आज कल होता गया और दिन हवा होते गए

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कलीमुल हफ़ीज़

दुनिया में रोशनी की रफ़्तार बहुत तेज़ है। अंतरिक्ष में रोशनी की रफ़्तार 299,792,458 मीटर प्रति सेकंड है। लेकिन रोशनी की रफ़्तार से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार वक़्त की है। वक़्त दबे पाँव चला जाता है। कल के बच्चे आज जवान हो गए और कल बूढ़े हो जाएँगे। न जाने कितने लोगों को काँधे पर सवार करके क़ब्रिस्तान पहुँचा आए हैं और न जाने कब हमारी बारी आ जाए।

हम में से हर एक को वक़्त से शिकायत रहती है। किसी के पास वक़्त कम है तो किसी का वक़्त काटे नहीं कटता। किसी का वक़्त ख़राब है तो किसी को ख़राब वक़्त आने का डर है। बुज़ुर्गों ने कहा है कि वक़्त के मूल्य को समझोगे तो वक़्त भी तुम्हारी क़ीमत को समझेगा। अगर वक़्त की क़ीमत को न समझोगे तो वक़्त बर्बाद कर देगा। दिवाकर राही ने कहा था कि:

वक़्त बर्बाद करने वालों को।
वक़्त बर्बाद करके छोड़ेगा॥

वक़्त का सही इस्तेमाल जीवन की सफलता की कुंजी है। जिसने यह फ़न सीख लिया वक़्त उसे अपने सर-आँखों पर बिठाता है। दुनिया में हर इन्सान को 24 घंटे ही दिये गए हैं। इन्हीं 24 घंटों के इस्तेमाल से कोई करोड़ों कमाता है और किसी के हाथ कोड़ी भी नहीं आती। दुनिया में जितने भी बड़े इन्सान हुए उन सबकी ये मिली-जुली ख़ूबी है कि उन्होंने वक़्त का सही इस्तेमाल किया।

इस्लाम ने वक़्त की क़ीमत पहचानने की ताकीद की, पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) ने फ़ुर्सत के पलों को बड़ी दौलत कहा। नमाज़ों के लिये वक़्त निश्चित करना, रोज़ों के लिये कुछ दिनों को निश्चित करना और हज के लिये महीने को निश्चित करना वक़्त के महत्व की दलीलें हैं।
वक़्त को सही इस्तेमाल करने की प्लानिंग में सबसे पहले हमें यह समझ लेना चाहिये कि हमारा वक़्त कहाँ और किन कामों में ख़र्च हो रहा है?

हमें देखना होगा कि वक़्त कहाँ बर्बाद हो रहा है? आम तौर पर आदमी अपना वक़्त सुबह में देर तक सोने, दोस्तों के साथ गप-शप करने, टेलेफ़ोन पर लम्बी बेकार बातें करने, सोशल मीडिया पर मेसेज भेजने और चैटिंग करने के साथ खेल-तमाशा देखने में बर्बाद कर देता है। कभी आपने सोचा कि आप कितना वक़्त बर्बाद करते हैं? सुबह पाँच बजे उठने के बजाय आप आठ बजे उठते हैं और तीन घंटे यानी 180 मिनट और एक हज़ार आठ सो सेकंड बर्बाद कर देते हैं।

कुछ लोग फ़ज्र की नमाज़ से सुबह 09 बजे तक बहुत काम कर लेते हैं जबकि कुछ लोग करवटें बदलने में यह वक़्त गुज़ार देते हैं। कुछ लोग फ़ज्र के वक़्त उठते भी हैं तो नमाज़ पढ़कर सो जाते हैं। फ़ोन पर जो बात दो मिनट में हो सकती थी आप बीस मिनट लगा देते हैं, इस तरह के दस फ़ोन आ गए तो दो सो मिनट यानी तीन घंटे से अधिक बेकार चले गए, किसी दोस्त से मुलाक़ात के लिये पन्द्रह बीस मिनट काफ़ी होते हैं, मगर आपने दो घंटे लगा दिये, सोशल मीडिया पर दस मिनट में काम चल सकता था लेकिन आपने मैसेज पढ़ने और वीडियो देखने में तीन-चार घंटे लगा दिये, हमारे रिटायर्ड दानिशवर ड्राइंग रूम में बैठ कर घंटों दिमाग़ी वर्ज़िश करते हैं, देश-विदेश की समस्याओं पर बातें करते हैं कि जैसे उन्हें ही इनके हल करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। जबकि अमल के नाम पर इन्हें साँप सूँघ जाता है।

