लोकतंत्र का ढोंग करते करते देश फ़ासीवाद की भट्टी की तरफ़ बढ़ रहा है.

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Ali Adil Khan

Editor’s desk

जहांगीरपुरी में तिरंगा एकता यात्रा निकल रही थी इधर सीनों पे सांप लोट रहा था , क्योंकि देश में लोकतंत्र , संविधान और धार्मिक व् जातीय एकता Fascism के ताबूत की कील है . लोकतंत्र और वर्तमान संविधान के रहते फासीवाद पनप ही नहीं सकता.

जिस तरह रात को दिन से और अंधेरों को रौशनी से और झूठ को सच से बैर है इसी तरह बे ईमान लोग ईमानदार लोगों से बैर रखते हैं और इस बैर और दुश्मनी को वो उग्रवाद के ज़रिये मिटाने या छुपाने की कोशिश करते हैं .झूठ और पाखंड तथा नफ़रत के पुजारियों को यह डर होता है की अगर सच सामने आगया तो हम कहीं के न रहेंगे . जहांगीरपुरी जैसी सारी घटनाएं इसी डर के नतीजे में होती हैं . देश में दंगा कोई नई बात नहीं , आज़ादी के बाद से आज तक लगातार दंगों की लम्बी फेहरिस्त है , और यह सिलसिला रुकने के लिए नहीं बल्कि किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए शुरू किया गया था और अब नतीजा भी आने वाला है ……आज हम जिस सच्चाई से आपको अवगत कराने जा रहे हैं वो हमारे लिए समस्या पैदा कर सकता है .लेकिन एक ईमानदार पत्रकार होने के नाते हमारे लिए मानवता और देश सर्वोपरि है .और किसी भी खतरे से देशवासियों को अवगत कराना हमारा पत्रकारिता का धर्म है और कर्तव्य भी है .

हमारा मक़सद समस्याओं पर चर्चा या हालात ए हाज़रा पर नौहा करना नहीं होता बल्कि हम हमेशा अपने लेखों में समस्या के समाधान तलाशते हैं , और देश दुनिया में जितना भी जिस शक्ल में भी उन्माद है उसके नतीजों से अवगत कराते रहते हैं और चेताते भी रहते हैं अगर समय रहते इस समस्या का समाधान न निकाला गया तो परिणाम बुरे ही होंगे ,.

देश में जो संस्था सत्ता की बागडोर थामे है वो एक ज़माने से उन देशों के साथ लगातार संपर्क में है जहाँ जहाँ मुस्लिम हुकूमतों खात्मा हुआ है . आज जिस तरह का नैरेटिव देश में बनाया गया है उसमें विदेशी प्रशिक्षण का पूरा अक्स दीखता है .

”दिल्ली में बीते दिनों हनुमान जयंती के मौके पर शोभा यात्रा निकली थी. उस दौरान जहांगीरपुरी इलाके में हिंसा देखने को मिली थी. जिसके बाद एमसीडी ने एक्शन लेते हुए इलाके में अतिक्रमण हटाने लगी थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बुल्डोजर कार्यवाही को रोक दिया गया था. लेकिन अब वहां के हालात सामान्य होते दिख रहे हैं. रविवार को वहां से जो तस्वीर सामने आई वो हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल बनी.

दोनों समुदाय के लोगों ने एक साथ मिलकर तिरंगा यात्रा निकाली , जिसके द्वारा अमन और आपसी भाईचारे का संदेश दिया गया. साथ में लोगों से शांति और आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील की गयी . लोगों के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहरा रहा था. स्थानीय लोगों ने घरों व दुकानों की छत से तिरंगा यात्रा पर फूल बरसाए गए थे. नफ़रत की आंधी के चंद दिन बाद ही सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाई चारे की फुहार ने इलाक़े में एक बार फिर से गाँधी , भगत सिंह और मौलाना आज़ाद व् सुखदेव के भारत की याद दिला दी .”

उधर जहांगीरपुरी में हिन्दू मुस्लिम मिलकर तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे और दूसरी तरफ़ नफ़रत के सौदागरों के सीनो पर सांप लोट रहे थे .अगर सरकारों ने पूरी ईमानदारी , इंसाफ़ , निष्पक्षता और इच्छाशक्ति के साथ लोकतंत्र को बचाने और संविधान की रक्षा करने में अब ज़रा भी ढील बरती तो देश को खंडित होने और बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता .यह हमारी चुनौती है .

बीजेपी सांसद हंसराज हंस ने अच्छी बात कही , यह भारत में जो कुछ हो रहा है वो देश को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। अंदर से कुछ लोग हैं, जो बाहरी ताकतों की मदद कर रहे हैं। भाजपा सांसद ने कहा कि इस घटना के पीछे कुछ विदेशी ताकतें हो सकती हैं जो भारत को कमजोर करना चाहती हैं। मैं एक ज़माने से एहि कहता आ रहा हूँ और निजी तौर से BJP के सांसद के इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ कि देश में किसी भी सांप्रदायिक और नफ़रती बयान या घटना के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होता है ,और जो लोग भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं वो देश के दुश्मनों के एजेंट हैं .

