

ग़ज़ल
रूबरू आइने के आ तो सही।
अब हक़ीक़त भी आजमा तो सही।।
जैसा मैं हूँ नसीब हूँ तेरा।
मैं न अच्छा सही बुरा तो सही।।
दर्द ही बस दिया चलो माना।
पर तेरे क़ल्ब को छुआ तो सही।।
जैसे तन्हा हूँ मैं बिना तेरे।
वक़्त ऐसा कभी बिता तो सही।।
तीरगी की न कर शिकायत यूँ।
रुख से पर्दा ज़रा हटा तो सही।।
मैं नहीं कहता राहज़न तुझ को।
दिल गली में तेरी लुटा तो सही।।
जिस से ख़तरा है हारने का दिल।
उस से नज़रें कभी मिला तो सही।।
खामुशी से न अश्क पी हैरत “।
चोट कितनी लगी बता तो सही।।
सलाम हैरत
