कौन डरता है जिहाद की ललकार से?

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Apradhmukr bharat ne
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

जमीयत उलेमा हिन्द के भोपाल जैसे के बाद एक आंकड़ा यह निकलकर आया , कि जितना लफ्ज़ जिहाद जिस मफ़हूम के साथ भारत में बोला या लिखा गया उतना 57 मुल्कों में बोला जा तो शायद दुनिया की तस्वीर एकदम विपरीत होती.

जमीअत उलमा-ए-हिंद की National Governing Body का भोपाल में राष्ट्रीय अधिवेशन में भोपाल की रूहानी फ़िज़ाओं में, एक नया इतिहास लिखे जाने की एक आवाज़ गूंज उठी थी.

आपसी प्यारो मोहब्बत, अमन और इंसाफ…समाज से ज़ुल्मो सितम को मिटाने , मुल्क की सम्प्रभुता को बचाने, एकता अखंडता और इंसानियत की रक्षा के लिए उठी जिहाद की आवाज़। जिस जिहाद या संघर्ष की बात मौलाना मेहमूद ने की उसी जिहाद या संघर्ष करने के लिए भगवन श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे थे अर्जुन इसके लिए उकसा रहे थे.

आज जिहाद की बात आते ही लोगों के ज़हन में मार काट आतंकी हमले और खून खराबे की तस्वीर बन जाती है दरअसल इस तस्वीर में रंग भरा है नेशनल और इंटरनेशनल नफ़रती और zionist मीडिया ने, जो दुनिया में इंसानों को खौफ और द्वेष के माहौल में देखना चाहती है, और दुनिया में सिर्फ जंगो जिंदाल और ख़ूंरेज़ी देखना चाहती है.

मौलाना मेहमूद मदनी के बयान को नफरती मीडिया ने ऐसा पेश किया मानो नया उसामा बिनलादेन निकल आया हो हालांकि इन देश के इन दुश्मन मीडिया Centres की Reportings और Anchors के अंदाज़ में खुद आतंक की बू आती है ……

अदालतों के अक्सर फैसलों की तारीफ करने वाली जमीयत के सदर मौलाना मेहमूद मदनी के supreme court वाले बयान को Twist करने वाले चाटुकार पत्रकार शायद अदालतों की रूह से वाक़िफ़ नहीं. अब Supreme Court किसी गुम्बद या इमारत का नाम तो नहीं है. दुसरे अल्फ़ाज़ में अदालत वो आइना है जिसमें कानून अपना चेहरा देखकर फैसला करता है नाकि मज़हब, जाती या पक्ष देखकर.

मुल्क के तमाम इदारों और अदालतों से मायूस होकर ही कोई मज़लूम और पीड़ित पक्ष इन्साफ की उम्मीद लेकर वहां पहुँचता है. और वहां तमाम दलीलों की बुनियाद पर संविधान और क़ानून की पाबंदी और इसके हुक़ूक़ का ख्याल रखा जाता है.

अगर ऐसा न हो या कभी हो और कभी ना हो तो फिर इसको कौन सुप्रीम कहेगा ? इस बात में खराबी उसी को नज़र आएगी जो मुल्क के क़ानून को नहीं मानता होगा. मान लीजिये अगर यही ब्यान प्रधानमंत्री ने दिया होता या सत्तापक्ष का कोई मंत्री ही देता तो उसकी तारीफ के PULL बांधने में यही चाटुकार पत्रकार दिनों रात कूद रहे होते …..वाह क्या बात कही हुज़ूर ने.

ऐसी ही चापलूस और निकम्मी पत्रकारिता किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए नासूर होती है जो मुल्क को धीरे धीरे तानाशाही के नरग़े में फंसा देती है. और यह तानाशाह बेचारा बाद में मुल्क बद्री की सज़ा काटने पर मजबूर होता है जो कभी अवाम के सामने प्रधान सेवक के रूप में प्रकट होता था. इसकी ताज़ा मिसालें मुल्क के सरहदी देशों में हालिया दिनों में देखने को मिलीं.

मौलाना मेहमूद मदनी ने बताया जहाँ भी क़ुरान में लफ्ज़ “जिहाद” जंगो जिदाल के माने में इस्तेमाल हुआ वो भी ज़ुल्मो फ़साद के ख़ात्मे और इंसानियत की बक़ा के लिए इस्तेमाल हुआ है. यहाँ हमारा सवाल फिर नफरती मीडिया से, क्या आप नहीं चाहते की समाज से और दुनिया से आतंक, ज़ुल्मो सितम और नाइंसाफी ख़त्म हो?

