
किसी आईपीएस अधिकारी के लिए “अस्सलामुअलैकुम”, “इंशाअल्लाह” और “जज़ाकल्लाह” कहना हरगिज़ न तो विवाद का इशू बनना चाहिए और न बन सकता है, लेकिन बनाया जा रहा है. देखा यह जाना चाहिए की सम्बोधन किसको किया जा रहा है. ऐसे में IPS बुशरा बानो के सलाम को फ़िज़ूल तूल दिया जाना मुनासिब नहीं है.
क्योंकि बुशरा बानो जब मुस्लिम कम्युनिटी को address करेंगी तो सलाम ही करेंगी और गुफ्तगू के दौरान इंशाल्लाह और जज़कल्लाह कहना भी उसकी तहज़ीब का हिस्सा है. फिलहाल हमारा भी IPS बुशरा बानो साहिबा को सलाम अर्ज़ है.
किसी भी ऐरा ग़ैरा नथ्थू खेरा की तरफ से मज़हबी मक़ामात या मुद्दों पर अदालतों में PIL डालना और उसपर अदालतों की तरफ से सुनवाई की इजाज़त का मिल जाना इसपर जनता को आपत्ति है. अगर अदालत ऐसे 10 – 5 Petitioners को तगड़ी फटकार और बड़ा जुर्माना लगा दें तो शायद दुबारा कोई हिम्मत ही न करे.
तथाकथित हिन्दू संगठनों की तरफ से ये सब नफरत के बीज बोये जाते हैं, और इसका वर्तमान सत्तरूढ़ पार्टी को राजनितिक लाभ होता है, इसीलिए देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग को उलझाए रखना सियासत में Fashion बन गया है. जबकि भारत का 65% हिन्दू समाज इस नफरती और सांप्रदायिक माहौल से बहुत नाराज़ है .
मामला पश्चिम बंगाल की खड़गपुर की एडिशनल SP और 2021 बैच की IPS अधिकारी डॉ. बुशरा बानो के तबादले का है. जो सरकार का आधिकारिक तौर पर routine के तबादलों का हिस्सा हो सकता है.
दरअसल बुशरा बानो ने CIVIL SERVICES की तैयारी करने वाले मुस्लिम Aspirant Students के साथ अपनी कामयाबी का अनुभव साझा करने के दौरान एक निजी वीडियो में अस्सलामुअलैकुम , इंशाल्लाह , और जज़कल्लाह जैसे मज़हबी अलफ़ाज़ का इस्तेमाल किया था. जो उनकी ज़बान और संस्कृति का हिस्सा हैं.
और अगर अरबी के इन अलफ़ाज़ का मतलब आप जान लें तो आपकी भी यह ख्याहिश होगी कि आप के साथ बातचीत में इन दुआईया अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया जाए. अस्सलामुअलैकुम = आप शान्ति और सलामती के साथ रहें, इंशाल्लाह=अगर अल्लाह ने चाहा तो , जज़ाकल्लाह=अल्लाह आपको अच्छा इनाम दे अब बताइये कोई बदनसीब ही होगा जो इन दुआओं से महरूम रहना चाहेगा, ज़बान कोई भी हो सकती है
आपको बतादें ! जिस वक़्त ASP बुशरा बानो ने यह वीडियो बनाई थी तब उसको चंद लोगों ने ही देखा था जैसे ही इसपर ऐतराज़ हुआ उसके बाद से 3 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने अलग अलग तरह से इस वीडियो को देख लिया है. जिसके बाद इसको एक ख़ास वर्ग में बुशरा बानो की कामयाबी और तरक़्क़ी से जोड़कर भी देखा जा रहा है .
बुशरा बानो के खिलाफ जिस ‘हिंदू लीगल फंड’ नाम के संगठन ने west Bengal राज्य के गृह सचिव से इसकी शिकायत की थी उसको इस बात का गुमान भी न होगा, की इस VIDEO की Reach इतनी बढ़ जायेगी। और UPSC जिहाद जैसी ख़बरें चलाने वाले CHANNEL के मालिक की तो नींद उड़ी हुई होगी. कोशिश DEFAME करने की की गई थी उधर इज़्ज़त और शोहरत मिल गई .
शिकायत में सवाल उठाया गया कि एक सरकारी अधिकारी को धार्मिक अभिवादन की जगह “जय हिंद” या “वंदे मातरम्” जैसे राष्ट्रीय स्लोगन इस्तेमाल करने चाहिए। शिकायतकर्ता की योग्यता का अंदाजा लगाएं जिसको यह तक नहीं पता की सरकारी सम्बोधन और निजी सम्बोधन के नियम और उसूल क्या होते हैं.
लोग यह पूछ रहे हैं कि हिंदू लीगल फंड” नामी संगठन ने सरकारी वर्दी और बेल्ट लगाकर रिश्वत लेने वालों, वर्दी में गालियां देने वालों, धर्मसूचक और जातिसूचक, अनैतिक और असंवैधानिक शब्दों और भाषा का इस्तेमाल करने वालो के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है???
