लेकिन सुशील मोदी की अचानक मौत के बारे में

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उन्होंने तो 4000 लोकसभा सीटों पर जीत की बात कही, जी हाँ 4 हज़ार मगर क्यों ?

नितीश कुमार की लगातार बहकी बहकी बातें , अफ़सोस हुआ!

कोविड टीकाकरण प्रमाणपत्रों से अचानक नरेंद्र मोदी की तस्वीर क्यों हटा दी गई ?

वैसे भी वो झोला उठाकर जाने वाले थे ? या हैं ?

कई ख़ुलासों की रिपोर्ट , 

सुशील मोदी के देहांत के बाद नीतीश कुमार की तबीयत ज़्यादा ख़राब ?

सुशील मोदी के देहांत के बाद नीतीश कुमार की तबीयत ज़्यादा ख़राब ? लोकसभा की 40 में से 21 सीटों पर चुनाव बाकी है, लेकिन जदयू के अंदर मुख्यमंत्री को लेकर ज्यादा चिंता है आखिर क्यों? इसका जवाब सिर्फ तस्वीरों में ।

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण का मतदान के बाद अब तक 379 सीटों पर वोटिंग समाप्त हो चुकी है .164 लोकसभा सीटों पर वोटिंग होना बाक़ी है .आखरी चरण 1 जून को होगा इसकी ख़ास बात यह है कि प्रधान मंत्री की भी क़िस्मत दाव पर होगी . इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नामांकन के दौरान मंगलवार को वाराणसी में सियासी दिग्गजों का इज्तमा हुआ। मगर NDA गठबंधन के ख़ास साथी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नहीं दिखाई दिए ।

बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और अपने सबसे करीबी सुशील कुमार मोदी के निधन के बाद मंगलवार को मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने पटना में राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि का आदेश दिया, मगर खुद नीतीश कुमार पटना में रहकर भी सुशील मोदी के अंतिम संस्कार में दीघा घाट नहीं गए। 16 वर्षों से हर साल 14 मई को अपनी दिवंगत पत्नी मंजू सिन्हा की पुण्यतिथि पर भी श्रद्धांजलि देने के लिए पटना के कंकड़बाग स्थित पार्क उनकी प्रतिमा स्थल तक मंगलवार को नहीं गए।

इस सबके बाद सवाल उठना स्वाभाविक था, तभी तबीयत खराब होने की एक पंक्ति की सरकारी विज्ञप्ति जारी हुई। लेकिन, इन तीन में से दो स्थानीय मौकों पर उनका नहीं जाना; उनकी पार्टी जनता दल यूनाईटेड के नेताओं को चिंता में डाल गयी ।

इस बीच बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो के दौरान मुख्यमंत्री नितीश बाबू की तस्वीरों को देखकर उनके समर्थक बेचैन थे । चिंता यही है कि कहीं ज्यादा मुश्किल में तो नहीं नीतीश कुमार? मांग उठ रही कि सीएम नीतीश कुमार का हेल्थ बुलेटिन जारी हो।

भाजपा कर रही थी हेल्थ बुलेटिन की मांग, अब चुप क्यों ?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब पहले जैसे नहीं दिख रहे – यह बात करीब नौ महीने से सामाजिक और सियासी गलियारों में गश्त कर रही है । तब महागठबंधन की सरकार थी। जदयू की कमान तत्कालीन अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह संभाल रहे थे।याद रहे तब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी।

नितीश कुमार की लगातार बहकी बहकी बातें , अफ़सोस हुआ
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार अजीब अजीब बयानों और मुख्तलिफ हरकतों और अंदाज़ के कारण लोगों में चर्चा होने लगी . मंत्री अशोक चौधरी का सिर एक पत्रकार से टकराने, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को तू-तड़ाक करने, मीडिया के सामने हाथ जोड़कर झुकने, विधानमंडल के दोनों सदनों में जनसंख्या नियंत्रण का फॉर्मूला बताने… जैसी कई घटनाओं के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सीएम नीतीश कुमार के साथ कोई साजिश रची जा रही है। उन्हें गलत दवा दी जा रही है।

लेकिन सुशील मोदी की अचानक मौत के बारे में बीजेपी ने कोई टिप्पणी नहीं की है . शायद इसलिए के देश में पहले ही हार्ट अटैक से अचानक मौतों को लेकर COVID के दौरान लगाए गए भारतीय टीका कोविशील्ड को लेकर प्रधान मंत्री मोदी सवालों के घेरे में हैं .

