हमारे कायर और स्वार्थी नेतi

 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

दलित-हिंसा में लगभग 15 लोगों का मरना और सैकड़ों का घायल होना बहुत दुखद है। सर्वोच्च न्यायालय ने दलित अत्याचार निवारण कानून में जो संशोधन किए थे, यह आंदोलन उसके खिलाफ है। याने यह आंदोलन होना था, सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ लेकिन इसमें निशाना बनाया जा रहा है, मोदी सरकार को !

इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि यह दलितों का आंदोलन कम और मोदी-विरोधी ज्यादा है ? विरोधी नेताओं के पास मोदी-पार्टी के विरुद्ध न तो कोई ठोस मुद्दा है और न ही कोई प्रचंड नेता है। तो वे क्या करें ? और कुछ नहीं तो वे दलितों और आदिवासियों को ही अपनी तोप का भूसा बना दें। इस तथ्य के बावजूद बना दें कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डालकर उससे अनुरोध किया है कि वह उस दलित रक्षा कानून को कमजोर न बनाए।

अदालत का ताजा निर्देश था कि यदि किसी भी अनुसूचित व्यक्ति का अपमान, नुकसान और उस पर अत्याचार होने पर वैसा करनेवाले को तुरंत गिरफ्तार न किया जाए। उसे गिरफ्तार करने के पहले शिकायत की जांच हो और उच्चाधिकारी की सहमति मिलने पर ही उसे गिरफ्तार किया जाए। ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत भी दी जाए।

अदालत ने यह फैसला इसलिए किया कि अनुसूचितों पर अत्याचार के बहाने ब्लेकमेलिंग का धंधा जोरों से चल पड़ा था। ऐसे सौ मामलों में से लगभग 75 मामले अदालत में पहुंचने पर फर्जी सिद्ध हो जाते थे। मैं सोचता हूं कि इस तरह के कानून से दलितों पर होनेवाले अत्याचार में कमी नहीं आती है बल्कि वह बढ़ता ही जाता है। फर्जी मुकदमों से समाज में कटुता और तनाव फैलता है। लोगों के दिलों में घृणा भरती जाती है।

जो कानून अत्याचार रोकने के लिए बना है, वह स्वयं अत्याचारी बन जाता है। सभी दलों के नेताओं को अदालत के इस फैसले का समर्थन करना चाहिए था और देश के अनुसूचितों को समझाना चाहिए था कि यह फैसला उनके लिए कितना हितकर है। लेकिन हमारे नेताओं से बढ़कर कायर और स्वार्थी प्राणी कौन हैं ? ये वोट और नोट के गुलाम हैं। इनमें सच बोलने की हिम्मत नहीं है।

ये अनुसूचितों का भला नहीं, अपना भला चाहते हैं। अपने वोट और वो भी अंधे थोक वोट कबाड़ने में इन सभी दलों के नेताओं ने सभी मर्यादाओं को उल्लंघन कर दिया है। वे जातिवाद के राक्षस की रक्त-पिपासा भड़का रहे हैं। जब तक देश में से जन्मना जातिवाद खत्म नहीं होगा, अनुसूचितों पर अत्याचार होता रहेगा।

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