
ईरान के ताज़ा हालात भी विश्लेषात्मक और विस्तृत जानकारी
अमेरिका और इज़राइल के साथ ईरान के बीच चल रहे टकराव के बीच ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने एयरबेस को हमलों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—अगर संघर्ष और बढ़ता है तो ईरान के साथ खड़े होने के दावे करने वाले देश रूस और चीन कहां तक उसका साथ देंगे?
दुनिया की नज़र अब इसी पर टिकी है कि Russia और China दोनों के ही Iran के साथ मजबूत कूटनीतिक, व्यापारिक और सैन्य रिश्ते होने के बावजूद मौजूदा हालात में सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहेंगे या ये दोनों ईरान को समर्थन भी देंगे ?
रूस: बयान कड़े, कदम हल्के?
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों पर रूस की प्रतिक्रिया अब तक काफी सीमित दिखाई दी है। मॉस्को ने तेहरान के प्रति एकजुटता जरूर जताई, लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे वह इस टकराव में सीधे शामिल होता नजर आए।
Dmitry Peskov, जो Kremlin के प्रवक्ता हैं, उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के बावजूद हालात “इतने खराब हो गए कि सीधे आक्रामकता तक पहुंच गए”। पेस्कोव (Peskov), रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के क्रेमलिन प्रेस सचिव और उप प्रमुख के रूप में कार्यरत एक प्रमुख रूसी राजनयिक और राजनेता हैं
पेस्कोव के मुताबिक रूस, ईरान के नेतृत्व और खाड़ी के उन देशों के साथ लगातार संपर्क में है, जो इस बढ़ते तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं Russian Foreign Ministry ने अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की निंदा की है। साथ ही उसने राजनीतिक हत्याओं और संप्रभु देशों के नेताओं को निशाना बनाए जाने को भी गलत बताया है।
लेकिन असली सवाल अभी भी क़ायम है कि, क्या रूस और चीन सिर्फ कूटनीतिक बयान देंगे, या अगर टकराव बढ़ता है तो सचमुच ईरान के साथ खड़े भी होंगे?
रविवार को Vladimir Putin ने Masoud Pezeshkian को संदेश भेजकर Ali Khamenei की हत्या पर संवेदना जताई और इसे “मानवीय नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का गंभीर उल्लंघन” बताया था।
लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि इतनी कड़ी प्रतिक्रिया के बावजूद मॉस्को ने सीधे तौर पर Donald Trump की व्यक्तिगत आलोचना क्यों नहीं की। इतना ही नहीं, Russia अब भी United States को Ukraine युद्ध में मध्यस्थता की कोशिशों के लिए धन्यवाद देता दिखाई दिया।
सोमवार को जब Dmitry Peskov से पूछा गया कि ऐसी स्थिति में रूस अमेरिका पर भरोसा कैसे कर सकता है, तो उन्होंने कहा कि रूस “सबसे पहले केवल खुद पर भरोसा करता है” और अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेता है।
रूस के इस रवैये से पता चलता है कि Iran के समर्थन में रूस की भूमिका फिलहाल ज़्यादातर कूटनीतिक बयानों तक ही सीमित रहेगी। हालाँकि आपको बता दें , Russian invasion of Ukraine के बाद ईरान, मॉस्को का अहम सहयोगी बना रहा है और तेहरान ने रूस को ड्रोन उपलब्ध कराए और पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के तरीकों में भी मदद की।
वहीं वैचारिक स्तर पर भी ईरान उस वैश्विक व्यवस्था की रूसी कल्पना से मेल खाता है, जिसमें दुनिया कई शक्तियों में बंटी हो, जहां मानवाधिकारों से ज्यादा महत्व राज्यों की संप्रभुता और सख्त सरकारी नियंत्रण को दिया जाए। ऐसे किसी शासन का पतन इस मॉडल के लिए बड़ा झटका माना जा सकता है।
लेकिन इन सबके बीच सवाल अब भी वही है क्या रूस का समर्थन केवल शब्दों तक सीमित रहेगा, या संकट गहराने पर वह वास्तव में ईरान के साथ खड़ा भी होगा?
