अख़लाक़ से गिरी हुई जनता और शासक किसी देश को विश्व गुरु नहीं बना सकते

Date:

इस महामारी के दौरान अमानवीय घटनाओं ने भारत को दुनिया के सामने ज़लील कर दिया है

Kalimul Hafeez Social Activist & Politician

पुराने ज़माने से दुनिया में भारत की एक अहमियत रही है। मुसलमानों के आने के बाद भारत सोने की चिड़िया बन गया। यहाँ की चीज़ों के साथ-साथ यहाँ की तहज़ीब (संस्कृति) ने भी दुनिया को मुतास्सिर (प्रभावित) किया। इंसाफ़-पसन्द बादशाहों ने अद्ल व इंसाफ़ की बहुत-सी मिसालें क़ायम कीं। धीरे-धीरे हुक्मराँ ना-इंसाफ़ हुए और जनता अपने हुक्मरानों की ना-इन्साफ़ियों पर ख़ामोश रही और लम्बी हुक्मरानी ख़त्म हो गई। अंग्रेज़ी साम्राज्य की बुनियाद ज़ुल्म और ना-इंसाफ़ी पर रखी हुई थी इसलिये ज़्यादा देर तक टिक न सकी। अगर मैं यह कहूँ कि अंग्रेज़ी साम्राज्य से मुक़ाबले में भारत की अख़लाक़ी क़ुव्वत (नैतिकता) का अहम किरदार है तो ये बात ग़लत न होगी।


भारत के लोगों की आपसी मुहब्बत, मज़हबी रवादारी, वफ़ादारी और अहदो-पैमान के पास व लिहाज़ के हज़ारों क़िस्से आज़ादी की जंग के इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन आज जब हम अपने ऊपर नज़र डालते हैं, अपने हुक्मरानों के काम करने का अन्दाज़ देखते हैं, अपने समाज के लोगों के अख़लाक़ व किरदार को जाँचते हैं तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकती हुई मालूम होती है।


कोरोना महामारी की पहली लहर में तो केवल हुक्मरानों की पोल खुली थी लेकिन इस दूसरी लहर ने मुल्क के अख़लाक़ी निज़ाम की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। कोरोना की क़ियामत ला देने वाली घड़ी के दौरान जबकि देश की हालत बद से बदतर हो उस वक़्त हुक्मरानों से लेकर आम जनता तक की अख़लाक़ी पस्ती की ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जिनको देख कर रूह काँप उठती है। हुक्मरानों की सबसे बड़ी अख़लाक़ी कमज़ोरी सत्ता की भूख होती है, सत्ता पाने का लालच उन्हें पागल बना देता है। पुराने ज़माने में बादशाह इस लालच में देश को बर्बाद कर देते थे मगर आज हमारे देश के नेताओं ने भी ज़ुल्म व बरबरता की मिसालें क़ायम की हैं।


कोरोना के बारे में इसके जानने वाले डॉक्टर्स ने भारत में दूसरी ख़तरनाक लहर से देश के हुक्मराँनों को आगाह कर दिया था इसके बावजूद देश में चुनाव कराए गए। महामारी फैलती रही और हमारे केन्द्रीय मंत्री रैलियाँ करते रहे। मद्रास हाईकोर्ट तक ने कह दिया की लोगों की मौत का ज़िम्मेदार चुनाव आयोग है और इस पर मुक़दमा चलना चाहिये। लेकिन कोर्ट को ये भी देखना चाहिये कि आयोग की डोर किसके हाथों में है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव पर रोक लगाने से साफ़ इंकार कर दिया। इन चुनावों में ड्यूटी के दौरान लगभग दो हज़ार सरकारी कर्मचारियों की जान चली गई। इन्हीं चुनावों के दौरान कोरोना तेज़ी से बढ़ता गया जिसमें लाखों जानें चली गईं। जनता की ज़िन्दगी से लापरवाही और सत्ता की भूख भारत के मौजूदा नेताओं की अख़लाक़ी पस्ती का जीता-जागता नमूना है।