जमीअत के भोपाल अधिवेशन में देश के कोने–कोने से आए उलेमा, मज़हबी रहनुमा और विद्वान अपने मुल्क की बेहतरी, भाईचारा विकास और इंसानियत की बक़ा के लिए एक ही सफ़ में खड़े दिखाई दिए—

अधिवेशन में उठी हर आवाज़ , हर तजवीज़ अमन और इन्साफ पसंद दिलों में एक नई रोशनी बनकर उभरी. एक ऐसी रोशनी जो नफ़रत के अंधेरों से लड़ती है, और मोहब्बत, सद्भावना और एकता अखंडता को मज़बूत बनाती है।
भोपाल में जमीअत का यह तारीखी जलसा सिर्फ़ एक मीटिंग नहीं थी…बल्कि मुल्क दुश्मन Agents के लिए एक पैग़ाम था, एक ललकार थी .

मौलाना मेहमूद मदनी और उनके सभी साथियों का बड़ा पैग़ाम था कि हमारे मुल्क की तरक़्क़ी, मुल्क के हर समुदाय और वर्ग की तरक़्क़ी और उसके साथ इंसाफ़ में ही पिन्हा है छुपी हुई है. हम समझते हैं इस तरह की आवाज़ आज भी उतना ही प्रासंगिक और ज़रूरी है, जितना साम्राज्य्वादी अंग्रेज़ों के दौर में ज़रूरी थी। हमारा मानना है इस प्रकार की संगोष्ठियां मुल्क के कोने कोने में आयोजित की जाएँ ताकि देश और मानवता के दुश्मनों को सबक़ सिखाया जा सके.

मगर अफ़सोस देश के दुश्मनों की एजेंट भारत की मीडिया और कुछ संस्थाओं ने जमीअत उलेमा हिन्द के अधिवेशन में मौलाना मेहमूद मदनी की तक़रीर को इस तरह पेश किया मानो कोई दूसरा बिनलादेन पैदा हो गया हो. जबकि उनको यह नहीं पता आज जिस मुल्क की आज़ाद हवाओं में ये नफ़रती ग़द्दार सांस ले रहे हैं वो मौलाना मेहमूद के बड़ों की क़ुर्बानियों का नतीजा है.

दुनिया अपने शहीदों की क़ुर्बानियों को याद रखती है उनका जश्न मनाती है ताकि ज़ालिम और साम्राज्य्वादी कोई सोच दुबारा हमारे वतन अज़ीज़ की तरफ बुरी निगाह उठाकर न देख सके. मगर अफ़सोस यह कितना विडंबनात्मक है कि हमारे ही मुल्क में शहीदों की औलादों के पुतले फूंके जाते हैं, कितना दयनीय कृत्य है.

हिन्दुस्तान की तमाम जांच एजेंसियों और अदालतों के फैसलों से पहले मीडिया Trial में किसी को भी आतंकी, देशद्रो या मुजरिम ठहराने वाले नफ़रती Anchors और Programmers को आज देश के बिगड़ते हालात के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है और आगे भी माना जाएगा |

आज दुनिया में हमारी मीडिया की फ़ज़ीहत इन्हीं ढोंगियों की वजह से हो रही है और इसमें वो पत्रकार, Journalist और मीडिया हाउस भी घुन की तरह पिस रहे हैं जो देश की तरक़्क़ी, इन्साफ, अम्नो शान्ति और Nation Building के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं.

हम पूछते हैं अत्याचार और और ज़ुल्म तथा ना इंसाफ़ी के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाने से क्यों डरते हो, संघर्ष जद्दो जहद करने से क्यों डरते हो? आपको पता है गिरते हुए वृक्ष का शोर बहुत होता है और बढ़ता हुआ पौधा बे आवाज़ दरख़्त बन जाता है. आओ साथ मिलकर ख़ामोशी से मुल्क की तरक़्क़ी और विकास का दरख़्त लगाएं . एक दुसरे के हाथ में हाथ डालकर एक मज़बूत ज़ंजीर बनायें और देश के दुश्मनों को सबक़ सिखाएं .

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