अज़ीज़ नबील के एज़ाज़ में शेर-ओ-अदब की यादगार शाम

(प्रेस रिलीज़)

नई दिल्ली: क़तर में मुक़ीम मारूफ़ शायर अज़ीज़ नबील के एज़ाज़ में एक ख़ुसूसी शेरी नशिस्त का इनइक़ाद किया गया। जामिया नगर के अबुल फ़ज़ल एन्क्लेव में वाक़े मारूफ़ दास्तानगो साहिल आगा के स्टूडियो में मुनअक़िद इस नशिस्त का एहतिमाम दूरदर्शन से वाबस्ता एंकर सादिया अलीम ने दास्तानगोई ऑफ़िशियल के इश्तिराक से किया।

नशिस्त की सदारत डिजिटल न्यूज़ पोर्टल और मीडिया प्लेटफ़ॉर्म टाइम्स ऑफ़ पीडिया के एडिटर इन चीफ़ अली आदिल ख़ान ने की, जब कि न्यूज़ एजेंसी वेब वार्ता के एडिटर मुहम्मद इरशाद सईद मेहमान-ए-ख़ुसूसी और इंडिया टीवी से वाबस्ता सैयद आमिर और वेब वार्ता के नसीम अहमद मेहमानान-ए-एज़ाज़ी के तौर पर मौजूद थे।

निज़ामत के फ़राइज़ मोईन शादाब ने बख़ूबी अंजाम दिए। उन्होंने साहिब-ए-एज़ाज़ अज़ीज़ नबील का तारुफ़ कराते हुए बताया कि अज़ीज़ नबील उर्दू के मारूफ़ शायर, अदीब और अदबी मुदीर हैं और 1999 से क़तर के दारुल-हुकूमत दोहा में मुक़ीम हैं।

 शायरी के साथ तहक़ीक़-ओ-तदवीन के मैदान में भी उनकी ख़िदमात क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। वह अदबी मुजल्ले ‘दस्तावेज़’ के मुदीर-ए-आला और अंजुमन मुहिब्बान-ए-उर्दू हिंद, क़तर के जनरल सेक्रेटरी हैं। उर्दू शे’र-ओ-अदब के फ़रोग़ के लिए उनकी अदबी सरगर्मियाँ ख़लीजी ममालिक और बर्रे-सग़ीर के अदबी हल्क़ों के दरमियान एक अहम राब्ते का वसीला हैं।

सदारती कलिमात में अली आदिल ख़ान ने कहा कि अदबी नशिस्तें शे’र-ओ-अदब के फ़रोग़, तख़्लीक़ी सलाहियतों की हौसला-अफ़ज़ाई और अहल-ए-क़लम के दरमियान फ़िक्री-ओ-तहज़ीबी रवाबित को मज़बूत बनाने में अहम किरदार अदा करती हैं। उन्होंने कहा आजकी नशिस्त फ़िरक़ेवाराना हमआहंगी का बेहतरीन नमूना है, उन्होंने मज़ीद कहा कि अहल-ए-इल्म-ओ-अदब की पज़ीराई दरअसल इल्म, फ़न और तख़्लीक़ी अक़दार के एहतराम का इज़हार है।

नशिस्त में जिन शुअरा ने शिरकत की और अपना कलाम पेश किया, उनमें साहिब-ए-एज़ाज़ अज़ीज़ नबील के अलावा शाहिद अंजुम, मुईन शादाब, ख़ालिद अख़लाक़, अनस फ़ैज़ी, वसीम राशिद, सरीता जैन, इंदु गुप्ता, अभिषेक तिवारी और सादिया अलीम के नाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। इस मौक़े पर सय्यद साहिल आग़ा और एक्टर, थिएटर एडुकेटर, फोक आर्टिस्ट दीक्षा तिवारी ने भी अपने फ़न ए दास्तानगोई और गुलोकारी का बेहरीन मुज़ाहिरा किया।

इस शाम की एक ख़ास बात महफ़िल की दिलकश आराइश और माहौल की ख़ूबसूरती भी थी। सादिया अलीम ने अपने हुस्न-ए-ज़ौक़ और जमालियाती सलीक़े से मक़ाम को निहायत ख़ूबसूरत अंदाज़ में सजाया था। लाल बाग़ की नशिस्तगाह को नादरात के मुख्तलिफ रंगों, पुरसुकून फ़िज़ा और नफ़ासत से की गई सजावट ने महफ़िल के हुस्न को दोबाला कर दिया था।

ऐसा महसूस होता था गोया माहौल का हर कोना शेर-ओ-अदब की दिलनशीं रिवायत का अक्स हो। इस ख़ूबसूरत एहतिमाम ने न सिर्फ़ महफ़िल को दीदाज़ेब बनाया, बल्कि शायरी सुनने और उससे लुत्फ़अंदोज़ होने के तजुर्बे को भी दोचंद कर दिया।

इस मौके पर सादिया अलीम को उनकी सहाफ़ती, निज़ामती और सक़ाफति खिदमात के लिए वेबवार्ता एजेंसी की तरफ से ट्रॉफ़ी देकर नवाज़ा गया।

आख़िर में मेज़बान सादिया अलीम और साहिल आगा ने तमाम मेहमानों, शुअरा और शुर्का की आमद और भरपूर तआवुन पर उनका शुक्रिया अदा किया। उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि मुस्तक़बिल में भी ऐसी अदबी महफ़िलों के ज़रिए उर्दू ज़बान-ओ-अदब के फ़रोग़ और अहल-ए-क़लम की हौसला-अफ़ज़ाई का सिलसिला जारी रहेगा।

 

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