इसके अलावा सरकार में असर रसूख़ रखनेवालों की तरफ़ से ऑक्सीजन और दवाइयों की काला बाज़ारी की ख़बरें भी सामने आई हैं। विपक्ष के नेताओं के इलाज में लापरवाही भी अख़लाक़ से गिरी हुई हरकत है, ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी के दौरान पार्लियामेंट की नई बिल्डिंग का निर्माण और सरकारों का एडवेर्टीज़्मेंट के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करना भी ग़ैर-अख़लाक़ी हरकत है। वैक्सीन के ताल्लुक़ से भी कई तरह की ख़बरें चर्चा में हैं। देश में दवा बनाने वाली कम्पनियों से वैक्सीन न बनवा कर दूसरे देश से ख़रीदना, ये भी एक तरह की धांधली ही है, पेटेंट के नाम पर हाथ बाँधे रखना बे-हिसी है। गाँवों के सरकारी अस्पतालों को कोई देखने वाला नहीं है और उनमें गाँव के लोग जानवर बाँध रहे हैं। ये लापरवाही आम जनता के साथ खिलवाड़ है।

Advertisement…………………..


लॉक-डाउन की मार झेल रही आम जनता को उपहार के तौर पर मँहगाई देना और पेट्रोल डीज़ल के रेट बढ़ाना ज़ुल्म है। मदद करने वालों पर मुक़दमे चलाना बे-शर्मी की हद को पार कर जाना है। शिकायत करने वालों पर N.S.A लगाना और सवाल करने पर जेल में डाल देना फ़िरऔनीयत है। झूठ बोलना और सच्चाई छुपाना बद-दयानती है। एक योगी ने तो ये फ़रमान जारी कर दिया कि जो अस्पताल ये कहेगा कि ऑक्सीजन की कमी है उसे जेल की हवा खाना होगी और उसका लाइसेंसे रद्द कर दिया जाएगा। भारतीय पुलिस की बद-अख़लाक़ी का तमाशा रोज़ देखा जा सकता है जिसका शिकार यहाँ की ग़रीब और कमज़ोर जनता होती है। गोदी मीडिया को झूठ बोलने का लाइसेंस मिला हुआ है और चापलूसी, चमचागीरी ही उसकी पत्रकारिता है। उसकी एक आँख शायद पत्थर की है क्योंकि उसे मरकज़ निज़ामुद्दीन तो नज़र आता है मगर कुम्भ नहीं।


जिस देश के नेता, अदालत, मीडिया सरकारी कर्मचारियों के अख़लाक़ का हाल यह हो तो जनता के अख़लाक़ की बात करना बेकार है इसलिए कि लोग अपने बादशाह के कामों की नक़ल करते हैं। कोरोना मरीज़ों से ताल्लुक़ ख़त्म कर लेना, उनकी देख-भाल न करना, उनको अकेला छोड़ देना, कोरोना से मरने वालों की लाशों को हाथ न लगाना, उनको कचरे की गाड़ी में ले जाना, उनको दरिया में बहा देना, ऑक्सीजन सिलेंडर को मुँह माँगी क़ीमत पर बेचना और उस पर भी गैस पूरी न देना, ऑक्सीजन की काला बाज़ारी करना, कफ़न चोरी करना, नक़ली इंजेक्शन बनाना, पैसे लेकर ग़लत रिपोर्ट बनाना, फ़र्ज़ी डॉक्टर बनकर मरीज़ों से पैसे ठगना जनता के अख़लाक़ की बदतरीन मिसालें हैं।
मैं यह नहीं कहता कि इन्सानी समाज में बुरे लोग नहीं होते लेकिन देश जब तबाही की तरफ़ हो और हर तरफ़ मौत का नंगा नाच हो, यमराज दरवाज़े खटखटा रहे हों, इन्सान तड़प रहे हों, नफ़्सा-नफ़्सी का आलम हो, उस वक़्त इस तरह की ग़ैर-इनसानी हरकतें किसी समाज की तकलीफ़देह और बहुत बुरी तस्वीर पेश करते हैं।

Advertisement…………………..