याद रहे Russia पहले भी कई मौकों पर यह संकेत दे चुका है कि वह अपने साझेदारों के लिए हद से ज़्यादा जोखिम उठाने से बचता है. चाहे मामला Venezuela का रहा हो, Syria का, या फिर 2025 में Israel और Iran के बीच चले 12 दिन के युद्ध का।
ऐसे में संकेत यही मिलते हैं कि मॉस्को शायद कूटनीतिक समर्थन और सीमित सैन्य-तकनीकी सहयोग से आगे बढ़ने को तैयार नहीं है. या फिर उक्रैन जंग में मसरूफ होने की वजह से उसकी मजबूरी होगी।
इसके अलावा 17 जनवरी 2025 को रूस और ईरान के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी की संधि भी पूर्ण रक्षा समझौता नहीं थी। इस समझौते में दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास करने और “क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने” का वादा तो किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि किसी एक पर हमला हो तो दूसरा उसकी रक्षा के लिए सैन्य रूप से आगे आएगा।
दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते भी सीमित ही रहे हैं और द्विपक्षीय व्यापार लगभग 4 से 5 अरब डॉलर के आसपास रहता है। हालांकि हाल के वर्षों में सैन्य और औद्योगिक सहयोग तेजी से बढ़ा है।
Financial Times की फरवरी की एक रिपोर्ट के अनुसार एक बड़े रक्षा समझौते के तहत रूस ईरान को करीब 500 मिलियन यूरो के Verba MANPADS देने की योजना बना रहा है। इसके अलावा ईरान को Yakovlev Yak-130 ट्रेनिंग विमान और Mil Mi-28 अटैक हेलिकॉप्टर मिल चुके हैं, जबकि वह Sukhoi Su-35 फाइटर जेट्स की भी उम्मीद कर रहा है। हालांकि वर्बा सिस्टम की आपूर्ति अभी तक नहीं हुई है।
यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर ईरान के Shahed drones ने रूसी सेना की रणनीति में बड़ा बदलाव लाया था। लेकिन पिछले साल मॉस्को ने अपने ड्रोन उत्पादन में तेज़ी से वृद्धि कर ली, जिससे ईरानी हथियारों पर उसकी निर्भरता कम होती दिखाई दे रही है।
ऐसे में सवाल उठता है—मॉस्को के लिए ईरान की असली अहमियत क्या है? विश्लेषकों के मुताबिक रूस के लिए ईरान इतना महत्वपूर्ण जरूर है कि उसे पूरी तरह ढहने न दिया जाए, लेकिन शायद इतना भी महत्वपूर्ण नहीं कि उसके लिए सीधे युद्ध में कूड़ा जाए। जिस तरह अमेरिका इज़राइल के लिए कूद चूका है.
यानी फिलहाल संकेत यही हैं कि रूस की भूमिका ज़्यादातर कूटनीतिक बयानबाज़ी और सीमित सैन्य सहयोग तक ही सिमटी रह सकती है।
अब बात चीनी भूमिका की : कारोबार बड़ा, लेकिन जोखिम कितना?
China ने भी रूस की तरह Ali Khamenei की हत्या की कड़ी निंदा तो की है। और बीजिंग लंबे समय से उस नीति का विरोध करता रहा है जिसे वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारें बदलने की अमेरिकी कोशिश के तौर पर देखता है।
लेकिन यहाँ भी वही सवाल, क्या चीन का समर्थन सिर्फ बयान तक सीमित रहेगा, या वह संकट की घड़ी में Iran के लिए जंग में कूदेगा ?
दरअसल चीन-ईरान रिश्ते की असली बुनियाद आर्थिक साझेदारी है। चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसका सबसे अहम ऊर्जा ग्राहक भी।
United States की लंबे समय से लागू सख़्त पाबंदियों के बावजूद चीन ईरान के लिए एक तरह की आर्थिक लाइफ़लाइन बना रहा है। वह बड़ी मात्रा में रियायती दरों पर ईरानी तेल खरीदता रहा है। यह तेल अक्सर तथाकथित “घोस्ट फ़्लीट्स” के जरिए चीन तक पहुंचता है. यानी ऐसे जहाज़ जो झूठे रजिस्ट्रेशन या पहचान छिपाकर प्रतिबंधों से बचते हुए तेल ढोते हैं।
मसलन, 2025 में चीन ने ईरान के कुल निर्यातित तेल का 80 प्रतिशत से ज़्यादा खरीद लिया था। पश्चिमी बाज़ारों के लगभग बंद हो जाने के बावजूद, चीन से मिलने वाली इस आय ने ईरान को अपनी अर्थव्यवस्था संभालने और रक्षा खर्च जारी रखने में बड़ी मदद दी।
साल 2021 में दोनों देशों के बीच हुई 25 साल की रणनीतिक साझेदारी की संधि ने इस रिश्ते को और मजबूत कर दिया। इस समझौते के तहत चीन ने ईरान के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और दूरसंचार क्षेत्रों में सैकड़ों अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था।
लेकिन बड़ा सवाल वही ,क्या चीन अपने आर्थिक हितों से आगे बढ़कर ईरान के लिए कोई ठोस रणनीति या सैन्य जोखिम उठाने को भी तैयार होगा, या चीन का समर्थन भी कूटनीतिक बयानों तक ही सीमित रहेगा?
