चीनी मुसलमानो पर ढाये जा रहे ज़ुल्म पर इमरान खान का बड़ा बयान

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इमरान ख़ान चीन के वीगर मुसलमानों पर क्यों हैं ख़ामोश

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अपने मुल्क के हालात को संवारने के लिए काफी संजीदा हैं , और साथ ही अपने पड़ोसियों के साथ भी मसलों को हल करने के लिए दावे करते रहे हैं ।ये अलग बात है की उनसे पहले के प्रधान मंत्रियों ख़ास तौर पर नवाज़ शरीफ और आसिफ ज़रदारी पर इस बात का इलज़ाम है की उन्होंने पाकिस्तान की आर्थिक व्यवस्था को चरमरा कर रखदिया है या लूट लिया है , इन्ही अपराधों के जुर्म में वो जेल में हैं ।

ऐसे में जब दुनिया भर में कश्मीरियों पर अमानवीय और बेरहमी किये जाने का इलज़ाम सर्कार के सर पर लादा गया है तभी पाकिस्तान ने भी कश्मीर मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय बनाने के लिए शिद्दत इख़्तियार कर्ली है .

देखना यह है की क्या वास्तव में इमरान खान इंसानी और मिली बुन्यादों पर कश्मीरी अवाम के सहयोग की बात दुनिया भर में उठा रहे हैं या फिर इसके पीछे उनका भी अपना सियासी मफ़ाद है, क्योंकि पाकिस्तान भी आजकल भारत की तरह आर्थिक बोहरान का शिकार है और अवामी व् विपक्ष का दबाव भी है की हालात को नार्मल करने की सरकारी कोशिश नाकाम रही है.

हालाँकि यह सब पिछली नवाज़ की सर्कार की ग़लत नीतियों के नतीजे हैं , ठीक इसी तरह मोदी सर्कार हर नाकामी को पिछली सरकारों की ग़लत नीतियों का नतीजा बताकर अपना पल्ला झाड़ना चाहती है .

जबकि भारत में पिछली सरकार तो खुद मोदी सरकार ही थी ऐसे में किस तरह पिछली सरकार कहकर अपना पीछा मोदी सरकार छुड़ा सकती है ,और पूर्ण बहुमत से रही है किसी का कोई दखल न रुकावट , तो भारत की आर्थिक मंदीऔर पाकिस्तान की आर्थिक मंदी के कारण अलग अलग हैं , लेकिन अवाम के जज़्बात को भुनाने की सियासत लगभग एक जैसी है , दोनों ओर अवाम को मज़हबी जूनून में बहाकर उल्लू सीधा करने की रिवायत चली आरही है ।

आज जब हम पकिस्तान के प्रधान मंत्री से चीन के शिनजियांग प्रांत के वीगर मुसलमानो पर चीन द्वारा ढाये जा रहे ज़ुल्म पर सवाल करते हैं तो इमरान ख़ान का जवाब होता है अभी हम अपने मसाइल को सुलझाने में मसरूफ हैं और उन्हें नहीं पता है कि चीन में वीगर मुसलमानों का मसला क्या है?

तो फिर ऐसे में हमारा यह सवाल भी वाजिब नज़र आता है की तो फिर कश्मीरी मुसलमानो के मसले में आप क्यों दखल देते हो । इस पर वो अपन अपाला यह कहकर झाड़ते हैं की कश्मीर का मसला हमारा सियासी , सिफारती , सरहदी , सक़ाफ़्ती, और मिली मसला मसला है जबकि चीन के मुसलमानो का मसला मुख्तलिफ है ।

14 सितंबर को अल-जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में पत्रकार ने इमरान ख़ान से सवाल पूछा कि चीन में वीगर मुसलमानों के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर पश्चिम के देशों में काफ़ी आलोचना हो रही है। क्या आपने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इस मामले में कभी औपचारिक रूप से चर्चा की?

https://timesofpedia.com/ह्यूस्टन-में-मोदी-और-इमरा/

इस सवाल के जवाब में इमरान ख़ान ने कहा, ”आपको पता है कि हम अपने मुल्क के भीतर ही कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। मुझे इसके बारे में बहुत कुछ पता भी नहीं है।

हमारी सरकार पिछले एक साल से मुल्क की ख़राब अर्थव्यवस्था और अब कश्मीरियों पर ज़ुल्म के दर्द से जूझ रही है ।पर मैं इतना कह सकता हूं कि चीन हमारा सबसे अच्छा दोस्त है।” और वो अपनी अकलियतों के साथ जल्द ही इन्साफ करेगा ।

