नफरत की आग कब बुझेगी? अब ‘कारपोरेट जिहाद’

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Ram puniani
Prof Ram Puniyani

हाल में महाराष्ट्र का नासिक शहर दो बार अखबारों की सुर्खियों में रहा। पहली बार अशोक खरात के मामले को लेकर, जो एक ढ़ोंगी बाबा था और महिलाओं, खासकर समाज के उच्च वर्ग की महिलाओं, का यौन शोषण करता था। उसने अपनी छवि एक चमत्कारी बाबा की बनाने के लिए कुछ नए तरीके अपनाए।

वह लोगों को उनका अतीत, वर्तमान और भविष्य बताकर प्रभावित करता था। वह महिलाओं को ब्रेन वाश कर उन्हें अपना अनुयायी बनाता था और उन्हें अपना सब कुछ उसे समर्पित कर देने के लिए राजी कर अपनी शारीरिक भूख मिटाता था। उसने सांप और अन्य जंगली जानवर पाले हुए थे और वह इन जानवरों से महिलाओं को डराकर कर उन्हें अपनी बात मानने के लिए मजबूर करता था।

अंधश्रद्धा के इसी क्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई, धीरेन्द्र शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर धाम बाबा के नाम से जाना जाता है, से मिलने गए। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि गवई यह दावा करते हैं कि वे डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के अनुयायी हैं। अम्बेडकर केवल और केवल तार्किकता में विश्वास रखते थे।

इस मामले को मीडिया ने थोड़ा-बहुत कव्हर किया और बजरंग दल और उसके जैसे अन्य संगठन चुप्पी साधे रहे क्योंकि यह एक हिन्दू बाबा द्वारा हिन्दू महिलाओं के दैहिक शोषण का मामला था मगर चूंकि इसमें कोई मुसलमान शामिल नहीं था।

लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद नफरती तत्वों को इसी नासिक से नफरत की आग भड़काने के लिए पुलिस की एक रिपोर्ट के रूप में भरपूर ईधन मिल गया। इस रपट में एक हिंदू लड़की ने दावा किया था कि एक मुस्लिम कर्मचारी उसका यौन शोषण कर रहा है।

इस मुस्लिम कर्मचारी का इस लड़की से अफेयर चल रहा था और लड़की के मुताबिक उस मुस्लिम युवक ने उससे शादी करने का वादा किया था, किंतु बाद में वह मुकर गया। पुलिस को की गई इस शिकायत से पुलिस और हिन्दुत्ववादी तत्वों को सक्रिय होने का अवसर मिल गया और पुलिस की एक गोपनीय कार्यवाही शुरू हुई।

पुलिस की जांच, जिसकी सराहना राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस तक ने की, के अनुसार टाटा कन्सलटेंसी सर्विसिस (टीसीएस) में धर्मपरिवर्तन कराने की एक योजनाबद्ध साजिश को अमल में लाया जा रहा था। कुछ मुस्लिम कर्मचारी (जिनकी संख्या सात थी) हिंदू कर्मचारियों को लालच देकर और डरा धमका कर उनसे नमाज पढ़वाने और उन्हें गौमांस खिलाने का अभियान चला रहे थे।

इस मामले से जुड़ी खबरें मीडिया में छाई हुई हैं और एक नया शब्द ‘कारपोरेट जिहाद’ गढ़ लिया गया है। इससे आशय यह है कि बड़ी कंपनियों में मुस्लिम कर्मचारी लव जिहाद और धर्मपरिवर्तन में जुटे हुए हैं। टीसीएस ने सभी आरोपी कर्मचारियों को निलंबित कर दिया, और कहा कि कदाचार को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। टाटा सन्स के प्रमुख एन. चन्द्रशेखरन ने इन आरोपों को ‘अत्यंत चिंतानक‘ बताया।

सिटीजन्स कमेटी, मुंबई (एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्षन ऑफ सिविल राईट्स और पीयूसीएल की संयुक्त समिति), निरंजन टल्के और अन्यों ने इस मामले की जांच-पड़ताल की। जांच पूरी होने के बाद उन्होंने मुंबई में एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया। टल्के ने बताया कि पुलिस की जांच में कई गड़बड़ियां और कमियां हैं। पहली, यह कि निदा खान, जो एचआर विभाग की प्रमुख थी, महिला कर्मचारियों को मजबूर करके अपना शिकार बनाती थी।

सच यह है कि निदा खान एचआर विभाग की प्रमुख नहीं बल्कि मात्र एक टेलिकालर थी। यह दावा कि इस साजिश पर पिछले चार सालों से अमल किया जा रहा था, बिल्कुल गलत है क्योंकि टीसीएस के नासिक कार्यालय से धर्मपरिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार करने का एक भी मामला सामने नहीं आया है। धर्म परिवर्तन की एक घटना जरूर हुई है जिसमें जोहाना नाम की एक ईसाई लड़की ने हिंदू धर्म ग्रहण किया है।

समिति ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि जिन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, वे अन्य लोगों को जबरदस्ती गौमांस खिलाते थे। क्या यह मुमकिन है कि थोड़े से कर्मचारी अन्य कर्मचारियों को, जिनकी संख्या उनसे कई गुना अधिक है, को कुछ भी खाने के लिए मजबूर कर सकें।