आप कह सकते हैं कि इस बीच बहुत-से हाथ मदद के लिए भी उठे हैं, मुफ़्त ऑक्सीजन देने वाले भी सामने आए हैं, दवाइयाँ बाँटने वाले और अस्पताल बनाने वाले भी सामने आए हैं, लोगों को फ़्री राशन देने वाले भी दिखाई दिए हैं, लोगों की ख़िदमत के लिए अपना सब कुछ बेचने वाले भी इसी समाज में हैं, हिन्दू अर्थियों को मुसलमान कन्धे भी मिले हैं, हाँ यह सब भी हुआ है लेकिन पहली बात तो यह कि ये कुछ ख़बरें हैं जो सुनने को मिली हैं जिनको उँगलियों पर गिना जा सकता है।


दूसरी बात यह है कि जिस्म का एक हिस्सा अगर सड़ जाए तो पूरा जिस्म उसका दर्द महसूस करता है इस तरह से अगर आप देखेंगे तो भारतीय संस्क्रति के एक बहुत बड़े हिस्से पर फ़ालिज पड़ चुका है।


मंत्री, संत्री से लेकर डॉक्टर और एम्बुलेंस के ड्राईवर तक ने अपने अख़लाक़ और ज़मीर को बेच दिया है। होना तो ये चाहिए था कि ऐसे हालात में सारे हाथ मदद के लिए बढ़ते या कम से कम इन्सानियत के दुश्मन ख़ामोश तमाशा ही देखते रहते तो भारत की बुरी तस्वीर दुनिया के सामने न आती। महामारी के दौरान ग़ैर इंसानी घटनाओं ने भारत को दुनिया के सामने ज़लील कर दिया है। दुनिया के तमाम इंसानी और अख़लाक़ी इंडेक्स में भारत तेज़ी से नीचे की तरफ़ जा रहा है। वही भारत जिस ने 2004 में यह तय किया था कि वह किसी तरह की बाहरी मदद नहीं लेगा आज कटोरा लेकर भीख माँग रहा है, क्या ये ही आत्मनिर्भर भारत है ?


हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि सबसे बड़ी दौलत भी अख़लाक़ है और सबसे कारगर हथियार भी अख़लाक़ ही है। ये बात किसी हद तक सही है कि दौलत और हथियारों से जंगें जीती जाती हैं लेकिन इससे ज़्यादा ये बात भी सही है कि भौतिक संसाधन सिर्फ़ गर्दनें झुकाते हैं और अख़लाक़ की रूहानी ताक़त दिलों को वश में कर लेती है।


जिस देश की जनता, नेता और शासक भ्रष्टाचार में अव्वल और मशहूर हों उस देश को विश्व गुरु बनने के सपने नहीं देखने चाहिये।
भारत को अगर विश्व गुरु बनना है तो उसके नेताओं और उसकी जनता को अख़लाक़ी खूबियाँ अपने अन्दर पैदा करनी होंगी।

 Disclaimer (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति टाइम्स ऑफ़ पीडिया उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार टाइम्स ऑफ़ पीडिया के नहीं हैं, तथा टाइम्स ऑफ़ पीडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

Mamdani’s Rise Signals a Shift in NYC Democratic Politics

New York: The contrast on New York City's primary...

Jamiat treats in Free Medical Camp at Ajmer

Jamiat medical camp at Ajmer Urs treats 1,415 pilgrims...

Indo-Saudi Arab biletral ties and Role of Dr. Suhel

Ambassador Suhel Ajaz Khan Leaves Riyadh, But Questions Remain...

Indo-Greek Defence Partnership

Indo-Greek Defence Partnership, promising move for both nations Indo-Greek Defence...