
प्राकृतिक चमत्कार: पारितंत्र सेवायें
डाॅ. लक्ष्मी कांत दाधीच
पर्यावरणविद्
2-क-2, विज्ञान नगर, कोटा।
प्रकृति में पारितंत्र सेवायें (इकोसिस्टम सर्विसेस) प्रकृति प्रदत्त अनुपम उपहार है जो किसी प्राकृतिक चमत्कार से कम नही है। मानव के पास उपलबध सभी विज्ञान प्रदत्त शक्तियों के बाद भी यदि मानव के पास स्वयं से कुछ बनाने की क्षमता है तो वह उसका उपयोग स्वचरित्र बनाने के साथ स्वयं के स्वास्थ्य रक्षण हेतु कर सकता है। चरित्र एवं स्वास्थ्य के अतिरिक्त मानव की तमाम आवष्यकता पूर्ति हेतु उसे प्रकृति की ओर ही निहारना पड़ता है। मानव की सभी आवष्यकताओं के स्त्रोत मिट्टी, पानी और हवा में निहित हैं जिनकी उपस्थिति ही वनस्पति एवं जीव जन्तुओं के जीवन का रहस्य खोलने में सक्षम होती है।
मानवीय मस्तिश्क की सोच से परे जीवनयापन हेतु आवष्यक गैस आॅक्सीजन प्रकृति की ही देन है। ईष्वर ने गैसों के विनिमय हेतु जीव जंतुओं को नाक प्रदान की जिसके माध्यम से गैंसों का आदान प्रदान संभव हो सका है और इसी आदान प्रदान में आॅक्सीजन का महत्व मानव को स्पश्ट हो चुका है तथा पादपों (पौधों) हेतु भोजनार्थ कार्बन डाई आॅक्साइड की आवष्यकता पूर्ति मानव द्वारा संभव हो सकी है। परंतु आज के समय में बढ़ते जन, बढ़ता प्रदूशण तथा घटते वन ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं जिनसे वायु मंडलीय गैसों के प्रतिषत में परिवर्तन होने लगा है। जरूरी है वायु के संघठन को बनाये रखने तथा प्रकृति को पूरा सहयोग करने की।
वायु के अतिरिक्त पारितंत्र सेवाओं का चमत्कार मिट्टी की उर्वरकता को बनाये रखने हेतु देखा जा सकता है। यह प्रकृति का चमत्कार ही है कि वायुमण्डल में उपस्थित नाइट्रोजन गैस को पौधों की जड़ों में मौजूद ग्रंथिल मूल के साथ बैक्टीरिया रूपान्तरित कर आवष्यक अवषोशणीय तत्वों में परिवर्तित कर देते हैं। यही मूल बाद में नोड़यूलेटेड रूटस के रूप में मृदा को उपजाऊ बनाने का कार्य संपन्न करता है। प्रकृति में मौजूद ये सूक्ष्मजीव जिस प्रकार से प्रकृति के आदेषानुरूप मिट्टी को मृदा में बदलते हैं तथा मृदा में ह्यूमीकरण माध्यम से मिट्टी की उर्वरा षक्ति में वृद्धि करते हैं। यदि इसी कार्य को किसी कारखाने में किया जाये तो समझा जा सकता है कि यह कितनी श्रमसाध्य एवं खर्चीली व्यवस्था होगी जिसे प्रकृति हमें बिना किसी खर्च के उपलब्ध करा रही है और हम बिना सोचे समझे मिट्टी को रसायनों के साथ पोलीथिन थैलियों का भोजन करा रहे हैं और फिर मिट्टी की उर्वरता को कोस भी रहे हैं।
