के भविष्य का है जो इस विश्वविद्यालय में तालीम हासिल कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक़ तक़रीबन तीन हजार STUDENTS की पढ़ाई इस विवाद से मुतास्सिर हो सकती है।

समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे राजनीतिक बदले की भावना से उठाया जाने वाला क़दम बता रहे हैं। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय के संस्थापक और वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान के विरुद्ध लंबे समय से चल रही कानूनी और राजनीतिक कार्रवाई का यह एक नया चरण है।

कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि कोई कानूनी विवाद है तो उसका समाधान न्यायालय या जुर्माने के माध्यम से होना चाहिए, न कि ऐसी कार्रवाई से जिससे छात्रों का भविष्य प्रभावित हो।

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि किसी विश्वविद्यालय पर कार्रवाई आवश्यक है, तो उसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छात्रों की पढ़ाई, परीक्षाएं, डिग्री और भविष्य किसी तरह भी प्रभावित न हों।

कानून और शिक्षा – दोनों का संतुलन जरूरी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का पालन अनिवार्य है। लेकिन नाम और लिबास देखकर नहीं होना चाहिए. यदि भवन निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायप्रद होनी चाहिए। समाजवादी प्रवक्ता ने कहा खुद उत्तर प्रदेश की राजधानी लक्खनऊ की अधिकतर सरकारी और ग़ैर सरकारी इमारतें ग़ैर क़ानूनी बनी हुई हैं.

आखिर में कह सकते हैं कि, मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का मामला केवल एक विश्वविद्यालय का मामला नहीं है। यह कानून के राज, शिक्षा के अधिकार और सरकारी निष्पक्षता तीनों की परीक्षा है।

सरकार को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है, वहीं विश्वविद्यालय प्रबंधन को भी अदालत में अपना पक्ष रखने का पूरा हक़ है।

अंततः सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि किसी भी नफ़रत, द्वेष या धुर्वीकरण का शिकार छात्र न बनें। हमारा यक़ीन है कि उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षा और ज्ञान विरोधी सरकार के ठप्पे से बचने की कोशिश करेगी.

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