मदरसों से देश को आज़ाद कराने की आवाज़ उठी थी

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प्रेस विज्ञप्ति

यही मदरसे हैं जहाँ से देश को गुलामी से आज़ाद कराने की पहली आवाज़ उठी थी: मौलाना अरशद मदनी

“मदरसे हमारी दुनिया नहीं, धर्म हैं, ये हमारी पहचान हैं और हम अपनी इस पहचान को मिटने नहीं देंगे”

ये मदरसे हमारी पहचान हैं, और हम अपनी इस पहचान को मिटने नहीं देंगे

नई दिल्ली, 2 जून 2025 :जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने रात्रि में आजमगढ़ के क़स्बा सराय मीर में आयोजित “अखिल भारतीय मदरसा सुरक्षा सम्मेलन” में अपने संबोधन के दौरान ये बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य सम्मेलन नहीं है, बल्कि वर्तमान हालात में मदरसों की हिफाज़त को सुनिश्चित करने हेतु गंभीर मंथन और आगे की रणनीति तय करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

मौलाना मदनी ने कहा कि ये मदरसे सिर्फ़ शिक्षा के केंद्र नहीं हैं, इनका मक़सद सिर्फ़ पढ़ाना-लिखाना नहीं बल्कि देश और क़ौम की सेवा के लिए नई नस्लों की सोच और तालीम को तैयार करना भी रहा है।

उन्होंने कहा कि आज जिन मदरसों को गैरकानूनी कहकर ज़बरदस्ती बंद किया जा रहा है, ये वही मदरसे हैं जहाँ से सबसे पहले अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ आवाज़ उठी थी।

उन्होंने इतिहास का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब 1803 में पूरा भारत अंग्रेजों के क़ब्ज़े में चला गया था, तब दिल्ली से मशहूर धार्मिक व रूहानी हस्ती हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मोहद्दिस देहलवी रह. ने मदरसा रहिमिया से एक टूटी चटाई पर बैठकर ऐलान किया कि देश ग़ुलाम हो चुका है, इसलिए ग़ुलामी से आज़ादी के लिए संघर्ष करना एक धार्मिक कर्तव्य है।

इस एलान के बाद उनके मदरसे को नेस्तोनाबूद कर दिया गया और उन पर ज़ुल्म व सितम के पहाड़ तोड़े गए। मौलाना मदनी ने कहा कि 1857 की क्रांति, जिसे अंग्रेज़ों ने “गदर” कहा, उसी का नतीजा था कि सिर्फ़ दिल्ली में 32,000 उलमा को शहीद कर दिया गया

हमारे बड़ों की डेढ़ सौ साल की कुर्बानियों के बाद यह देश आज़ाद हुआ। दारुल उलूम देवबंद की स्थापना भी इसी मक़सद से की गई थी कि वहां से देश की आज़ादी के लिए नए सपूतों को तैयार किए जाएं।

उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आज इतिहास से अनजान लोग उन्हीं मदरसों को आतंकवाद का अड्डा बता रहे हैं, ये आरोप भी लगाया जाता है कि वहां कट्टरपंथ की तालीम दी जाती है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, असम और हरियाणा तक मदरसों और मस्जिदों के खिलाफ कार्रवाई मज़हब की बुनियाद पर की जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में यह भेदभाव और अन्याय क्यों?

 आजमगढ़ के क़स्बा सराय मीर में आयोजित “अखिल भारतीय मदरसा सुरक्षा सम्मेलन”

जबकि संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर दिए हैं। मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि यह सब एक विशेष विचारधारा के तहत किया जा रहा है ताकि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के बीच नफ़रत की खाई  पैदा की जा सके, और बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ खड़ा किया जा सके यह सत्ता हासिल करने की सोची-समझी साज़िश है।

उन्होंने आगे कहा कि यह एक सेक्युलर देश है, और यहां धर्म की बुनियाद पर किसी एक समुदाय के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता। मगर आज की सच्चाई यह है कि खुलेआम एक विशेष समुदाय को उसके धार्मिक आधार पर टारगेट किया जा रहा है और उसे यह एहसास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि उसके नागरिक अधिकार खत्म कर दिए गए हैं।

मौलाना मदनी ने कहा कि हालात चाहे जैसे भी हों, हमें मायूस होने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि हौसले, ईमानदारी और अज़्म के साथ इन हालात का सामना करना होगा। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने आज़ादी से पहले और उसके बाद देश में अमन, भाईचारे और एकता के लिए कोशिश की है और हर अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ संघर्ष किया है,और आगे भी पूरी ताक़त से करती रहेगी।

उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई सरकार से है, जनता से नहीं। मदारिस-ए-इस्लामिया हमारी जीवन रेखा हैं, और अब एक साज़िश के तहत हमारी इस जीवन रेखा को काटने की तैयारी हो रही है। मौलाना मदनी ने कहा कि गैरकानूनी बताकर मदरसों के खिलाफ की जा रही हालिया कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी अवमानना है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने इस साज़िश के खिलाफ एक बार फिर अपनी कानूनी जद्दोजहद शुरू कर दी है, क्योंकि मदरसों की हिफाज़त दरअसल धर्म की हिफाज़त है। हम लोकतंत्र, संविधान की सर्वोच्चता और मदरसों की रक्षा के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे।

उन्होंने मदरसों के जिम्मेदारों को हौसला देते हुए कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद आपके साथ है और हर तरह की मदद व कानूनी सहायता आपको प्रदान करेगी । साथ ही उन्होंने बताया कि जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश ने एक आर्किटेक्ट पैनल गठित कर दिया है जो मस्जिदों और मदरसों की निर्माण संबंधी ज़रूरतों, नक़्शा पास कराने, और ज़मीन के दस्तावेज़ी समाधान में मदद करेगा।

जमीयत का लीगल पैनल पहले से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक सैकड़ों केसों में सक्रिय है। मौलाना मदनी ने सलाह दी कि मदरसों और मस्जिदों के निर्माण से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि जिस ज़मीन पर निर्माण हो रहा है वह वैध और पूरी तरह सुरक्षित हो, और बेहतर यह है कि वह ज़मीन वक्फ या बतौर हिबा (दान) मदरसे/मस्जिद के नाम हो।

उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात से घबराने की ज़रूरत नहीं, बल्कि कानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष के ज़रिये उनका सामना करना होगा। अल्लाह हमारा मददगार हो।

इस सम्मेलन का आयोजन प्रांतीय जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था, और ख़ास बात यह रही कि इसमें सभी (विचारधाराओं) के मदरसों के जिम्मेदार मौजूद थे इस नज़रिए से यह एक इतिहासिक “मसलकी इत्तिहाद” (मजहबी एकता) का उदाहरण था।

इस ऐतिहासिक सम्मेलन की अध्यक्षता जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मौलाना अशहद रशीदी ने की और संचालन जमीयत उत्तर प्रदेश के नायब सदर मुफ्ती अशफाक़ आज़मी ने किया।

सम्मेलन को प्रदेश अध्यक्ष मौलाना अश्हद रशीदी ओर जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मुफ्ती सैयद मअसूम साकिब, उत्तर प्रदेश जमीयत के लीगल प्रभारी मौलाना काब रशीदी ने भी संबोधित किया ।

 

फ़ज़लुर्रहमान क़ासमी
प्रेस सचिव, जमीयत उलमा-ए-हिंद

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