आपको याद होगा हालिया दिनों में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए कोविड टीकाकरण प्रमाणपत्रों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटा दी गई है ।जब पीएम मोदी की तस्वीर हटाए जाने के बारे में सवाल पूछा गया तो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों ने द प्रिंट को बताया कि तस्वीर को भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के निर्देशों के अनुसार हटा दिया गया था, क्योंकि MODEL CODE OF CONDUCT (MCC) लोकसभा 2024 चुनावों के दौरान लागू है ।

लेकिन सवाल यह है की क्या ECI का यह निर्देश सिर्फ स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सन्दर्भ में ही क्यों ? बाक़ी देशभर में PM मोदी के ADD के तौर पर लगे फोटो पर क्यों नहीं ?? सवाल तो बनता है न ?
अब इस तरह के messages तमाम सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं . सबको पहुंचा कर मौत के द्वार सीटें मांग रहा 400 पार #Covishield

खैऱ , 28 जनवरी को नीतीश कुमार वापस NDA में आ गए और भाजपा की मांग यहीं खत्म हो गई।शायद मोदी वाशिंग मशीने का असर हुआ होगा . हालांकि, इसके बाद भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी सहज नहीं दिखे। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के सामने मंच पर उनकी शान में क़सीदे पढ़े तब भी उनकी BODY LANGUAGE पर सवाल उठे । 400 सीटों की जगह 4000 लोकसभा सीटों पर जीत की बात कह गए नितीश बाबू ।

चाणक्य स्कूल ऑफ पालिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- “भाजपा को नितीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर पहल करनी चाहिए, अगर सच में नीतीश कुमार की सेहत को लेकर पार्टी को 28 जनवरी से पहले जो चिंता थी क्या अब भी है ??।”

अब पिछले रविवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रोड शो में उनकी गाड़ी पर दिखे तो यह बात तेजी से उठी… कि कुछ तो गड़बड़ है। नितीश बहुत असहज और Uncomfort दिख रहे थे . इसके 24 घंटे बाद ही पांच दशकों पुराने उनके साथी सुशील मोदी के निधन की खबर सामने आयी और उसके अगले दिन सरकार की ओर से बताया गया कि मुख्यमंत्री बीमार हैं. इसलिए उनकी सारी सार्वजनिक गतिविधियां स्थगित की जा रही हैं।

लेकिन, मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से नीतीश कुमार की बीमारी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हाल यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के अधिकारी इस सवाल को टाले जा रहे हैं कि वह किस तरह से बीमार हैं। उनकी एक्चुअल बीमारी क्या है उनका Medical बुलेटिन जारी क्यों नहीं किया गया है ??.

आम जनता यह जानना चाह रही है कि नीतीश कुमार की बीमारी का वास्ता उनकी मानसिक स्थिति से तो नहीं है और अगर ऐसा है भी तो उनका इलाज सही तरीके से हो रहा है या नहीं। वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं कि “ऊर्जा से ओतप्रोत, सजग, हंसमुख और मिलनसार नीतीश कुमार थके-हारे, निराश-हताश, परेशान और बीमार लग रहे हैं।

सवाल उठना लाजिमी है कि उनकी ऐसी स्थिति इतनी जल्दी कैसे बदलगी? क्या वह बीमार हैं? परेशानी राजनीतिक है या शारीरिक-मानसिक, लोग जानना चाहते हैं। इसलिए, हेल्थ बुलेटिन की मांग कहीं से भी गलत नहीं है।”

देश के नामी फिजिशियन पटना में मौजूद , उन्हें भी नहीं पता

राज्य के कई प्रतिष्ठित चिकित्सकों के साथ उनके करीबी रहे पद्मश्री डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा से भी बात की गयी । उन्होंने कहा कि इस बारे में न तो उन्हें जानकारी है और न किसी ने उन्हें बुलाया है। डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा फिजिशियन और न्यूरो विशेषज्ञ के रूप में देशभर में विख्यात हैं। डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा को जब जानकारी नहीं और सरकार की ओर से बुलेटिन नहीं जारी हो रहा तो जदयू-भाजपा के नेताओं की हालत समझी जा सकती है।

दोनों दलों के दिग्गजों से पूछने पर जवाब मिला- “तबीयत खराब है।” सवाल वहीं रह गया कि हुआ क्या है कि आखिर अपने इतने करीबी मित्र की अंत्योष्टि और अपनी पत्नी की पुण्यतिथि पर नहीं जाने का मतलब कुछ तो ज्यादा परेशानी वाला है, क्योंकि सामान्य बुखार में तो वह पहले ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को दरकिनार नहीं करते थे।अब इस सबके बाद नितीश के NDA में शामिल होने की बहस शायद दोबारा शुरू हो , मगर उसकी कोई अहमियत नहीं होगी .

अब तो चर्चा इस बात की हो रही है कि 400 पार का नारा देने वाली पार्टी के प्रधान मंत्री लोकसभा चुनाव नामांकन परचा भरने के दौरान बनारस में इतनी बड़ी Event कि ज़रुरत क्या थी .

परचा तो लोकसभा के लिए कई और VVIPs ने भी भरा है उसमें तो ऐसा कोई कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया गया . होसकता है फ़क़ीरों की दुनिया में हर छोटे बड़े कार्यक्रमों में करोड़ों रूपये खर्च करने का चलन हो . वैसे भी वो झोला उठाकर जाने वाले थे ? या हैं ?

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