अब्दुल ने दुनिया को दी नई सीख

Ali Aadil Khan
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

मिशिगन में कौन जीता नफ़रत या खिदमत?
जनता ने उठाया सवाल, नफ़रत या क़ाबिलियत?”

मिशिगन से यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट के लिए चुने गए सीनेटर का पूरा नाम है अब्दुल रहमान मोहम्मद अल-सईद, उनके नाम से मुहम्मद को क्यों हटाया गया, जबकि उन्होंने खुद इसको अपने भाषणों में ज़ोर देकर बोला.

आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
United States of America 2025 के Bureau of Census के मुताबिक़ अमेरिका की आबादी 34 करोड़ 17 लाख 84 हज़ार 857 थी . मिशिगन राज्य की कुल आबादी एक करोड़ एक लाख 55 हज़ार 806 है, जबकि इस राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 24 लाख 1 हज़ार 828 है , जो 2% से थोड़ी ज़्यादा है।

जबकि पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में अनुमानित 45 लाख मुसलमान रहते हैं, जो वहां की कुल आबादी का लगभग 1.34% हिस्सा हैं। आपको बतादें अमेरिका में जनगणना धार्मिक आधार पर नहीं होती है. जबकि इजराइल में जनगणना धर्म के नाम पर की जाती है। वहां यहूदी कुल जनसंख्या का लगभग 73% से 75%, मुस्लिम (Muslim) लगभग 18% से 21% जो सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक है। ईसाई लगभग 1.8% से 2% हैं ।

भारत के संदर्भ में इस जीत के तीन अहम मायने निकाले जा रहे हैं
1. भारत में मुसलमानों की देशभक्ति, सामाजिक निष्ठा और राष्ट्रीय जीवन में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में अब्दुल की सार्वजनिक जीवन में कामयाबी हमें यह याद दिलाती है कि किसी नागरिक की निजी क़ाबलियत और वफ़ादारी का फ़ैसला उसके नाम या मज़हब से नहीं बल्कि सेवा और काम से किया जाना चाहिए।

2. अब्दुल रहमान मुहम्मद एल-सईद की जीत का संदेश यह है कि लोकतंत्र में सभी COMMUNITIES की भागीदारी मायने रखती है। भारत में भी लोकतंत्र की मज़बूती का एक पैमाना यह होना चाहिए कि हर समुदाय के योग्य नागरिकों को शिक्षा, सरकारी नौकरी, संसद और विधान सभाओं में हिस्सेदारी और सार्वजनिक संस्थाओं में आगे बढ़ने के बराबर अवसर दिए जाएँ.

और साथ ही भारतीय मुसलमानों की प्रतिभाओं को RECOGNITION मिलनी चाहिए. ताकि सभी समुदायों में देश के प्रति निष्ठां और देशप्रेम की भावना उजागर हो। जबकि यहाँ अल्पसंख्यकों को ग़द्दार, देशद्रोही, आतंकी, खालिस्तानी , पाकिस्तानी, नक्सलवादी जैसे अलक़ाब से पुकारकर लोगों के दिलों से देशप्रेम और वफादारी को मिटाने की कोशिश की जाती है. जो एक साज़िश भी कही जा सकती है .

3. अब्दुल की जीत अमेरिका की 98% ग़ैर मुस्लिम जनता के अपार समर्थन के बिना मुमकिन नहीं थी. इस जीत को भारत की जनता से शिकायत करने के लिए इस्तेमाल करना मुनासिब नहीं होगा। अलबत्ता खुद मुसलमानों को शिक्षा, पेशेवर योग्यता, सामाजिक सहयोग, संवैधानिक अधिकारों की जानकारी और देश के विकास में लोकतांत्रिक भागीदारी की अहमियत को समझना होगा। अपनी मज़हबी पहचान पर गर्व के साथ-साथ देश के व्यापक हितों के लिए योगदान देना भी मुसलमान की ज़िम्मेदारी में शामिल रहना चाहिए।

लेकिन एक बुनियादी फ़र्क़ भी ज़ेहनों में रहना चाहिए, अमेरिका और भारत की राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक परिस्थितियाँ और धार्मिक विविधता का इतिहास अलग-अलग है। इसलिए एक सीनेटर के नतीजे से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अमेरिका में मज़हबी और समाजी बराबरी पूरी तरह स्थापित हो गई है और भारत में अब इसकी कोई गुंजाइश नहीं बची है।

मेरी नज़र में इस जीत का सबसे प्रभावशाली संदेश यह होगा, कि अब्दुल रहमान मुहम्मद एल-सईद की जीत ने अमेरिका की जनता ने मज़हबी नफरत और सरमायेदाराना निज़ाम को अपने पैरों तले कुचलने की शुरुआत करदी है. वर्ना 2% वाली Community से आने वाले अब्दुल की ज़मानत भी नहीं बच सकती थी .

