डूबती पत्रकारिता के सूरज की आखरी किरण कौन?

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अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

  • जालियाँवाला बाग हत्याकांड भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919(बैसाखी के दिन) हुआ था। …

देश में चल रही वर्तमान पत्रकारिता ,भक्तगिरि से देश शर्मिन्दा है विश्व में देश की पत्रकारिता को शर्मसार करने वाले क़िस्से चर्चा में है ।लेकिन आज बैसाखी पर्व के दिन ,,ब्रिटेन हुकूमत में ,भारत के सिक्ख भाइयों के सामूहिक नरसंहार को ,दंगा ,फसाद बताकर फ़र्ज़ी खबरे छापने ,,हुकूमत की गुलामी करने वाले पत्रकारों की शर्मसार पत्रकारिता का यादगार दिन है ।

अफ़सोस ऐसे घटिया ,बिकाऊ ,सरकारी सुविधाओं की गुलामी पर ,देश व विश्व को गुमराह कर ,सरकार का स्तुति गुणगान करने वाले पत्रकारों के खिलाफ देश की जनता ने तब भी आवाज़ नहीं उठाई थी अब भी नहीं उठाई है ।

लेकिन हाँ शहीद पत्रकार गोरीलंकेश की तरह ,बहादुर व निडर पत्रकार रवीशकुमार  और अभिसार की  तरह  ब्रिटेन हुकूमत में पत्रकार थे हनीमेंन ,उनके साथ भी इसी तरह की प्रताड़ना की गई थी ।

दोस्तों सिक्ख भाइयों का यह बैसाखी नरसंहार अंग्रेज़ो की एकतरफा सामूहिक हत्या का मामला था ,लेकिन हुकूमत के गुलाम पत्रकारों ने इस घटना की रिपोर्टिंग आज की गुलाम पत्रकारिता की तरह ही करते हुए ,इसे दंगा फसाद , क़ानून की बदहाली बताकर ,संतुष्टी कर ली थी ,

लेकिन उस वक़्त एक पत्रकार रविश कुमार ,अभिसार की तरह थे ,उन्होंने क़लम उठाई ,और उन्होने विश्व को 13 अप्रेल 1919 के इस नरसंहार की सच्चाई बताई ,और वेह थे पत्रकार हैनिमेन।

उस वक़्त भी ऐसे ही दमनकारी हाकम थे ,जिन्होने इस सच को उजागर करने पर ,हनीमेंन पत्रकार को दो साल के लिए जेल में डाल कर आवाज़ दबाने की कोशिश की ।

दोस्तों भारत की पत्रकारिता का अपना इतिहास रहा है ,अपना स्वाभिमान रहा है ,,यहां पत्रकारिता ने सत्ता पलटी है ,देश के स्वाभिमान को ज़िंदा किया है ,गरीब ,मज़लूमों को इंसाफ दिलवाया है ।गुजरात के दंगों का सच देश को बताया है ,लेकिन पत्रकारिता का पिछले पांच सालों में एक खतरनाक ,राष्ट्रविरोधी ,जन विरोधी ,पूंजीपति पोषक ,बिकाऊ दौर आया ,इस दौर में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ,सरकारी गुलाम होगई ।

उद्योगपतियों के घरानों ने अख़बार ,टी वी चैनल अपने गुणगान और चापलूसी के लिए ख़रीदे ।खुद सियासत में मंत्री से लेकर राजयसभा सदस्य तक बने। और फिर पत्रकारिता  ,सियासी घरानों की गुलाम ,व्यक्ति की गुणगान करने वाली भोंपू होगयी।

पत्रकारिता गूँगी बहरी और अपाहज हो गयी ,सब कुछ अपनी आंख से देख कर भी क़लम नहीं चला सकी ,पत्रकारिता लंगड़ी हो गयी ,घटनाये देखकर भी वहां नहीं जा सकी ,पत्रकारिता अंधी हो गयी घटनाये देखकर भी रिपोर्टिंग नहीं कर सकी ,लेकिन यह देश चमत्कारों का देश है ,जब जब भी यहाँ ज़ुल्म हुआ है यहां रावण पैदा हुआ है ,तो उसे मारने के लिए राम ने जन्म ज़रूर लिया है।

मीडिया आज सियासी पार्टियोँ,व्यक्तियों के विज्ञापन कर रही है ,,रूपये लेकर नफरत भड़काने ,, रूपये लेकर खबरें दबाने , खबरें चलाने,देश के गद्दारों ,क़ानून तोड़ने वालों को बचाने काा काम कर रही हे ।

देश के बड़े मीडिया घरानो को देश में नफरत,दंगे और साम्प्रदायिकता फेलाने के लिये बड़ी रक़म लेते cobra.com का operation आपके सामने है ।

साथ ही रवीश कुमार की दहाड़ ,अभिसार की पुकार ने ऐसे उद्योगपति तथाकथित पत्रकारों को बेनक़ाब कर दिया है जो journalism के नाम पर बदनुम दाग़ हें।

खेर पत्रकारिता के रावण के वध के लिए राम ज़रूर आएंगे ,लक्ष्मण ज़रूर आएंगे ,,पत्रकारिता के रावण की लंका को जलाने के लिए हनुमान ज़रूर आएंगे ऐसी हम देश वासियों की उम्मीद है ।और आज रवीश जैसे पत्रकार journalism के डूबते सूरज की उम्मीद की किरण नज़र आते हें।

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