राष्ट्रवाद पर विमर्श और महिलाएं

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नेहा दाभाड़े

इन दिनों राष्ट्रवाद, भारत में सार्वजनिक विमर्श पर छाया हुआ है। हर ऐसे व्यक्ति, राष्ट्रवाद के संबंध में जिसका दृष्टिकोण वर्तमान राजनैतिक सत्ताधारियों से भिन्न है, पर ‘‘देशद्रोही’’ का लेबिल चस्पा कर दिया जाता है। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि हर व्यक्ति देश के प्रति अपने प्रेम और वफादारी को साबित करे। रोहित वेमूला की आत्महत्या के बाद से राष्ट्रवाद में जाति के स्थान पर भी बहस छिड़ गई है। हाशिए पर पड़े अन्य समूहों, जिनमें मुसलमान और ईसाई शामिल हैं, को ‘बाहरी’ बताकर उनका दानवीकरण किया जा रहा है। उन पर जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप लगाया जा रहा है और भारत के प्रति उनकी वफादारी पर संदेह प्रगट किए जा रहे हैं। अभी हाल में कुछ लोगों ने जेएनयू को ‘‘राष्ट्रविरोधियों का अड्डा’’ बताया था।

दलितों, युवाओं व अल्पसंख्यकों के संदर्भ में राष्ट्रवाद पर चर्चा में इन समूहों की सक्रिय भूमिका को स्वीकार किया जाता है-चाहे इस भूमिका को नकारात्मक बताया जाए या सकारात्मक परंतु भारत में राष्ट्रवाद पर विमर्श में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। महिलाएं, राष्ट्रवाद पर जनविमर्श के हाशिए पर ही रहती हैं। राष्ट्रवाद के आख्यानों में उन्हें केवल प्रतीकात्मक स्थान दिया जाता है। महिलाओं की यही स्थिति सार्वजनिक और निजी जीवन में भी है, जहां सत्ता और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सीमित भागीदारी है।

इस मुद्दे पर आगे बात करने से पहले हमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को समझना हेागा। मैक्स वेबर ने राष्ट्र को भावनाओं का ऐसा समग्र बताया है, जो राज्य के रूप में समुचित रूप से प्रकट होता है। बेनेडिक्ट एंडरसन के अनुसार, राष्ट्र एक काल्पनिक राजनैतिक समुदाय है-काल्पनिक इसलिए क्योंकि वह मूलतः सीमित है। वह सीमित इसलिए है क्योंकि किसी भी राष्ट्र के सभी सदस्य कभी एक दूसरे को नहीं जान सकते और ना ही एक दूसरे से विचार विनिमय कर सकते हैं परंतु फिर भी वे एक ही सामूहिक विचार से प्रेम करते हैं। राष्ट्र एक काल्पनिक समुदाय इसलिए भी है क्योंकि वह असमानताओं और शोषण पर पर्दा डालता है और एक ऐसे सांझेपन को बढ़ावा देता है, जिसके लिए राष्ट्र के सदस्य अपना खून बहाने के लिए तैयार रहते हैं। गैल्नर ने तो यहां तक कहा है कि ‘‘राष्ट्रवाद, राष्ट्रों में आत्मचेतना का उदय नहीं है; वह वहां भी राष्ट्रों का आविष्कार कर लेता है, जहां वे हैं ही नहीं’’। इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राष्ट्र एक ऐसा समूह या समुदाय है जो सत्ता पाने की आकांक्षा रखता है।

विचारधारा के स्तर पर, राष्ट्रवाद, पुरूषत्व पर आधारित है और समावेशी नहीं है। राष्ट्रवाद की अवधारणा राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक सीमाओं पर आधारित है। इस राष्ट्रीय पहचान में सभी समुदायों को बराबर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इन पहचानों का निर्माण, अक्सर, सामाजिक प्रतिस्पर्धा से होता है, जिसकी प्रकृति अधिकांश मामलों में हिंसक होती है। शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त समूह, हाशिए पर पड़े समूहों का दमन करते हैं और राष्ट्रीय पहचान को अपनी पहचान के रूप में परिभाषित करते हैं। यह राष्ट्रीय पहचान वही होती है जो इन समूहों की पहचान होती है। इस तरह, राष्ट्रवाद, दमनकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। वह ‘दूसरों’ का निर्माण करता है और सामाजिक पदक्रम का ढांचा खड़ा करता है।

