अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के लिए शिमला तैयार, गीतकार गुलजार समेत कई हस्तियां पहुंचीं.

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अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव गुरुवार से हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में आयोजित किया जा रहा है। इसमें देश भर से 425 से अधिक लेखक, विद्वान, अनुवादक, फिल्मकार, कलाकार और पत्रकार भाग लेंगे।

इसमें भाग लेने के लिए बॉलीवुड के जाने-माने गीतकार गुलजार समेत कई गण्यमान्य प्रतिभागी शिमला पहुंच गए हैं। इस उत्सव का आयोजन भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी संयुक्त रूप से कर रहे हैं।

इस आयोजन में हिमाचल प्रदेश भाषा एवं संस्कृति विभाग भी सहयोग कर रहा है। बुधवार को साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव ने शिमला में पत्रकार वार्ता में कहा कि 16 से 18 जून के बीच यह देश का अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव होगा।इस उत्सव में 32 एलजीबीटीक्यू लेखक, 40 आदिवासी भाषाओं, 25 उत्तरी-पूर्वी क्षेत्रों, नौ प्रवासी भारतीय, नौ विदेशी लेखकों सहित 24 अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं के 300 लेखक उपस्थित रहेंगे, यानी 64 आदिवासी-भारतीय भाषाओं में संवाद से युक्त यह उत्सव होगा। शिमला के गेयटी हेरिटेज कल्चर कांप्लेक्स के अलावा रिज क्षेत्र में छह स्थानों पर हो रहे इस उत्सव में देश के वरिष्ठतम रचनाकारों से लेकर युवा पीढ़ी के लेखक और कलाकार शामिल होंगे।

इनमें 65 से ज्यादा कार्यक्रम होंगे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में पुस्तकों की भूमिका, साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन, मीडिया साहित्य जैसे विषयों के अलावा साहित्य और सिनेमा, भारतीय कालजयी कृतियां और विश्व साहित्य, आदिवासी लेखकों के समक्ष चुनौतियां, रचना पाठ जैसे विभिन्न कार्यक्रम होंगे। चर्चित नामों में बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलि श्री, गौतम घोष, एसएल भैरप्पा, सई परांजपे, मोहम्मद आरिफ खान, नमिता गोखले, सुरजीत पातर, रघुवीर चौधरी, विश्वास पाटिल, रंजीत हॉस्कोटे, पॉल जकारिया, चंद्रशेखर कंबार समेत कई गण्यमान्य लोग शिमला आ रहे हैं।

साहित्य अकादमी ने शिमला के ऐतिहासिक गौथिक सभागार से ब्रिटिश हुकूमत में भारत के प्रमुख रहे ‘वायसराय’ का नाम खुद से ही जोड़ दिया। अकादमी ने गेयटी थियेटर के गौथिक हाल का नाम वायसराय सभागार रखा है। यह नाम किस किताब में लिखा है, इसका जवाब अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव नहीं दे पाए। आजादी के अमृत महोत्सव की कड़ी में पहली बार शिमला में होने जा रहे इस अंतरराष्ट्रीय उत्सव के बीच भी अंग्रेजी हुकूमत का मोह नहीं छोड़ पाने पर सवाल उठ रहे हैं। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी के इस संयुक्त आयोजन की विश्व स्तर पर चर्चा है। यह उत्सव गेयटी थियेटर के सभी प्रमुख सभागारों में हो रहा है। अंग्रेजों के जमाने में जिस हाल में नाटक होते थे, उसे गौथिक सभागार जरूरत कहा जाता है, मगर वायसराय सभागार नाम इसे पहली दफा दिया गया है।वीरवार को पत्रकार वार्ता में अकादमी के सचिव के.

श्रीनिवासराव से सवाल किया तो उन्होंने कहा कि कहीं इसका उल्लेख होगा, तभी जोड़ा गया होगा। यह उल्लेख कहां है, वह इसे नहीं बता पाए। राज्य भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक पंकज ललित भी इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाए।

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