जो देश में रोज़ाना धर्म विशेष और जाती विशेष के विरुद्ध देखने को मिलता है. 800 से ज़्यादा video और audio clips तो हमारे पास archive में मौजूद हैं, जब वर्दी और संवैधानिक पदों पर बैठकर लोगों को धमकाया और हरासमेंट किया जारहा होता है.
फिलहाल शिकायत के कुछ ही दिनों बाद बुशरा बानो का खड़गपुर से तबादला कर उन्हें राज्य सशस्त्र पुलिस की चौथी बटालियन में डिप्टी कमांडेंट का पद भार दे दिया गया। जो ASP पद के बिलकुल बराबर है. उसके सम्मान या गरिमा में कोई फ़र्क़ नहीं है.
सरकार इसे सामान्य प्रशासनिक फेरबदल बता रही है, और हम भी यही मानते हैं । इसलिए यह कहना कि उन्हें निश्चित रूप से “सज़ा” के तौर पर हटाया गया, बुशरा बानो को DEFAME या बेइज़्ज़त किया गया , ऐसा कहना तथ्यात्मक तौर से सही नहीं है। लेकिन सरकारों में बैठे संकीर्ण मानसिकता के लोगों पर सवाल तो लगातार उठ ही रहे हैं. और बार बार इस तरह की घटनाओं और मुद्दों का समाज में गश्त करना चिंता का बिंदु भी बनता ही है .
किसी भी अधिकारी से कानून के पालन और निष्पक्षता और धर्म निरपेक्षता की उम्मीद जरूर होनी चाहिए—लेकिन क्या वर्दी में रहकर एक निजी ब्यान या बातचीत में मज़हबी अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल या मज़हबी किताब को Quote किया जाना प्रशासनिक नियमों या संविधान का उल्लंघन बन जाता है? नहीं हरगिज़ नहीं !!!!!
एक सरकारी कर्मचारी या पुलिस अधिकारी वर्दी में होने के बावजूद अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को मानने या निजी जीवन में उनका उपयोग करने में किसी भी तरह से बाबंद नहीं है।
नियमों का उल्लंघन तब कहा जाएगा जब अधिकारी की बातचीत से यह संदेश जाए कि वह सरकारी ड्यूटी के दौरान किसी विशेष धर्म का पक्ष ले रहा है या किसी दूसरे जाती के प्रति भेदभाव करता दिख रहा है।
यदि किसी अधिकारी की बातचीत , सम्बोधन या video निजी है, और इससे किसी को ठेस नहीं पहुँचती, और ड्यूटी के काम को प्रभावित नहीं करती, तो सामान्यतः इसे किसी भी तरह IPC या CrPC का उल्लंघन नहीं माना जायेगा।
इसके विपरीत , यदि कोई अधिकारी वर्दी में रहते हुए किसी PUBLIC PLACE पर, किसी शिकायतकर्ता के सामने, या मीडिया/सोशल मीडिया पर कोई ऐसा बयान देता है जिससे सरकारी व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष छवि धूमिल होती हो। किसी धार्मिक समूह के खिलाफ नफ़रत या असंतोष फैलता हो।
जनता में यह संदेश जाए कि अधिकारी का निर्णय किसी धार्मिक किताब या कानून से प्रभावित है, न कि भारत के संविधान या कानून से। तो इसे CCS Conduct Rules या Police Conduct Rules का उल्लंघन माना जाएगा. और आज एक धर्म विशेष के खिलाफ यह होता हुआ आप देख ही रहे हैं.
आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
पश्चिम बंगाल सरकार से देश सवाल कर रहा है, अगर तबादला नियमित और routine के मुताबिक़ था, तो सरकार को यह स्पष्ट बयान देना चाहिए कि इसका बुशरा बनो के उस वीडियो विवाद से कोई संबंध नहीं है, जिसकी शिकायत ग्रह सचिव से की गई थी। सरकार की ख़ामोशी भी उस जैसी लगती है कि ;
साहिब छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
अजब पर्दा है के चिलमन से लगे बैठे हैं .
लोकतंत्र में सरकार का सिर्फ फैसला ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि फैसले की पारदर्शिता यानी TRANSPERANCY और उसके पीछे की वजह भी जनता के सामने आना ज़रूरी है, और यह उसके भरोसे का हिस्सा होती है। लोकतंत्र में जनता का भरोसा , एकता और अखंडता देश के विकास की रीढ़ की हड्डी का काम करती है जिसको तोड़ने की हर मुमकिन और नामुमकिन कोशिश हो रही है. यानी देश को कमज़ोर करने की साज़िश लगातार जारी है.
यह सवाल भी बार बार हम कर रहे हैं कि क्या भारत में सरकारी सेवा के भीतर धार्मिक पहचान और संवैधानिक कर्तव्य के बीच संतुलन को समझने की हमारी क्षमता कम होती जा रही है? और क्या सरकारों में संवैधानिक फ़र्ज़ से ऊपर संस्थाओं के नियमों और लक्ष्य को प्राथमिकता दी जारही है ?