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बादल को पाती लिखी

बादल को पाती लिखी

अटल मुरादाबादी

 

गर्मी से तपती धरा, जन जीवन बेहाल।
तापमान असहज हुआ, रवि की टेढी चाल।।
रवि की ढेढी चाल,करे तांडव अब दिनभर।
ज्यों-ज्यों बढता दिवस,बढ़ाते तेवर दिनकर।।
कहै अटल कविराय,दिखाओ सूरज नर्मी।
जीवन हुआ मुहाल, त्याग दो अपनी गर्मी।।

बादल को पाती लिखी,मानव ने गुम नाम।
जन-जीवन अब त्रस्त है,बरसो हे घनश्याम।।
बरसो हे घनश्याम, नहीं अब देरी करना।
जल का हुआ अभाव,बहा दो कोई झरना।।
जीव,जंतु, इंसान,हुए गर्मी से पागल।
कहते चंद्र चकोर , बरस जाओ हे बादल!

 

 

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