न्यायाधीष ज्योत्सना याज्ञनिक को तो आप भूल गए होंगे ,और संजीव भटनागर को भी मगर शायद हेमंत करकरे तो याद है आपको ,इन लोगों के बारे में आपको आगे बताएँगे ,मगर पहले आप यह बताएं की गुलबर्गा SOCIETY काण्ड के पीड़ितों को इन्साफ मिल गया ?या नहीं !
गुलबर्ग सोसायटी के पीड़ित और गुजरात दंगों के शिकार अन्य व्यक्तियों को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा। सांप्रदायिक नेताओं को एक के बाद एक बरी किए जाने से परेशान पीड़ितों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसने इन प्रकरणों को गुजरात से बाहर Transfer कर दिया। इससे यह स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय को गुजरात की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं था।
सन 2008 में उच्चतम न्यायालय ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जिसे गुलबर्ग सोसायटी व आठ अन्य मामलों की जांच की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। परंतु एसआईटी ने उच्च पदस्थ राजनैतिक नेताओं और मंत्रियों को क्लीन चिट दे दी थी । इसके बाद, उच्चतम न्यायालय ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य शीर्ष व्यक्तियों की दंगों में भूमिका की जांच के लिए राजू रामचंद्रन को न्यायमित्र नियुक्त किया। रामचंद्रन ने एसआईटी के निष्कर्षों से असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के विरूद्ध मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार हैं। इसके बाद भी जिस बड़ी संख्या में आरोपी बरी किए जा रहे हैं उससे दंगा पीड़ितों का एसआईटी पर विष्वास डोल गया है, तथा इन्साफ का स्तम्भ भी गिरता नज़र आरहा है ।
गुजरात में इतने बड़े स्तर पर दंगे इसलिए हो सके क्योंकि वे सुनियोजित थे। जूनागढ़ व नवसारी जैसे स्थानों, जहां भाजपा मज़बूत थी और जहां उसे और वोट कबाड़ने की आवष्यकता नहीं थी, वहां दंगे नहीं हुए। उसी तरह भावनगर जैसे स्थान, जहां पुलिस अधिकारियों ने सांप्रदायिक हिंसा को नियंत्रण में लाने के गंभीर प्रयास किए, वहां भी हिंसा नहीं हुई। सबसे ज्यादा हिंसा खेड़ा और आणंद जैसे इलाकों मंे हुई, जहां भाजपा के लिए चुनाव जीतना अपेक्षाकृत मुष्किल था और उसे समाज के सांप्रदायिक धु्रवीकरण से लाभ मिलने की उम्मीद थी। यह प्रष्न कई बार पूछा जा चुका है कि गुजरात में अलग-अलग स्थानों पर दंगों की भीषणता में अंतर क्यों था। अगर ये दंगे लोगों के गुस्से से उपजे थे और मोदी के शब्दों में ये क्रिया की प्रतिक्रिया थे, तब पूरे प्रदेष में हिंसा होनी थी और गोधरा, जहां हुई ट्रेन आगजनी को दंगे भड़कने का कारण बताया जाता है, वहां तो सबसे ज्यादा हिंसा होनी चाहिए थी। परंतु ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण यह था कि दंगों के पीछे एक सुनियोजित षड्यंत्र था।
अदालत ने यह कहकर कि दंगे किसी आपराधिक षड़यंत्र के तहत नहीं भड़काए गए थे, भाजपा के इस दावे को मज़बूती और वैधता प्रदान की है कि दंगे, गोधरा की घटना की स्वस्फूर्त प्रतिक्रिया थे, शायद ये दबाव में लिया गया फैसला हो । इस निर्णय में उन व्यक्तियों की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही तय नहीं की गई है जो दंगों को रोकने में सक्षम थे परंतु उन्होंने अपने फ़र्ज़ से बग़ावत की या संविधान से भी ।