ज़रा अन्दाज़ा कीजिये आपने एक दिन में 8 से 10 घंटे यूँ ही बर्बाद कर दिये। ये तो एक दिन का हिसाब है। इसी से आप महीने और साल का भी हिसाब लगा सकते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि दुनिया में एक घंटे में कितना बदलाव आ जाता है। एक घंटे में हवाई जहाज़ एक हज़ार किलोमीटर का सफ़र कर सकता है, तेज़ रफ़्तार की ट्रैन तीन सौ किलोमीटर पहुँच जाती है। क़ुरआन का एक हाफ़िज़ क़ुरआन के सौ पेज की तिलावत कर लेता है। हिन्दुस्तान में ही दो हज़ार बच्चे जन्म लेते हैं और छः सौ से अधिक लोग हर घंटे इस दुनिया को छोड़ जाते हैं। मुकेश अंबानी एक घंटे में लगभग ग्यारह करोड़ रुपये कमाता है। बिल गेट्स इससे भी अधिक कमाता है।


हमें अपनी ग़रीबी दूर करने,अज्ञानता मिटाने और हेल्थ को बनाए रखने के लिये ज़रूरी है कि हम अपने वक़्त को मैनेज करें। सोने के छः घंटे, खाने-पीने और दूसरी ज़रूरतों और नमाज़ के लिये तीन घंटे निकाल दीजिये तो पन्द्रह घंटे हमारे पास बचते हैं। अब अगर हम नौकरी करते हैं तो आठ घंटे, मज़दूरी करते हैं तो दस घंटे, दुकानदार हैं तो 12 घंटे, स्टूडेंट हैं तो छः घंटे लगते हैं। बहुत-से लोगों को नौकरी पर आने और जाने में अच्छा ख़ासा वक़्त लग जाता है।

मगर ऐसा केवल पाँच पर्सेंट लोगों के साथ होता है। इसके अलावा नौकरी करने वालों के पास हफ़्ते की छुट्टी भी है। शिक्षा क्षेत्र के लोगों के पास तो वक़्त ही वक़्त है। हमारी घरेलु औरतों में से अधिकतर के पास इतना वक़्त है कि देहलीज़ पर खड़े होकर घंटों बातें कर सकती हैं। लेकिन ये क़ीमती वक़्त जिसे निजी तरक़्क़ी के साथ-साथ क़ौम और मुल्क की तरक़्क़ी के लिये इस्तेमाल किया जा सकता था फ़ुज़ूल और बेकार कामों में बर्बाद कर दिया जाता है। ऊपर से शिकायत है कि वक़्त नहीं है। एक बाप को अपने बच्चे की एजुकेशन के लिये, एक माँ को अपने घर के बच्चों को सिखाने-पढ़ाने के लिये, एक डॉक्टर को ग़रीब मरीज़ों के लिये, एक टीचर को मोहल्ले के अशिक्षित लोगों को शिक्षा देने के लिये, आलिमों को क़ौम के सुधार के लिये, इंटेलेक्चुअल्स और दानिशवरों को समाज की सेवा के लिये वक़्त नहीं है।

वक़्त के सही इस्तेमाल के लिये ज़रूरी है कि सबसे पहले हम अपने जीवन का उद्देश्य तय करें। हमें क्या बनना है? कहाँ पहुँचना है? बे-मक़सद और उद्देश्यहीन जीवन गुज़ारने वाले इधर-उधर भटकते रहते हैं। अपने बच्चों की एजुकेशन की मंज़िल तय करें। अपने कारोबार की ऊँचाइयाँ तय करें। इन्सान के लिये अपनी एजुकेशन, अपना कारोबार या कमाई का ज़रिआ, अपने बच्चों की एजुकेशन और उनकी कमाई का ज़रिआ, शादी और मकान वे अहम् काम हैं जो उसे दुनिया में अंजाम देने होते हैं। लेकिन इन कामों के लिये भी प्लानिंग की ज़रूरत है।

इन कामों के बाद समाज और देश के विकास में सहयोग करना, मोहल्ले और बस्ती में अच्छाइयों को बढ़ाना और बुराइयों को ख़त्म करना अपने मोहल्ले और बस्ती की ग़रीबी और जहालत को दूर करना, अपने सगे-सम्बन्धियों की समस्याएँ हल करना, दोस्तों को ऊपर उठाना आदि वे काम हैं जिनको अपने जीवन के उद्देश्य और अपनी प्लानिंग में शामिल करना चाहिये। दुनिया में तरक़्क़ी हासिल करने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि एक मोमिन की कामयाबी जहन्नम से बच जाने और जन्नत में दाख़िल हो जाने में है।