 

लेकिन सवाल यह है कि देश में लगातार होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं और हेट Speeches पर सरकार पाबंदी क्यों नहीं लगाती , क्यों फसादी , उन्मादी और उग्रवादी प्रविर्ती के बाबाओं को खुली छूट दी गयी है उनको क्यों ज़मानत पर छोड़ दिया जाता है , दंगाइयों को उत्तेजक (Provogative) और भड़काऊ नारे लगाने और अल्पसंख्यकों के धर्म स्थलों और न्यायलय परिसरों पर भगवा लगाने की इन दंगाइयों को ट्रेनिंग देने वालों को सज़ा क्यों नहीं होती ? उनका सियासी संरक्षण देश को कमज़ोर कर रहा है .

यह समझना भी ज़रूरी है कि बेरोज़गार नशेड़ी और आवारा किशोरों के ज़रिये , उन्माद , आतंक , उग्रवाद और अशांति पैदा करना फासीवाद का हिस्सा है , और देश में बेरोज़गारी पैदा करना नौजवान नस्ल को निरक्षर रखना यह फासीवाद को ज़िंदा करने की योजना का हिस्सा है , फासीवाद शब्द की उत्पत्ति इटालियन भाषा के शब्द ‘Fascio”से हुई है। जिसका अर्थ है, लकड़ियों का बंधा हुआ एक गठ्ठा । यानी सारे अधिकार सत्तावर्ग की मुट्ठी में रखने का चलन .

”दरअसल Fascism ऐसी व्यवस्था या system को कहते हैं जिसका प्रयोग लोकतंत्र और उदारवाद को ख़त्म करने के लिए किया जाता है. यह व्यवस्था उग्र राष्ट्रवाद, युद्धवाद, पूंजीवाद तथा सर्वसत्ताधिकारवाद का समर्थन करती है. यह एक प्रकार का आंदोलन है जिसका आरम्भ मार्च, 1919 में इटली के निरंकुश शासक मुसोलोनी के द्वारा किया गए .और इसी काल में जर्मन के निरंकुश नाज़ी शासक अडोल्फ हिटलर ने भी इसी वयवस्था को पसंद किया , जबकि लेनिन और स्टालिन भी इसी सर्वसत्ताधिकारवाद के समर्थक थे .याद रहे सावरकर के गुरु बालकृष्ण मुंजे या बीएस मुंजे , मुसोलोनी के भक्त थे और उसको अपना Ideal मानते थे .मुंजे को हेडगेवार का मेंटॉर माना जाता है।मुसोलोनी के शासनकाल में सिर्फ अल्पसंख्यकों का ही नहीं इंसानियत के अधिकारों का हनन हुआ .जबकि शुरुआत अल्पसंख्यकों को ठिकाने लगाने के नाम पर ही कि गयी थी .”

आज भारत में शासन प्रणाली जिस तरफ बढ़ रही है वो सर्वसत्ताधिकारवाद ही है . इसको आसान ज़बान में ऐसे समझें की देश में सारे अधिकार शासक वर्ग के होंगे और वो निरंकुश होगा , उसपर देश का कोई क़ानून लागू नहीं होगा जबकि नागरिकों के सिर्फ कर्तव्य होंगे अधिकार नहीं , जो मिल जाए बस ख़ामोशी से उसे गनीमत समझो वाली बात रहेगी .आत्म निर्भर के नाम पर अधिकारों का हनन यह सब सर्वसत्ताधिकारवाद का हिस्सा है .

तो देश में जितनी भी घटनाएं नफ़रत और साम्प्रदायिकता के नाम पर हो रही हैं वो सब टेस्टिंग के तौर पर हैं , यानि जिन अमानवीय , अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक घटनाओं के बाद जनता खामोश रहे , तो इससे यह नतीजा निकाल लिया जाता है की जनता ने इसको क़ुबूल कर लिया है , उसके बाद प्रयोगशाला में दूसरा प्रैक्टिकल किया जाता है . और यह चिंता की बात है देश की जनता फ़ासीवाद के लगभग सारे ही प्रयोगों पर खामोश रहकर totalitarianism या सर्वसत्ताधिकारवाद का समर्थन कर रही है .

अब जनता को जिस Fake राष्ट्रवाद या हिन्दुत्ववाद का धोखा दिया जा रहा है वो दरअसल सर्वसत्ताधिकारवाद या totalitarianism की तरफ देश को ले जा रहा है जिसमें फासीवादी निरंकुश सत्ताधारी वर्ग और अधिकारमुक्त जनता बस ये दो वर्ग होंगे .इस वयवस्था में कोई अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक नहीं रहता , जबकि सत्ता वर्ग के इर्द गिर्द जो लोग भी होते हैं उनको पूरा समर्थन , संरक्षण और सुविधाएँ उपलब्ध रहती हैं .देश के हालिया हालात से आप खुद अंदाजा लगा लें की हमारा भारत किस ओर जा रहा है . अखंड भारत का नारा या Concept सिर्फ एक छलावा है , और जिस विचार धरा के साथ अखंड भारत का सपना दिखाया जा रहा है वो एक दम निराधार है .

 

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