इसके विपरीत, नरोदा पाटिया प्रकरण के निर्णय में षड़यंत्र के आरोप को सही बताया गया और गुजरात सरकार में मंत्री व भाजपा नेता मायाबेन कोडनानी और विहिप नेता बाबू बजरंगी को दोषसिद्ध घोषित किया गया। इस प्रकरण में अपने निर्णय में न्यायाधीष ज्योत्सना याज्ञनिक ने कहा कि कोडनानी इस षड़यंत्र की ‘सरगना’ थीं। निर्णय में कहा गया कि, ‘‘यह एक सुनियोजित षड़यंत्र था और इसकी गंभीरता को मात्र यह कहकर कम नहीं किया जा सकता कि यह गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया थी’’ जबकि उसको भी सुनियोजित बताया जा चुका है । इस निर्णय के बाद से याज्ञनिक को जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं और राज्य सरकार उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवा रही है। प्रष्न यह है कि अगर नरोदा पाटिया और गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड एक ही घटना की प्रतिक्रिया थे और एक ही समय में हुए थे तो ऐसा कैसे संभव है कि एक के पीछे षड़यंत्र था और दूसरे के पीछे नहीं।

गुलबर्गा फैसले के सम्बन्ध में जो बात नज़रअंदाज की जा रही है वह यह है कि केजी इरडा और बिपिन पटेल जैसे लोगों, जिन्होंने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया और फ़र्ज़ से मुंह मोड़ा , को बरी कर दिया गया है। गुलबर्ग सोसायटी जिस इलाके में है, इरडा उसके पुलिस उप अधीक्षक और बिपिन पटेल भाजपा पार्षद थे। इस तरह के लोगों को बरी कर और षड़यंत्र की संभावना से इंकार कर न्यायालय ने उन लोगों को क्लीन चिट दे दी है,क्या इसको आप मुकम्मल इन्साफ कहेंगे ?
इस हत्याकांड में मारे गए 69 लोगों में से एक पूर्व सांसद एहसान जाफरी थे। एसआईटी की जांच में यह सामने आया है कि उन्होंने पुलिस कमिष्नर को कई बार फोन लगाए लेकिन छः घंटे तक दंगाई वहां हिंसा का तांडव करते रहे और पुलिस नहीं पहुंची। किसी भी बड़े षहर में किसी स्थान पर पुलिस बल को पहुंचने में अधिक से अधिक एक घंटा लगना चाहिए। परंतु न तो पुलिस और ना ही राजनेताओं ने ज़ुनूनी भीड़ से गुलबर्ग सोसायटी के लोगों की रक्षा करने की कोषिष की। सब जानते हैं दंगाइयों की भीड़ तलवारों से लैस थी (जो कि पूर्व तैयारी का सुबूत है)। भीड़ ने सोसायटी के रहवासियों को उनके घरों से बाहर निकालकर क्रूरतापूर्वक मार डाला। इस हत्याकांड में मारे गए 69 लोगों में से एक पूर्व सांसद एहसान जाफरी पुलिस कमिष्नर को कई फोन लगाते रहे मगर किसी ने कान ना धरा ,एक सांसद के फ़ोन की यह एहमियत कि न पुलिस घटनास्थल पहुंची और ना किसी नेता ने उनकी फर्याद को सुना ,आखिर पुलिस पर दबाव किसका था ,क्या तत्कालीन मुख्यमंत्री और आजके प्रधान मंत्री का ?जिसका सुबूत संजीव भट्ट (जिनका कहना था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने पुलिस से यह कहा था कि वे हिंदुओं को मुसलमानों पर अपना गुस्सा निकाल लेने दें) खुद हैं

ऐसे अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है और याज्ञनिक जैसे न्यायाधीषों को धमकियां दी जा रही हैं।
मालेगांव धमाके प्रकरण में विषेष लोक अभियोजक (SPECIAL PUBLIC PROSECUTOR) रोहिणी सालीयान को एनआईए ने यह निर्देष दिया था कि वे हिंदुत्व संगठनों से जुड़े आरोपियों के साथ नरमी बरतें। याद रहे साध्वी प्रज्ञा, जिनकी इन धमाकों में संलिप्तता को हेमंत करकरे के नेतृत्व वाली एटीएस ने उजागर किया था, का नाम चार्जषीट से हटा दिया गया है। इसका एकमात्र तर्कसंगत उत्तर यह है कि राज्य और दंगाईयों के बीच मिलीभगत थी गुलबर्गा के पीड़ितों को इन्साफ मिला या नहीं ? अब यह कौन तय करेगा ? ALI AADIL KHAN EDITOR’S DESK