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जो नफ़रत और द्वेष का माहौल तैयार हो रहा है क्या देश बच पायेगा?

जो नफ़रत और द्वेष का माहौल तैयार हो रहा है क्या देश बच पायेगा?

सरदार दया सिंह ,

राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीस मिशन

 

देश को बांटने की नीति अँगरेज़ साम्राजयवाद की थी , अब कौन बाँट रहा देश को ?

कल ही आज तक शाम 6 बजे ह्ल्ला बोल पर चर्चा सुन रहा था , शायद टीवी भी पूरी तरह शिकार हैं इस मानसिकता को फैलाने का l इसमें कोई शक नही टीवी माध्यम हैं देश के हालात को बताने का वहां चार लोग बिठा लिए जाते हैं एक जानकारी देगा , दूसरा एक पक्ष रखेगा दूसरा विरोध में दोनों ही एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं बचे दो वे भी उसी में लथ पथ अंत में एंकर ज़िधर उसका मानस बना हो वही सारांश भी अब जनता क्या करे यह हैं यक्ष प्रश्न?

कारोली ही, बूराड़ी हो अथवा गोरख पुर एक सा ताना बना लगता हैं , ऐसा क्या हो गया हैं हाल ही के चुनाव का ही आंकलन करें तो कहीं 80:20 का सवाल वही मुज़फर नगर, वही सारा नकशा , उधर पंजाब में हिन्दुओं को डरा हुआ बताना वगेरा वगेरा , इसमें कोई शक नही रहा धर्म के नाम पर देश बंट सा लग रहा हैं सिख और मुस्लिम अलग थलग सा होता जा रहा हैं, उसके वोट की कोई अहमियत ही नही बची l संघ ने समझ लिया हैं 80 फीसद में यदि आधे भी उसके साथी हो जायें तो शेष तो बंटेगे ही तो सत्ता तो हासिल केवल इसी से हो जाती हैं शेष कुछ करने की ज़रूरत ही नही बची.

यह सिलसिला वैसे तो देश के आजाद होते ही शुरू हो गया था अम्बेडकर भी इसी मानस का था कि मुस्लिम देश को छोड़ दे और पाकिस्तान चला जाये जबकि गांधी और ज़िन्नहा का मानस साफ था कि जो जहां हैं वहीं रहे ताकि दोनों देशों के रिश्ते बने रहे यह बात ज़िन्नहा के 14 अगस्त 1947 के व्यक्तव्य में इसी भावना को प्रदर्शित किया था और गांधी भी इसी विचार का परंतु बंटा पंजाब और बंगाल हालात यह कि लाखों जाने चली गई गत चालीस वर्ष का इतिहास सीधे तौर पर यही दर्शाता हैं पहले सिख निशाना बने कभी पंजाब में हिन्दू सिख दंगे नही हुए फिर भी जे पी आंदोलन के बाद जिस अकाली दल ने उस आंदोलन में अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया वही निशाने पर आ गया और पूरे सिखों को ही कट घरे में खड़ा कर दिया .

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अब कोई यह तो बताये उसको उग्र किसने किया , उसी प्रकार मुस्लिम निशाने पर क्या किसी के पास जवाब हैं कि उसको उक्साया किसने , इसे समझना हो तो आडवाणी की पुस्तक My Country My Life ने , चाहे वह पुस्तक एक तरफा होते हुए भी यह बताने में सही रही कि संघ की क्या मानसिकता थी ,  यह फिजूल की बात हैं कि देश हिन्दू राष्ट्र तो 1947 से ही था परंतु नेहरू ने उसे उस तरफ सीधे तौर जाने नही दिया परंतु यदि राजीव सरकार का आंकलन करें तो उससे तो यह साफ कर दिया कि यह हिन्दू राष्ट्र ही हैं वे पांच वर्ष इसी का दर्शन हैं .

यह ठीक हैं कि मन मोहन सिंह सरकार नेहरू के बाद ऐसी थी जिसने नेरेटिव को बदला परंतु तब तक कांग्रेस संघ युक्त हो चुकी थी वही हुआ भी 2014 में कांग्रेस के 168 सांसद ही पाला बदल गये तो कांग्रेस क्या अपनी ज़िम्मेदारी से बच सकती हैं ?

यह वर्ष गुरु तेग बहादर साहिब के प्रकाश पर्व का 400 वाँ वर्ष हैं ज़िन्होने नफरत जैसे फैले जहर से छुट कारा दिलाने के लिए शहादत दे दी थी , आज फिर से इस प्रकार उन सबको एक मंच पर आने की ज़रूरत हैं ,आल इंडिया पीस मिशन उनके संदेश को देश भर में जागरन के लिए आगे आया हैं उसके लिए पूना में एक रोजा संगोष्ठी को 17 अप्रैल 2022 को विचार चर्चा के लिए आहूत किया हैं ज़िसका उद्घाटन देश के शीर्ष राजनेता श्री शरद पवार जी से आग्रह किया हैं कि वे करें ताकि देश में नफरत के इस महोल पर अंकुश लग सके.

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हालांकि उसके लिए श्रीमति सोनिया गांधी , सरदार मन मोहन सिंह , कुमार प्रशांत अध्यक्ष गांधी शांति प्रतिष्ठान, मोहम्मद आदीब आदि से भी आग्रह किया गया हैं l श्री उद्धव ठाकरे मुख्य मंत्री महाराष्ट्र को भी विषेश तौर पर आग्रह किया जा रहा हैं कि देश को इससे निजात मिले l उनके समक्ष 1920 का एक वाक्य पेश करता हूँ , बाबा खड़क सिंघ ने सिख लीग की बैठक को आहूत किया था ज़िसमें गांधी, मोती लाल नेहरू, मोहम्मद अली जोहर, शौकत अली मंच पर थे उस समय जोहर के यह शब्द ” खालसा जी, बुजूर्गों ने हाकिम रहते आप पर ज्यादतियां की थी ज़िसकी माफी मांगता हूँ, आज ज़रूरत हैं हम सबको एक होने की तभी इस अंग्रेज हकुमत से निजात मिल सकती हैं जो आपके बिना मुमकिन नही ” इस वाक्य का ज़िक्र भायी हीरा सिंह दर्द ने किया हैं जो साहित्य कार, संपादक, अकाली नेता, आजादी के मसीहे भी  .आओ मिलकर इस नफरत के महोल पर अंकुश लगायें बस यही सच्ची श्रद्धा होगी गुरु तेग बहादर साहिब के इस 400 वें वर्ष पर जिन्हे देश “हिन्द की चादर ” मानता हैं .

 

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