प्रधानमंत्री मोदी और अमरीकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच फोन पर वार्ता के बाद, भारत-अमरीका सहयोग पर हुई अहम चर्चा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अमरीका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से फोन पर बातचीत की। इस दौरान दोनों नेताओं ने भारत-अमरीका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की।
दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों, ऊर्जा सुरक्षा तथा महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही, आपसी हित से जुड़े क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया।
मोदी ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और सेकंड लेडी उषा वेंस को उनके पुत्र के जन्म पर बधाई देते हुए शुभकामनाएं भी व्यक्त कीं।
बातचीत के बीच रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच हुई बातचीत ऐसे समय में हुई है, जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में रूस से भारत की ऊर्जा खरीद का मुद्दा एक बार फिर अहम बन गया है।
मोदी और वेंस की बातचीत से ठीक एक दिन पहले अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान वाले एक विधेयक को आगे बढ़ाया। इस प्रस्ताव का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं।
अमेरिका लंबे समय से रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और उसके सहयोगी देशों से भी मॉस्को के साथ ऊर्जा एवं व्यापारिक संबंध सीमित करने की अपेक्षा करता रहा है।
दूसरी ओर, भारत का तर्क है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें बहुत बड़ी हैं और वह अपने राष्ट्रीय हित, आर्थिक जरूरतों और उपभोक्ताओं के हित को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्रोतों से तेल खरीदता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी। अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारत की रिफाइनिंग कंपनियों को लागत नियंत्रित करने और घरेलू ईंधन बाजार पर दबाव कम रखने में मदद की।
ऐसे में अमेरिकी सीनेट की यह पहल भारत के लिए केवल एक व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती भी बन सकती है। यदि 100 प्रतिशत तक का अतिरिक्त टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो इससे भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
मोदी और वेंस की बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रूस-यूक्रेन युद्ध और व्यापक रणनीतिक साझेदारी जैसे मुद्दे पहले से ही चर्चा के केंद्र में हैं।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सीनेट से किसी विधेयक का पारित होना और उसका कानून बनकर लागू होना एक ही बात नहीं है। इसे अमेरिकी विधायी प्रक्रिया के अगले चरणों से गुजरना होगा और अंतिम रूप मिलने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भारत समेत दूसरे देशों पर इसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बढ़ाएगा, और क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता तथा सस्ती ऊर्जा की जरूरतों के बीच कोई संतुलन बना पाएगा? आने वाले दिनों में मोदी-वेंस बातचीत और अमेरिकी नीति इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।