बिहार CM पर फिर उठे सवाल , क्या वो भी निरंकुश हो गए हैं?

Date:

विजय शंकर दूबे का कहना है कि सदन में गतिरोध ख़त्म करने का ज़िम्मा सरकार और मुख्यमंत्री का होता है. उन्होंने कहा कि विपक्ष के सदस्य तो अब से पहले अध्यक्ष की कुर्सी पर भी बैठ चुके हैं. ख़ुद नीतीश कुमार के आदर्श कर्पूरी ठाकुर ने दो दिन, दो रात तक धरना दिया था लेकिन उस समय के अध्यक्ष ने पुलिस बुलाकर उन्हें हटाने की गलती नहीं की थी.

पटना: संसद और विधान सभाओं को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है और यहाँ से देश और राज्यों के भविष्य के फैसले लिए जाते हैं , लेकिन जिस तरह से यहाँ न सिर्फ लोकतान्त्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखा जा रहा है बल्कि मानवता को उठाकर तार तार किया जा रहा है . संसद या विधान सभा को चलाने की ज़िम्मेदारी अध्यक्ष की होती है किन्तु इसमें सत्ता पक्ष का अहम् रोल होता है और विपक्ष को भी मर्यादाओं से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए , और विपक्ष भी अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग तो नहीं सकती .

बिहार विधान सभा में मंगलवार यानी 23 मार्च को विपक्ष के सदस्यों के हंगामे और विधान सभा अध्यक्ष के चैम्बर के बाहर धरना देने के कारण पहली बार राज्य के संसदीय इतिहास में विधानसभा के अंदर आखिरकार पुलिस बुलानी पड़ी. इसके बाद पुलिस ने सदन के अंदर प्रवेश कर विपक्ष के विधायकों की जमकर पिटाई की. यहाँ तक कि विधान सभा से बाहर घसीटकर ले जा रहे एक विधायक को एक पुलिस अधिकारी ने पीछे से आकर लात भी मारी. लोकतंत्र के मंदिर में अराजकताभरे दृश्य के वीडियोज अब वायरल हो रहे हैं.

दरअसल ये पूरी घटना तब हुई जब बिहार विधानसभा में मंगलवार को “बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक, २०२१” पर चर्चा होरही थी , उसी समय खूब हंगामा हुआ. इस दौरान मुख्य विपक्षी पार्टी RJD समेत अन्य विपक्षी दलों के विधायकों के साथ सदन के अंदर पुलिस की धक्का-मुक्की और हाथापाई भी हुई. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस घटना की निंदा की है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सख्त हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि इस घटना से साफ होता है कि मुख्यमंत्री आरएसएस और बीजेपी के प्रभाव में काम कर रहे हैं और वे भी संघी हो गए हैं .

राज्यसभा में बोलने लगे सांसद ‘वहां तो लोकतंत्र का शव निकला है’,तो सभापति ने उनको रोक दिया .
निश्चित रूप से मंगलवार को बिहार विधान सभा कक्ष में जो हुआ वह ना सिर्फ दुःखद था बल्कि बिहार के संसदीय इतिहास पर एक काला दाग भी है. जहाँ तक पुलिस या RAF के जवानों को बुलाने का फ़ैसला है वो निश्चित रूप से विधान सभा अध्यक्ष विजय सिन्हा का था लेकिन उन्होंने अपने हर फ़ैसले और ख़ासकर इस फ़ैसले को मुख्य मंत्री नीतीश कुमार से पूछकर लिया था. हालाँकि विपक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि आख़िरकार विधान सभा अध्यक्ष को बंधक बनाने की क्या ज़रूरत थी?

सदन के अंदर उप मुख्य मंत्री तारकिशोर प्रसाद हों या अध्यक्ष की कुर्सी पर पर बैठ कर सदन चला रहे प्रेम कुमार हों, के हाथ से काग़ज़ात छीनकर जिस तरीके से राष्ट्रीय जनता दल और अन्य विपक्षी दल के लोग फाड़ रहे थे , ये भी स्वाती असंवैधानिक रहा और अमानवीय भी इसको सही नहीं ठहराया जा सकता उसके बाद किसी अनहोनी की आशंका बनना स्वाभाविक ही था . तेजस्वी यादव के नेतृत्व में जैसे पूरा विपक्ष आक्रामक सा लगने लगा था .विपक्ष के मेम्बरों का विधान सभा कक्ष के भीतर यह रवैया हरगिज़ क़ाबिल इ क़ुबूल नहीं था , लेकिन उसके बाद पुलिस का माननिये विधायकों के साथ अभद्र और चोरों जैसा रवैया भी आपत्तिजनक रहा .

इस पूरी घटना पर कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक विजय शंकर दूबे का कहना है कि सदन में गतिरोध ख़त्म करने का ज़िम्मा सरकार और मुख्य मंत्री के ऊपर होता है. उनका कहना है कि विपक्ष के सदस्य तो अध्यक्ष की कुर्सी तक पर बैठ चुके हैं. ख़ुद नीतीश कुमार के आदर्श कर्पूरी ठाकुर ने दो दिन, दो रात तक धरना दिया था लेकिन उस समय के अध्यक्ष ने पुलिस बुलाकर उन्हें हटाने की गलती नहीं की थी.यह विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है .

इस पूरी शर्मनाक घटना के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस विधेयक को पारित कराने के समय अपने भाषण में माना कि Proposed विधेयक के बारे में जो भ्रम फैला वो शायद न फैलता यदि उनके अधिकारियों ने इसकी ब्रीफ़िंग की होती तो . इधर, नीतीश कुमार के अधिकारियों ने कहा , ऐसा कोई निर्देश उन्हें नहीं दिया गया था. अधिकारी तो अधिकारी नीतीश कुमार के कैबिनेट के कोई मंत्री भी तीन दिन से अधिक समय तक इस बिल पर बोलने से बचते रहे क्योंकि अधिकांश का कहना था कि कैबिनेट में भी इस पर कोई चर्चा विस्तार से नहीं हुई. इसलिए वो आख़िर बोलते तो क्या जवाब देते क्योंकि उन्हें भी इस विधेयक के बारे में विस्तार से नहीं मालूम था.

नीतीश कुमार की अपनी पार्टी के विधायक भी मानते हैं कि पुलिस को बुलाकर उन्होंने एक ऐसी ग़लत परंपरा की शुरुआत कर दी है जिसका ख़ामियाज़ा आज नहीं तो कल सत्ता में बैठे लोगों को भी विपक्ष में जाने पर उठाना पड़ सकता है. उनका कहना है कि नीतीश ख़ुद गृह मंत्री हैं और बिल की बारीकियों के बारे में उन्हें पता था, तो वो मीडिया को ब्रीफ़ कर सकते थे लेकिन सचाई है कि मीडिया से अब वो भाग रहे हैं और सही सवाल करने से चिढ़ जाते हैं.जिससे उनकी कमज़ोरी झलक रही है . टॉप ब्यूरो

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

हिन्दुराष्ट्र वाला हिंदुस्तान ऐसा होगा?

.......अब अगर इसको हिंदु राष्ट्र बनाये जाने की बात...

भारत बना दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार

edited by maroof raza, senior journalist भारत रूस से तेल...

Religion, Wisdom, Demographics and the Misuse of Faith

“The wisdom that comes from God teaches love, justice,...

कमज़ोर होता लोकतांत्रिक दायरा और पीएम की उपलब्धियां

राम पुनियानी इस साल 10 जून को मोदी निरंतर भारत पर शासन...