
आज़ादी की लड़ाई के लिए देश में कई प्रकार के आनदोलन हो रहे थे , देश की सियासी तस्वीर और तक़दीर भी बदलने जा रही थी !लेकिन उस वक़्त भी भारत के अंदर ही कई विचार धाराएं उभर रही थीं मगर ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा थी जो देश में अँगरेज़ साम्राजयवाद और सामंतवाद जो आज भारतीय साम्राजयवाद और सामंतवाद के नाम से प्रचलित है से आज़ादी चाहते थे , मगर वहीँ अँगरेज़ साम्राजयवाद के पिछलग्गुओं की भी संख्या कम न थी !आज देश भक्ति के दावे करने वालों के सम्बन्ध में ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं जिससे यह पता चलता है की वो लोग अंग्रेज़ों के समर्थक और क्रांतिकारियों के विरोधी थे !
देश में सामजिक सुरक्षा का हाल यह है की गो माता तक अभी भी सुरक्षित नहीं है जो कभी भी ज़ुल्म का शिकार होजाती है ! ,जैसा की रोज़ कहीं न कहीं गो हत्या के आरोप में गिरफ़्तारी (सही या ग़लत ) या देश के स्वयं सुरक्षा कर्मिओं (संघिओं) द्वारा क़ानून हाथ में लेकर कई मवेशी बोपारियों की हत्या और लूट मार की घटनाएं भी सामने आती रही हैं जिस देश में आस्था के नाम पर बोपार होरहा हो , साक्षात्कार भगवान् समान की तस्करी हो रही हो वहां law & order की स्तिथि का अंदाजा सहज ही लगाया जासकता है !
सच्चाई यह है की कांग्रेस के 55 वर्षों के कार्येकाल में जो माहौल बनना चाहिए था वो नहीं बन पाया जिसका फायदा सांप्रदायिक शक्तिओं ने उठाया जो सांप्रदायिक शक्तियां कही जा रही हैं होसकता है देश के कुछ लोगों की नज़र में वो ही देश भक्त पार्टियां हों लेकिन समर्थकों की संख्या अभी भी पूरे देश में 12 से 18 % से ज़्यादा नहीं है देश के 2014 आम चुनाव के वोट प्रतिशत ने यह साबित करदिया है! हम यह कहते रहे हैं की NDA सरकार की नीतियां बेहतर हैं किन्तु उनपर काम नहीं होरहा है , देश में जिन मुद्दों को लेकर आम चुनाव बीजेपी ने लड़ा था अभी तक उसपर काम शुरू भी नहीं हो पाया है ,अभी तो वो सारे मुद्दे लव जिहाद , गोरक्षा , सहिष्णुता , और भारत माता की जय जैसे भूत की शक्ल में देश में घूम रहे हैं !
आज दलित और अल्पसंख्यक पर जो हमले होरहे हैं वो देश के संविधान और क़ानून के खिलाफ होरहा है !कल को संविधान बदलने की भी बात हो रही है हालांकि यह आग का दरिया है जिसमें डूबकर ख़ाक भी होजाने की पूरी आशंका है !कुल मिलाकर देश की राजनितिक व सामाजिक वयवस्था पर बड़ी चोट लगरही है जिसके फ़िलहाल बेहतर होने की कोई सूरत नहीं है , ऐसे में कन्हैया आंदोलन देश की सेक्युलर जनता को कुछ भाता नज़र आया जिसको समर्थन भी मिला दूसरी तरफ देश की सबसे पुरानी राजनितिक पटरी के राजकुमार कुछ ख़ास करता नज़र भी नहीं आरहे पार्टी अंतर्कलह की शिकार है सोनिया के क़रीबी राहुल को अध्यक्ष नहीं देखना चाहते तो राहुल की परिकर्मा कर कुछ कॉंग्रेसी नेता बनी साख को बनाए रखना चाहते हैं कांग्रेस से इंद्रा जी , राजीव जी और अब सोनिया जी के दौर में भी कमियां तो होती रही हैं जिसका खामयाजा पार्टी को समय समय पर भुकतना पड़ा है अब एक और ग़लती सोनिया जी करके देखलें की जनता में लोकप्रिय हो चुके कन्हैया को पार्टी के उपाध्यक्ष पद का न्योता देकर देखें अगर यह खिलाडी बॉउंड्री पर पहुँच चुके अल्पसंख्यक और दलित समाज के वोट बटोर लाता है तो कांग्रेस हारी पारी को जीतने की POSITION में आसकती है ऐसा हमारा आभास है और इसको यकीन भी कहा जासकता है और हम तो ग़लती करने के लिए ही कहरहे हैं पद से हटाना तो CWC के ही नियंतरण में है ना ?जब चाहे कन्हैया का कान पकड़कर ……..EDITOR ‘S DESK