अब शिक्षा और लाठी चलेगी साथ साथ ? स्वायत्ता ले डूबेगी ?

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अब शिक्षा और लाठी चलेगी साथ साथ ? स्वायत्ता ले डूबेगी ?

आपको पता है न मानव संसाधन विकास मंत्रालय पहले भारत का शिक्षा मंत्रालय हुआ करता था , ऐसा क्यों हुआ इसके बारे में न तो सरकार ने बताया और न जनता ने पूछा . तो अब हम ही क्यों बताएं ,,मगर बताना तो पड़ेगा क्योंकि अब सरकार ने देश के लगभग 60 शिक्षा संस्थानों को UGC या यूनियन ग्रांट कमीशन की या सरकार की बंदिशों से आज़ाद कर दिया है , और अब ये संस्थान Aotonomous या स्वायत्ता संसथान बन गए हैं ।

जून 2017 तक देश में कुल 819 यूनिवर्सिटीज तैयार हुई थीं जिनमें 47 Central 367 State ,123 Deemed और 282 Private यूनिवर्सिटीज हैं .यह सुनिश्चित करने के लिए कि पूरे भारत में हर साल भारतीय स्कूलों से पास होने वाले छात्रों में सिर्फ 15 फ़ीसदी छात्र विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाएं,इसके लिए 1500 नए विश्वविद्यालय खोले जाने की ज़रूरत पड़ेगी. जबकि इस सबके लिए धन सिर्फ़ निजी क्षेत्र से ही आ सकता है.

आपको याद दिला दें भारतीय शिक्षा का आवंटित बजट Rs 85,010 करोड़ है जबकि भारत का सुरक्षा बजट 2017 – 18 , Rs. 3,59,854 करोड़ आवंटित किया गया है .जो शिक्षा के आवंटन से 4 गुना अधिक है .और स्वस्थ एवं परिवार कल्याण का इस साल का आम बजट है 52 ,800 करोड़ .अब अंदाज़ा आपको लगाना है की किस सेक्टर का बजट ज़्यादा या कम होना चाहिए ?

शिक्षा संस्थानों का निजी या व्यवसायीकरण शिक्षा की गुडवत्ता में कोई सुधार ला पायेगा के नहीं अलबत्ता उच्च शिक्षा में आने वाले गरीब विद्यार्थिओं का प्रतिशत कम होने की पूरी आशंका है .किन्तु ……………

उच्चतर शिक्षा पर शोध करने वाले पूर्व आईएएस अफ़सर पवन अग्रवाल कहते हैं कि अब समय आ गया है कि इस धारणा को बदला जाए कि विश्वविद्यालय शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को महान बनाना है.

भारत सरकार ने भी इसे शिक्षा मंत्रालय कहना बंद कर , मानव संसाधन मंत्रालय कहना शुरू कर दिया है. ब्रिटेन में भी अब इसे शिक्षा और कौशल मंत्रालय कहा जाने लगा है. ऑस्ट्रेलिया में इसे शिक्षा, रोज़गार और कार्यस्थल संबंध मंत्रालय कहा जाता है.

एनआईआईटी के संस्थापक राजेंद्र सिंह पवार कहते हैं, “अब उस जाति व्यवस्था से छुटकारा पाने की ज़रूरत है जिसने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया है जहाँ अगर एक इंसान व्यावसायिक शिक्षा लेने के लिए ट्रेन से उतरता है तो उसे बाद में उच्च शिक्षा के डिब्बे में सवार होने की अनुमति नहीं होती.”

Actually शिक्षा का मक़सद सभ्य समाज का निर्माण पहले और रोज़गार दुसरे नंबर पर होना चाहिए था , मगर शिक्षा के क्षेत्र में जबसे व्यवसाय आया तब से इसका ढांचा बदल गया . मुझे कई ऐसे लोगों से मिलने का इत्तेफ़ाक़ हुआ जो यूनिवर्सिटीज में डॉ, इंजीनियर लड़के तलाश करके उनके रिश्ते कराते हैं , डॉ को दहेज़ में 50 लाख इंजीनियर को 40 लाख और इसी तरह से डिग्री के हिसाब से दहेज़ की वेवस्था कराने का काम करते हैं .

हमने कहा यह तो जुर्म है तो जवाब मिला यह तो लड़के के घर वालों और कॉलेज के प्रबंधन से पूछो जुर्म है या बिज़नेस ,घर वालों ने लड़के का एडमिशन के वक़्त डोनेशन के नाम पर लाखों दिया और कॉलेज के प्रबंधन ने लिया वो क्या था .

दरअसल यह स्तर है हमारी शिक्षा का , अब जबकि देश के IIT , IIM , यूनिवर्सिटीज , colledges , को ऑटोनोमस किया गया है ऐसे में शिक्षा के मानवीय तथा नैतिक स्तर का सहज ही अंदाजा लगाया जासकता है .जिस तरह हाल ही में विश्वविद्यालयों को सरकार द्वारा स्वायत्ता या autonomous करदिये जाने के विरुद्ध JNU के छत्रों के मार्च के दौरान छात्रों और छात्राओं पर पुलिस का लाठी चार्ज हुआ और water cannon का प्रयोग हुआ वह वास्तव में निंदनीय है .

JNU के छात्रों का मानना है की स्वायत्ता के बाद उच्च शिक्षा की मंडी में जो उछाल आएगा वो देश का ग़रीब और आम आदमी बर्दाश्त नहीं कर सकता , पहले ही HIGHER एजुकेशन में आने वाले बच्चों का प्रतिशत चिंतनीय स्तर तक गिरा हुआ है अब इसमें भारी कमी आजायेगी ऐसा मानना है विद्यार्थियों का और यह स्वाभाविक (असलियत ) भी है .

यूँ तो विद्यार्थियों के आंदोलन देश में होते रहे हैं और लाठी डंडे भी students खाते रहे हैं किन्तु वो कुछ और वजह से रहा , अब देखना यह है की क्या देश का युवा उच्च शिक्षा के साथ लाठियां भी खाता रहेगा अपने अधिकारों के लिए …या यूँ कहें कि शिक्षा और पुलिस की लाठी साथ साथ चलेगी ?editor’s desk

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