दूसरी बात यह है कि सभी बेकार, फ़ुज़ूल, बेमक़सद और बेनतीजा काम छोड़ देने चाहियें। बेकार काम करना भी बेकार है। जैसे कि स्कूल का एक वक़्त है। स्कूल टाइम में एक स्टूडेंट को स्कूल के शेड्यूल को फ़ॉलौ करना है। इस वक़्त अगर वह कोई बिज़नेस करता है तो वह बेकार है चाहे इससे उसको कितना ही पैसा हासिल होता हो। इसी तरह फ़र्ज़ नमाज़ का वक़्त निश्चित है। अब यदि कोई व्यक्ति जमाअत की नमाज़ में शामिल न होकर क़ुरआन की तिलावत करने लगे तो यह तिलावत उसके मुँह पर मार दी जाएगी।


तीसरा काम यह करना है कि ऐसे दोस्तों से माफ़ी चाह लें जो अपने साथ-साथ आपका भी वक़्त बर्बाद करते हैं या फिर उनके अन्दर सुधार लाएँ। दोस्तों से सम्बन्ध रखिये। उनके साथ पिकनिक और सैर-सपाटा भी कीजिये। लेकिन इसका भी वक़्त निश्चित हो। उसको भी उद्देश्यपूर्ण और बामक़सद बनाया जाए।


चौथी बात यह है कि हर काम को इतना वक़्त दीजिये जितने वक़्त का वह काम हक़ रखता है। एजुकेशन, कारोबार, घर-परिवार, सगे-सम्बन्धी, यार-दोस्त, सैर-सपाटा, एक्सरसाइज़, इबादत और तिलावत, बीमारों का हाल पूछने जाना, लोगों की ख़ुशी और ग़म में शिरकत, दूसरों की मदद और हिमायत इत्यादि में प्राथमिकता तय कीजिये। आने वाले कल के कामों की लिस्ट रात को सोने से पहले बना लीजिये, कौन-सा काम पहले करना है और कौन-सा बाद में, इसकी भी एक लिस्ट बनाइये। यदि किसी से मिलने का काम है तो पहले से वक़्त ले लीजिये, मुलाक़ात करते वक़्त ज़्यादा वक़्त मत लीजिये, सोचिये अगर आपको फ़ुर्सत है तो हो सकता है सामने वाले को कोई अहम् काम हो और वह आप से लिहाज़ में जाने के लिये न कह रहा हो।


पाँचवीं बात यह है कि वक़्त बचाने का हुनर भी सीखिये। काम शुरू करने से पहले इस पर ख़ूब विचार कीजिये कि किसी काम को कम वक़्त में किस तरह किया जा सकता है? जैसे कि आपको दिल्ली से मुरादाबाद का सफ़र करना है। दिल्ली से मुरादाबाद लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर है। अपनी कार से तीन घंटे लगते हैं, मगर यही सफ़र रात के आख़िरी वक़्त में किया जाए तो मात्र ढाई घंटे में हो सकता है।

सुबह नौ बजे से शाम नौ बजे के बीच करें तो चार घंटे लग सकते हैं। ये आपके ऊपर है कि वक़्त किस तरह बचाया जाए। शादी के फ़ंक्शन में दो काम अहम् हैं एक निकाह और दूसरा वलीमा, एक व्यक्ति इन दोनों कामों में शिरकत के लिये बतौर मेहमान तीन दिन लगाता है और एक व्यक्ति मात्र तीन घंटे। मैंने ग़रीब, मज़दूर, रेढ़ी, रिक्शा चलाने वालों को देखा है कि वे कई-कई दिन शादी में मेहमान-नवाज़ी में लगा देते हैं। इसी तरह त्यौहार के अवसर पर भी बहुत-से लोग हफ़्तों अपना कारोबार बन्द रखते हैं, हालाँकि उन त्योहारों की दीन में कोई हैसियत भी नहीं होती।


आख़िरी बात यह है कि आज का काम आज ही करने की आदत डालिये, कामों को कल पर मत टालिये, कुछ लोग कल-कल करते महीनों और सालों गुज़ार देते हैं और दुनिया से वापसी का वक़्त आ जाता है। अन्त में शिकायत होती है कि:

वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में मुनीर।
आज कल होता गया और दिन हवा होते गए॥

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