राष्ट्रवाद, लैंगिक समानता पर आधारित नहीं है। इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र के संसाधनों और उसकी निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की कभी समान हिस्सेदारी नहीं रही है। या तो उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है या उनकी आवाज़ को समुचित महत्व नहीं मिलता। महिलाओं को अपेक्षाकृत निम्न स्थान दिया जाता है और उनके योगदान को स्वीकार नहीं किया जाता। जहां समाज युद्ध करना और उनमें दूसरों को मारना पुरूषत्व की निशानी मानता है, वहीं महिलाओं को परिवार, समुदाय और राष्ट्र की ‘‘इज्ज़त’’ बताकर, उन्हें एक ऐसे समूह के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए और जिसकी पवित्रता को बनाए रखा जाना चाहिए। उनकी मूल भूमिका मातृत्व तक सीमित कर दी जाती है।

राष्ट्रवाद और परतंत्र भारत में महिलाएं

भारत के स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं की भूमिका कई अर्थों में विरोधाभासी थी। महिलाओं के अधिकारों और स्वाधीनता संग्राम में उनकी भागीदारी में कोई सीधा संबंध नहीं था। जहां गांधीजी जैसे कई नेताओं ने महिलाओं का आह्वान किया कि वे अपने घरों से बाहर निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हों ताकि वह जनांदोलन बन सके परंतु इस आंदोलन में उनकी भूमिका का निर्धारण सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक सीमाओं के अंदर ही किया गया। उनसे ‘‘स्त्रीयोचित व्यवहार’’ की अपेक्षा की जाती थी।

भारतीयों ने औपनिवेशिक शासन का कई अलग-अलग तरीकों से विरोध किया। जहां कुछ समूह क्रांतिकारी थे वहीं अन्य अंग्रेज़ों के साथ बातचीत का संवैधानिक रास्ता अपनाना चाहते थे। महिलाएं इन दोनों तरह के संघर्षों का हिस्सा बनीं। कल्पना दत्त जैसी कुछ महिलाएं बम बनाने और अंग्रेज़ों पर हमलों में शामिल थीं। लक्ष्मी स्वामीनाथन, इंडियन नेशनल आर्मी में अधिकारी थीं। सरोजनी नायडू राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण महिला नेत्री थीं, जिन्होंने वयस्क मताधिकार और स्वतंत्रता दोनों के लिए संघर्ष किया। सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाएं भी थीं, जिन्होंने खुलकर औपनिवेशिक पितृसत्तात्मकता पर प्रहार किया। महिलाओं की भागीदारी पर गांधीजी के ज़ोर के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं ने स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया।

स्वाधीनता आंदोलन के कुछ नेताओं ने ऐसी सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने का प्रयास किया, जो महिला विरोधी थीं। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में और सती प्रथा व बाल विवाह के खिलाफ आवाज़ उठाई। उनका यह मानना था कि धर्म व सत्ता के संगठनात्मक ढांचे, महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करते हैं। उनकी सोच यह थी कि अगर महिलाओं की स्थिति में बेहतरी आएगी तो इससे भारत, दुनिया को यह दिखा सकेगा कि वह अपना शासन स्वयं चलाने में सक्षम है। परंतु कुछ अन्य नेताओं की यह मान्यता थी कि महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा उठाने से स्वाधीनता संग्राम में बाधा पड़ेगी, वह विभाजित होगा और कमज़ोर पड़ेगा। उनकी मान्यता थी कि राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद ही सामाजिक सुधारों की बात की जानी चाहिए। पुनरूत्थानवादियों का तर्क था कि भारतीय परंपरा में महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया है और औपनिवेशिक सत्ता, इस श्रेष्ठ संस्कृति और परंपरा को नष्ट कर रही है। उनका कहना था कि भारत की ‘‘गौरवपूर्ण’’ परंपराओं के साथ न केवल छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए वरन उन्हें पूर्ण रूप से अपनाया जाना चाहिए।

पुनरूत्थानवादियों और सुधारवादियों का द्वंद

पुनरूथात्थानवादियों का कहना था कि यद्यपि तकनीकी और विज्ञान के भौतिक क्षेत्रों में पश्चिम आगे है तथापि पूर्व  उसकी तुलना में आध्यात्मिक दृष्टि से कहीं अधिक समृद्ध है। महिलाएं आध्यात्मिक चेतना की वाहक हैं और इसलिए उनकी भूमिका और कर्तव्यों में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। और यह भी की ऐसा होने पर ही देश की पहचान कायम रह सकेगी।

