लोग समझ रहे हैं कि नोट बदलने से देश बदल जाएगा तो शायद यह सोच ग़लत है। 1978 में भी ऐसा ही कुछ हुआ था मगर वही ढाक के तीन पात।
नोट बदलने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है दिल बदलना, सोच बदलना। कोई भी नियम बनालें उसे लागू तो इंसान ही करेंगे। जब इंसान ही नहीं बदलेगा तो नियम और तंत्र की उलट फेर से कुछ हासिल नहीं होगा। दिल पर हाथ रख कर हम सोचें क्या हमारे अंदर कोई बदलाव हुआ है? अगर नहीं तो अंत में हमें हमारी गढ़ी मरीचिका निराश ही करने वाली है।
हीरो पूजा और सुपरमेन की तलाश हमें मानसिक स्तर पर बच्चा बना देती है। मानव विकास के कोई भी आंकड़े उठा कर देख लीजिए भारत रसातल में नज़र आएगा।
जबतक शिक्षा का स्तर नहीं उठता, लोग स्वास्थ्य नहीं होंगे, विचारों का वैज्ञानिक आधार नहीं होगा, पौराणिकता के बजाय सत्य का सम्मान नहीं होगा, जाति और संप्रदाय का वर्चस्व लक्ष्य रहेगा, कोई परिवर्तन नहीं होगा।
अब राजनीति कुछ नहीं बदल सकती। यह भद्रलोक के निर्माण में रत है। हमें एक वास्तविक लोकतंत्र और संवेदनशील समाज बनाने का प्रयास करना चाहिये।
अब्दुल रशीद अगवान