चीन का ‘दीर्घकालिक खेल’: संतुलन भी, हित भी?
इतिहास बताता है कि China ने हमेशा Iran, Israel और United States के बीच तनाव के मामलों में एक सावधानी भरी रणनीति अपनाई है। उदाहरण के तौर पर 2025 की गर्मियों में चले 12 दिन के इसराइल-ईरान युद्ध के दौरान बीजिंग ने लगातार “संयम” की अपील की और हिंसा के लिए “बाहरी हस्तक्षेप” को जिम्मेदार ठहराया. जिसे कई विश्लेषक अमेरिका की नीतियों की ओर इशारा मानते हैं।
पिछले टकरावों में चीन ने कई बार United Nations Security Council में ईरान के लिए कूटनीतिक ढाल का काम भी किया है . कभी वीटो लगाकर, तो कभी उसके संकेत भर से प्रस्तावों की भाषा नरम कराकर। लेकिन चीन ने कभी ईरान के समर्थन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप का रास्ता नहीं चुना।
बीजिंग की रणनीति अक्सर इस तरह समझी जाती है, अमेरिका को मध्य पूर्व में उलझाए रखो, लेकिन इतना भी नहीं कि पूरा क्षेत्र अस्थिर हो जाए और तेल की कीमतें आसमान छूने लगें।
दरअसल, ईरान चीन के लिए सिर्फ ऊर्जा का स्रोत नहीं है। अगर ईरान में पश्चिम समर्थित सरकार आ जाती है, तो यह बीजिंग के लिए बड़ा भू-राजनीतिक झटका हो सकता है, क्योंकि ईरान क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलन भी माना जाता है।
ईरान आज BRICS और Shanghai Cooperation Organisation दोनों का सदस्य है। साथ ही वह मध्य एशिया, कॉकसस और मध्य पूर्व को जोड़ने वाला एक अहम भूगोलिक पुल भी भी। ऐसे में इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था का ढह जाना उन बहुपक्षीय ढांचों की विश्वसनीयता को भी झटका दे सकता है जिन्हें Russia और चीन मिलकर मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
अगर अमेरिका और इसराइल ईरान पर पूर्ण सैन्य हमला नहीं करते, तो संभावना यही है कि देश की राजनीतिक और सैन्य संरचनाएं किसी न किसी रूप में बनी रहेंगी।
ऐसी स्थिति में चाहे Ali Khamenei के बाद कोई भी नया नेतृत्व सामने आए, लेकिन बीजिंग अपने पुराने तरीक़े पर क़ायम रह सकता है. यानी लंबा खेल खेलना, यानी नए नेतृत्व के साथ रिश्ते बनाना और अपने आर्थिक-रणनीतिक हित सुरक्षित रखना।
उधर मॉस्को की नीति भी कमोबेश इसी दिशा में दिखाई देती है, जहां Russia अपने हितों के अनुसार मौके तलाशता रहेगा, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से बचने की कोशिश करता रहेगा। ऐसे में खाड़ी के देशों की कूटनीति और राजनीती वहां की अवाम के निशाने पर नज़र आती है.
अगर अरब हुक्मरान इजराइल और अमेरिका की ग़ुलामी से बाज़ नहीं आते हैं और फलस्तीन व् ग़ज़ा की अवाम के अधिकारों की रक्षा नहीं करते हैं तो इस बात का इमकान है कि वहां की जनता ही अपने बादशाहों का तख़्ता पलट सकती है.