 

गांधीजी का परिप्रेक्ष्य

गांधीजी की राजनीति, धर्म से गहरे तक जुड़ी हुई थी। नेहरू के विपरीत गांधी यह अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है और उससे इस आंदोलन को कितनी ताकत मिलेगी। वे यह मानते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन को सच्चे अर्थों में जनांदोलन बनाने के लिए उसमें महिलाओं की व्यापक भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने महिलाओं का आह्वान किया कि वे स्वदेशी और सत्याग्रह आंदोलनों में खुलकर भाग लें। इस आह्वान का गहरा प्रभाव हुआ। महिलाओं को सार्वजनिक जीवन, जिसमें उनके लिए तब तक कोई जगह नहीं थी, में अचानक महत्वपूर्ण स्थान मिल गया। परंतु यहां यह दिलचस्प है कि गांधीजी ने इस सिलसिले में द्रोपदी, सीता और सावित्री को महिलाओं का आदर्श बताया। उनका कहना था कि द्रोपदी, सीता और सावित्री में जो गुण थे, वही स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी करने वाली महिलाओं में होने चाहिए। ये सभी नायिकाएं धैर्य, अहिंसा और चुपचाप सब कुछ सहने वाली थीं। इसके विपरीत, झांसी की रानी जैसी महिलाएं, जो मर्दाना दिलेरी की प्रतीक थीं, को गांधीजी भारतीय महिलाओं का आदर्श नहीं मानते थे। शायद इसका कारण यह था कि वे स्वाधीनता संग्राम को पूर्णतः अहिंसक बनाए रखना चाहते थे।

नेहरू का परिप्रेक्ष्य

भारत के लोगों के जीवन पर धर्म के गहरे प्रभाव और देश की संस्कृति के निर्माण में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका  नेहरूजी को बहुत रास नहीं आती थी। वे भारतीय समाज में धर्म के महत्व को कम करके आंकते थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड में हुई थी और वे पश्चिमी शैली के प्रजातंत्र और आधुनिकीकरण के हामी थे। इसके लिए महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना आवश्यक था। यही कारण है कि नेहरू ने 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम और 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संसद में पारित करवाए। इन दोनों ही कानूनों पर देश में बड़ा बवंडर मचा। उनका मानना था कि तकनीकी और आर्थिक प्रगति अपने आप सामाजिक समानता लाएगी। उनकी दृष्टि में लैंगिक मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण नहीं थे। वे कभी भी भारत के राजनैतिक विमर्श में लिंग और धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सके और यही कारण है कि भारत में प्रगतिशील कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया बहुत धीमी बनी रही। उन्होंने कभी दमन और पितृसत्तात्मकता की जड़ें खोजने का प्रयास नहीं किया।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान, भारत की महिलाओं ने पहली बार प्रजातंत्र, समानता और स्वतंत्रता के मूल्यों को जाना-समझा। ज़ाहिर है इससे उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हई परंतु इस आंदोलन और इसके नेताओं ने कभी लैंगिक समानता जैसे मुद्दे नहीं उठाए और ना ही पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने परिवार के भीतर होने वाले दमन पर भी ध्यान नहीं दिया।

राष्ट्रवाद और आज की महिलाएं

लैंगिक आख्यान, आज भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में नहीं है। उसे केंद्र से प्रतिस्थापित किया है उस राष्ट्रवाद ने, जो देश को धर्मनिरपेक्ष बनाकर उसे आधुनिक राष्ट्र का स्वरूप देना चाहता है और धर्म ने, जो भारत का पुनर्निमाण एक पारंपरिक हिंदू राष्ट्र के रूप में करना चाहता है।