पिछले साल बीबीसी की पड़ताल में पाया गया था कि चीन ने अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में वीगर मुसलमानों के लिए नज़रबंदी बस्ती बना रखी है।चीन ने पिछले कुछ साल में ऐसी ही तमाम जेल सरीखी इमारतें शिनजियांग सूबे में बना डाली हैं

बीबीसी का कहना है की वो नज़रबंदी कैम्प को देखने से पहले दबानचेंग क़स्बे मे भी पहुंचा था। चीन ने इस बात से लगातार इनकार किया है कि उसने मुसलमानों को बिना मुक़दमा चलाए क़ैद कर के रखा है।

इस झूठ को छुपाने के लिए ही वो अपनी इस पृकिर्या को Re-education का नाम देकर दुनिया के सामने पर्दा डालने का काम करता रहा है ।

हालांकि वीगर मुसलमानो पर चीनी तशद्दुद का मामला भी दुनिया भर में उठ रहा है जबकि चीन इन आलोचनाओं के सुरों को दबाने और उनका मुक़ाबला करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान छेड़ चूका है , और अपनी बेगुनाही साबित करने में मसरूफ है ।

पाकिस्तान और चीन की दोस्ती जगज़ाहिर है। चीन पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के तहत 60 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। दूसरी तरफ़ पाकिस्तान पर चीन के अरबों डॉलर के क़र्ज़ भी हैं।

तीसरी बात ये कि पाकिस्तान कश्मीर विवाद में चीन को भारत के ख़िलाफ़ एक मज़बूत पार्टनर के तौर पर देखता है। ऐसे में पाकिस्तान चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ चुप रहना ही ठीक समझता है।

सत्ता के पुजारी या भिकारी , मौक़ापरस्त ,और लालची जानवर (सोशल एनिमल ) हैं ??

हालाँकि पाक का यह रुख मज़हबी और शरई तौर पर ग़लत है , ज़ुल्म तो ज़ुल्म है चाहे जो करे उसकी मुखालफत बहैसियत इस्लामी एटॉमिक जम्हूरी मुल्क पाक को चीन को भी बात करनी ही चाहिए ।

अफ़सोस का मक़ाम यह है की फलस्तीनी , रोहिंग्या , और कश्मीरी मुसलमानो पर ज़ुल्म के मामले में आज तक सभी मुस्लिम मुल्क खामोशी इख़्तियार किये हुए हैं , अब यह उनकी सियासी मजबूरी है या ऐश परस्ती यह तो वही बता सकते हैं किन्तु उनकी खामोशी एक रोज़ उन
अय्याश और मफद परास्त हाकिमों को भी सबक़ का निशाँ बना देगी जैसा की सद्दाम और क़ज़ाफ़ी के मामले में दुनिया ने देखा ।हालांकि सद्दाम और क़ज़ाफ़ी अमेरिका और योरुपी देशों की आँख में आँख डालकर बात करने से गुरेज़ नहीं करते थे , मगर मज़लूम फलस्तीनियों की आवाज़ को वो भी पुरज़ोर अंदाज़ में नहीं उठा सके थे ।

दुनिया भर के मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी और पाकिस्तान पूरे मामले पर ख़ामोश रहे हैं। दूसरी तरफ़ ये देश रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ म्यांमार में हुईं हिंसा की निंदा करने में मुखर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटी में चाइना पॉलिसी के एक्सपर्ट माइकल क्लार्क मुस्लिम देशों की ख़ामोशी का कारण चीन की आर्थिक शक्ति और पलटवार के डर को मुख्य कारण मानते हैं।

क्लार्क ने एबीसी से कहा था, ”म्यांमार के ख़िलाफ़ मुस्लिम देश इसलिए बोल लेते हैं क्योंकि वो कमज़ोर देश है। उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना आसान है। म्यांमार जैसे देशों की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 180 गुना ज़्यादा बड़ी है। ऐसे में आलोचना करना भूल जाना अपने हक़ में ज़्यादा होता है।”

हालांकि इस्लामी नज़रिये का तक़ाज़ा तो यह था की ज़ालिम चाहे ताक़तवर हो या कमज़ोर उसकी मुखालफत होनी चाहिए और उसके पंजे को मरोड़ना ही चाहिए ,और मज़लूम चाहे अपना हो या पराया उसका सहयोग होना ही चाहिए इस्लाम की नज़र में मज़लूम , मज़लूम है और ज़ालिम ,ज़ालिम है उसमें , मज़हब , ज़बान या इलाक़े की कोई क़ैद नहीं है ।

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