भारत में भी यह मॉडल लाने के लिए ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय को चुनावी राजनीति के केंद्र में लाना होगा। और देश की तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को ऐसी रणनीति बनानी होगी मुस्लिम CANDIDATES हिन्दू बहुल छेत्रों से जीतकर विधान सभा और संसद में बैठकर जनता की सेवा कर सकें.

अगर मुसलमान कैंडिडेट मुस्लिम बहुल छेत्रों से जीतकर आते हैं तो इससे पार्टियों की संख्या बल तो बढ़ जाती है किन्तु मुल्क कमज़ोर रहता है. जबकि वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी धार्मिक ध्रुवीकरण, नफरत और डर के माहौल को बनाकर सत्ता में बने रहने की कोशिश करेगी। हालांकि तथाकथित सेक्युलर पार्टियों पर मुस्लिम तुष्टिकरण(APEASEMENT) का आरोप वर्तमान सत्ता पक्ष लगता रहा है.

सीनेटर अब्दुल रहमान मुहम्मद अल सईद की चुनावी जीत की खबर दुनिया में पनपती नई सोच का आग़ाज़ है. जबकि भारत में आज भी ख़ास समुदाय को उसके नाम, खान पान, लिबास, और दीगर धार्मिक पहचान के आधार पर परखने और पहचानकर लिंच करने की सलाह दी जाती है. जबकि पूरी दुनिया में हमारी पहचान अनेकता में एकता, के नाम पर बानी थी ।

अब्दुल एल-सईद की ऐतिहासिक जीत के पीछे बेलौस इंसानियत की ख़िदमत का वो जज़्बा है जो इस्लाम की बुनियाद है. जब दुनिया में मुसलमानों को आतंकवादी, कट्टरपंथी और इंतहापसन्द कहा जारहा है ऐसे में अब्दुल की जीत दुनिया के नज़रिये को बदलने में मददगार ज़रूर साबित होगी। किसी शख्स को उसके नाम से नहीं बल्कि उसके काम और किरदार से पहचाना जाए. और कभी भी दूर से किसी भी मज़हब या इंसान के बारे में कोई आखरी राये क़ायम न की जाए।

“Abdul El-Sayed” की जीत इस सवाल को भी सामने लाती है क्या दुनिया में मुसलमान का मज़हब उसकी क़िस्मत का फ़ैसला करेगा, या मुहम्मद PBUH वाले अख़लाक़, किरदार और खिदमत का जज़्बा उसकी पहचान बनेगा?

और ‘अब्दुल’ अपनी खिदमत से ही मजबूर, शोषित और कमज़ोर अवाम के बुनियादी मुद्दों के ज़रिये उनके दिल तक पहुँचने में कामयाब हुए.वो भले अमेरका के सीनेटर बने लेकिन दुनिया उनकी चर्चा एक मुस्लिम नेता के रूप में कर रही है।

यहाँ एक और बात क़ाबिले ग़ौर है, किसी COMMUNITY के एक शख्स का क़ाबिले तारीफ़ अमल पूरे समुदाय की तर्जुमानी नहीं कर पाता जबकि उसी समुदाय के कुछ लोगों के गुनाहों को पूरे समुदाय की बदनामी का जरिया बना दिया जाता है, और यह सिर्फ साज़िश है। लेकिन अगर मुस्लिम COMMUNITY खराब हो गई है तो इसके लिए क़ौम के सियासी और मज़हबी रहनुमाओं को अपना अंतर्दर्शन करना होगा, और इस खराबी की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

इंसान की पहचान उसके अख़लाक़ और किरदार से होती है. जबकि विकसित और अमनपसंद समाज इंसाफ़ के ज़रिये वुजूद में आता है। इसीलिए समाज में अम्न और इंसाफ़ की बात सुनते और करते रहना चाहिए, ताकि आपके साथ भी इंसाफ़ और अमन की बात हो. अगर हमारा नजरिया पसंद हो तो वीडियो को LIKE SHARE करने के बाद चैनल को SUBSCRIBE ज़रूर करलें ताकि अमन पसंद समाज जुड़ा रहे. अपने मेज़बान अली आदिल ख़ान को इजाज़त दें,
मेरा भारत ज़िंदाबाद

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