जैसा कि हमने ऊपर देखा, यद्यपि नेहरू धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के पैरोकार थे और एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे जहां विज्ञान और तकनीकी समानता की वाहक बने परंतु वे यह समझ नहीं सके कि केवल प्रगतिशील कानूनों से समानता नहीं आएगी। लैंगिक और सांप्रदायिक दमन की सामाजिक जड़ों को ढूंढना भी आवश्यक होगा। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद ने कभी लैंगिक असमानता और पितृसत्तात्मकता जैसे मुद्दों की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने इन्हें राजनैतिक स्वतंत्रता के विस्तृत आख्यान का हिस्सा भर बनाया। ज़ाहिर है कि इससे महिलाओं को सीमित मुक्ति ही हासिल हो सकी। दूसरी ओर, स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक हिंसा में तेज़ी से वृद्धि हुई और सांप्रदायिक राजनीति की ताकत बढ़ी। प्रतिस्पर्धी अंध राष्ट्रवादों ने महिलाओं को और पीछे धकेल दिया। इसका एक उदाहरण हिंदू राष्ट्रवाद है। हिंदू राष्ट्रवाद का विमर्श, अल्पसंख्यकों से घृणा करने और दलितों, महिलाओं और आदिवासियों को निचला दर्जा देने पर आधारित हैं। हिंदू राष्ट्र के निर्माण के अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए यह राष्ट्रवाद हिंदुओं को लामबंद करना चाहता है। इसके लिए हिंदू राष्ट्रवादी, दलितों, आदिवासियों और यहां तक कि सिक्ख, जैन और बौद्ध जैसे अन्य धर्मों के अनुयायियों को ‘हिंदू’ समुदाय का हिस्सा बनाना चाहते हैं। यह विडंबनापूर्ण है कि आज भी दलित महिलाओं के साथ ऊँची जाति के पुरूष इस आधार पर बलात्कार करते हैं कि उन्हें दलित महिलाओं के षरीर का उपभोग करने का अधिकार है।

मुस्लिम पुरूषों द्वारा हिंदू महिलाओं को अगवा करने और उनके साथ जबरदस्ती करने की अधिकांशतः कपोल कल्पित कथाओं का इस्तेमल हिंदुओं को एक करने के लिए किया जाता है। महिलाओं को बार-बार यह याद दिलाया जाता है कि बढ़ती मुस्लिम आबादी, भारत के लिए खतरा है और इस देश को उसके प्राचीन गौरव से फिर से मंडित किया जाना आवश्यक है। राम को आदर्श पुरूष और सीता को आदर्श महिला बताया जाता है। जहां एक ओर सीता को त्याग, पवित्रता और स्त्रीयोचित व्यवहार का आदर्श बताया जाता है वहीं संघ और विहिप, महिलाओं को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देते हैं और साध्वी ऋतंभरा और साध्वी प्राची जैसे नेता हिंदू महिलाओं को दुश्मन (मुसलमान व ईसाई) के प्रति आक्रामक होने के लिए प्रेरित करते हैं। परंतु घर के अंदर महिलाओं का आक्रामक व्यवहार उन्हें रास नहीं आता। हिंदू महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पिता, भाईयों और पति के हाथों हिंसा को चुपचाप स्वीकार करें। दूसरे शब्दों में, वे लैंगिक पदक्रम को चुनौती न दें।

हिंदू राष्ट्रवाद, सार्वजनिक विमर्श पर हावी है। जब भाजपा सत्ता में नहीं थी तब भी वह महिलाओं की आज़ादी को सीमित करने वाली अवधारणाओं और विचारों को बढ़ावा देती थी। इसका एक उदाहरण लव जिहाद के विरूद्ध अभियान है, जिसके ज़रिए महिलाओं के अपना पति चुनने के अधिकार को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनकी ‘रक्षा’ के नाम पर उन्हें पिंजरों में बंद किया जा रहा है। महिलाओं को समुदाय की पहचान और उसकी इज्ज़त बताकर, उनके शरीर का वस्तु की तरह उपयोग किया जा रहा है। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे विशेषाधिकार प्राप्त ऊँची जातियों के पुरूषों द्वारा निर्मित पहचान को ही आगे बढ़ाएं। दक्षिण अफ्रीका में श्वेत महिलाओं के लिए अन्य समुदायों के सदस्यों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना प्रतिबंधित था। भारत में भी अंतर्जातीय विवाहों को हतोत्साहित किया जाता है।

लैंगिक असमानता, राष्ट्रवाद का अविभाज्य हिस्सा है। यद्यपि औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के लिए विभिन्न देषों में हुए राष्ट्रीय संघर्षों ने लैंगिक समानता के मुद्दे पर विचार की शुरूआत की परंतु बाद में यह मुद्दा कहीं खो सा गया। अलजीरिया में महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारी भूमिका निभाई परंतु बाद में उन्हें घर की चहारदीवारी के अंदर धकेल दिया गया और उनसे यह अपेक्षा की जाने लगी कि वे पारंपरिक सीमाओं का पालन करें। और इन सीमाओं को राष्ट्रवाद ने कई मामलों में मज़बूती दी। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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