इसके अलावा मुख्य आरोपी दानिश शेख पर दुष्कर्म और उस लड़की से अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाने का जो आरोप लगाया गया है, वह भी सच नहीं लगता क्योंकि दानिश की पत्नि और तथाकथित पीड़ित लड़की के बीच व्हाटसएप पर संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता था। साथ ही यह लड़की दानिश के साथ मोटरसाईकिल पर नासिक से 27 किलोमीटर दूर पर्यटन स्थल त्रयंबकेश्वर गई थी।

यह सवाल किए जाने पर कि मुस्लिम कर्मचारियों की छवि बिगाड़ने की इस योजना का उद्धेश्य क्या है, टल्के ने कहा कि ऐसा लगता है कि इसका उद्धेश्य सभी मुसलमानों के प्रति नफरत बढ़ाना था। पत्रकार वार्ता में मौजूद तीस्ता सीतलवाड, जो मानवाधिकारों एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अथक प्रयास करती रहती हैं, ने कहा कि ऐसा लगता है कि यह सुनिश्चित करने का योजनाबद्ध प्रयास किया जा रहा है कि कंपनियां शिक्षित मुस्लिम युवाओं को नौकरी न दें। यह शिक्षित मुसलमानों पर उन्हें बदनाम करने के उद्धेश्य से किया गया हमला है। इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा इन दो लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उठाया गया है।

समिति के सदस्यों ने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि मीडिया द्वारा तथ्यों की पुष्टि किए बिना दहशत पैदा करने का यह काम बहुत परेशान करने वाला है। निदा खान, जिसे इस पूरी साजिश का मुख्य पात्र बताया जा रहा है, का कई महीने वाले मुंबई कार्यालय में स्थानांतरण हो चुका था जहां वह अपने परिवार के साथ रह रही थी।

‘हिंदू खतरे में हैं‘ की धारणा को एक बार फिर खाद-पानी दिया जा रहा है। धर्मपरिवर्तन और लव जिहाद का प्रोपेगेंडा इसके मुख्य हथियार नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही इसका उद्धेश्य टीसीएस जैसी कंपनियों में मुसलमानों को रोजगार मिलने की संभावना को कम करना भी है। यौन उत्पीड़न की घटनाओं के संबंध में अशोक खरात के मामले को दबाने और दानिश के मामले को बढ़ा-चढ़ाकर, झूठ का सहारा लेकर, उछालने का मीडिया का यह रवैया अत्यंत निंदनीय है।

हम यहां से किस तरफ जाएंगे? साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा गढ़ा गया आख्यान कुछ ही घंटों में समाज को जकड़ लेता है जबकि पूरी सच्चाई सामने आने में कई दिन या हफ्ते लग जाते हैं। साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा स्थापित किया गया तंत्र, मीडिया की मदद और जांच एजेन्सियों का पक्षपातपूर्ण रवैया एक खतरनाक मिश्रण है जो नफरत बढ़ाता है और अल्पसंख्यक समुदाय को हाशिए की ओर धकेल देता है।

जहां तक लव जिहाद की बात है, यह बांटने वाली ताकतों के हाथ आया बहुत बड़ा हथियार है जिसके जरिए वे हिंदू लड़कियों की आजादी पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने में कामयाब हो रहे हैं। इस मामले में की गई गहन जांच-पड़तालों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह कपोल कल्पित प्रोपेगेंडा के अलावा कुछ नहीं है।

हादिया (धर्मपरिवर्तन के पूर्व अखिला) के मामले सहित ऐसे ज्यादातर मामले जो न्यायालयों तक पहुंचे, में यह साबित हुआ कि लड़कियों द्वारा स्वतंत्रतापूर्वक, स्वेच्छा से फैसले लिए गए थे। ‘केरेला स्टोरी‘ फिल्म ने इस दिशा में प्रोपेंगेडा को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा की।

मुसलमान लव जिहाद और धर्मपरिवर्तन के जरिए अपनी जनसंख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, यह आरोप इतनी बार दुहराया गया है कि लोग इसे सुनते-सुनते ऊब गए हैं। यह हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा अत्यंत कुशलता पूर्वक चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है जिसके निशाने पर मुस्लिम समुदाय है। अब वे योजनाबद्ध तरीके से टीसीएस जैसे मामले उठाकर मुस्लिम युवकों के रोजगार हासिल करने की राह में बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।

हमें याद है कि कोविड-19 महामारी के दौरान ‘कोरोना जिहाद’ जैसे शब्द गढ़े गए थे। उस समय यह प्रोपेगेंडा फैलाया गया था कि मुसलमान कोरोना फैला रहे हैं, इसलिए फेरी लगाकर सामान बेचने वाले मुसलमानों को कालोनियों में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। अब मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार करने के आव्हान खुलेआम हो रहे हैं।

कई लोग यह दावा कर रहे हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में गिरावट आ रही है और पिछले कुछ वर्षों में कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ है। मगर हिंसा की छोटी-मोटी, विभिन्न इलाकों में छितरी हुई घटनाएं बड़ी संख्या में हो रही हैं जो हिंसा का ही एक रूप है। य

ह कई स्वरूपों में हो रहा है और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है। संबंधित संस्थानों को इस मामले की पूर्णतः सत्य और निष्पक्ष रपट जारी करनी चाहिए। टीसीएस जैसी कंपनियों को झूठे प्रोपेगेंडा का भंडाफोड़ करना चाहिए, झूठे आरोपों में फंसा दिए गए अपने निर्दोष कर्मचारियों की नौकरी बहाल करनी चाहिए, और दोषियों को दंड दिलवाने में मदद करनी चाहिए। (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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