प्रकृति प्रदत्त पारितंत्र सेवाओं के कई रूपों में षुद्ध एवं स्वच्छ जल की उपलब्धता, वायुमण्डलीय एवं जलवायु परिवर्तन से रक्षा, परागण से पौधों का प्रजनन एवं विकास, नागरिकों की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक आवष्यकता पूर्ति, भविश्य की संभावनाओं से पारिस्थितिकीय लाभों का विवेचन तथा प्राकृतिक वनों के माध्यम से वाश्पीकृत वाश्पोत्सर्जन द्वारा बादलों से जल की वापसी आदि प्रमुख हैं जिन्हें निष्चय ही मानव द्वारा विज्ञान की संपूर्ण प्रगति, उन्नति तथा प्रोन्नति के बाद भी किसी भी प्रयोगषाला में बनाना लगभग असंभव है। पारितंत्र सेवाओं का महत्व मानव के जीवन अस्तित्व से सीधा जुडा है। मानव हेतु आवष्यक वन, औशधियां, पार्क, किचन गार्डन, षहर, गांव, खेत, कुँए , बावड़ी, नदियां, तालाब, कस्बे तथा उद्योग सभी का पारितंत्र सेवाओं से सीधा संबंध है। सेव, संतरे, अंगूर, आम के बगीचे तभी लाभदायक होते हैं जब मृदा जैव विविधता अत्याधिक संपन्न होती है। पर्याप्त जल तथा उपयुक्त सूक्ष्मजीव अच्छे फलों की उत्पत्ति के सूचक माने जाते हैं।
पारिपर्यटन का सीधा संबंध तो प्राकृतिक स्थलों से ही है। पर्वत, झील, झरने, निर्मल वातावरण एवं वृक्षों के झुरमुट, कदंब के कुंज सभी कुछ सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक परिवेष को सुरम्य बनाते हुये प्रदूशण से दूर प्राकृतिक प्रक्रिया की षानदार झलक दिखलाकर मन को प्रसन्न करते हैं। इन सब के विपरीत कचरे, धुंए, भीड़ और प्रदूशण से भरा-घिरा षहर सभी भौतिक सुविधाओं के बाद भी खतरे का संकेत करता है। भविश्य का खतरा यह कचरा षहरों में बीमारी का कारक है तो पहाड़ों पर पोलीथिन प्लास्टिक रहित वानस्पतिक कचरा कईं जीवों का भोजन है तो कईयों हेतु अच्छा पोशण भी है जिसे केवल पारितंत्र सेवाओं के रूप में सुचारू व्यवस्था का जनक समझा जाता है। यह विचारना अत्यावष्यक है कि पारितंत्र सेवाओं के स्थान पर हम तकनीकी सेवाओं को काम में लेकर जीवन को आनंददायी बना सकते हैं। जरा सोचिए क्या हम चिड़िया, मधुमक्खी, कीट, पतंगे, भौरों आदि को उत्पन्न कर सकेगें जो परागण में हमारी भरपूर मदद करते हैं और जिन पर हमारे कृशि सहित कई उद्योगों की निर्भरता है। घटते वन, घटती जैव विविधता तथा घटते पक्षी तथा घटता पर्यावास एवं प्राकृतवास क्या हम पुनः बना पायेंगे। क्या हमारी तकनीकें और वैज्ञानिक सोच हमें प्राकृतिक पारितंत्रों को लौटा सकेगा? षायद ‘हां‘ परंतु किस मूल्य पर यह भी तो हमें ही सोचना होगा।
पारितंत्र सेवाओं का भविश्य प्रकृति पर नहीं हमारे दृश्टिकोण पर निर्भर करेगा। हम किस प्रकार प्रकृति का सहयोग लेते हैं तथा किस प्रकार प्रकृति का दोहन-षोशण करते हैं यह हमारे ही दृश्टिकोण पर निर्भर करेगा। हम ही चाहेंगे कि विनाष रहित विकास हमारी ही आवष्यकता है जो भावी पीढ़ी को भी विकास के फलों को चखने में सहायक हो सकेगी अन्यथा पर्याप्त धनराषि के बाद भी हम प्राकृतिक वातावरण का निर्माण नहीं कर सकेंगे और तभी हमें इन पारितंत्र सेवाओं की याद आयेगी परन्तु सेवायें दुर्लभ हो जायेगी।