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राजनीती से सत्ता और सत्ता से मौत तक

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देश ओ दुनिया में हर तरफ आज सत्ता और पूँजी के लिए जतन और योजनाएं है ,यदि यह सत्य और समानता के लिए होती तो दुनिया अमन ओ शांति का घर होती आज हर तरफ त्राहि त्राहि है ,नफरत और आतंक है । समाज में एक जुमला काफी प्रचलित है ,”सियासत को धर्म से या दीन को दुनिया से अलग रखना चाहिए ” हम कहते हैं कि  “जुदा  हो दीन सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी ”  क्योंकि दीन और धर्म के मायने शांति , बराबरी,प्यार, सद्भाव , कामयाबी  और मोहब्बत से है ।

चंगेज़ी तो आप सब समझते ही हैं ‘चंगेज़ और हलाकू ‘ तबाही और बर्बादी ,क़त्ल ओ बर्बरियत कि पहचान है। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि जो लोग सियासत से दीन को  निकालने कि बात कर रहे हैं या तो वो दीन व धर्म कि परिभाषा जानते ही नहीं या फिर हलाकू और चंगेज़ के दीन पर चलना चाहते हैं ।

 

आज के हालात के परिपेक्ष में भारत और दुनिया में दीन या धर्म के नाम पर जो आतंक और नफरत है उसको समझने की ज़रुरत है ,वैसे हर आदमी जो थोड़ी  अक़ल रखता है अपनी अक़ल और मतलब के हिसाब से हालात की वजह ब्यान करता है, या यूँ कहें कि सब कुछ जानते हुए भी मतलब केखातिर अनजान बना रहना चाहता है । हम हज़ारों लोगों से उनकी राये जानने के लिए बात करते हैं तो पता यह चलता है जो जिस माहौल में  या संस्कृति में रह रहा है उसी हद तक बात करता है सच्चाई जानने के लिए शोधः या तहक़ीक़ नहीं करता ,जबकि  PURE  दूध  के लिए दुकानों पर भटकता है 10 रूपये का रुमाल लेने के लिए 5 दुकानों के RATE लेता है लेकिन जब दीन और धर्म को समझने के लिए कहा जाता है तो कहता है जो हमारे बड़े करते चले आरहे हैं हम भी वही करते हैं इसमें ज़्यादा जानने की ज़रुरत नहीं । जबकि  बड़ों  के  दौर  का  घर  ढा  दिया , बैल गाडी जलादी  ,बड़ों के दौर की धोती कुरता और साफा साडी मिटा दी ,खान पान ,रख रखाव ,रहन सहन सब कुछ बदल दिया मगर दीन और धर्म के नाम पर सब कुछ बड़ों वाला  ।इसको क्या कहेंगे आप ? प्रगतिशील समाज की संरचना या अहंकार ,स्वार्थ ,सत्ता ,साम्प्रदायिकता , अश्लीलता ,पूँजी वाद ,सामंतवाद और नर्कवाद ?

 

इसी  राजनीती  के  चलते देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों का सिर्फ 4 वर्ष पूर्व का आंकलन देखें।अप्पू एरेस्थोस सुरेश की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2010 – 2016 तक 12000 सांप्रदायिक घटनाएं होचुकी हैं यानी  हर वर्ष 2000 घटनाएं ,इसके अलावा  गौ रक्षा या बीफ के नाम पर 2010 में 113 ,2014 में ये घटनाएं बढ़कर 458  होगयीं जबकि 2015 में ये 696  तक पहुँच गईं ।

धार्मिक असहिष्णुता (Religious Intolerence) के कारण 2010 में 96 ,2014 में 715 और 2015 में इनकी संख्या 905 वारदात तक पहुँच गयी थी यहाँ मार्क करने की बात यह है की 2014 से इन घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है इससे  सांप्रदायिक माहौल बना ,धुर्वीकरण हुआ नफरत बढ़ी जिसके  नतीजे  में हिन्दू मुस्लिम कॉलोनियां अलग अलग होगईं , बल्कि समाचार ऐसे भी मिले कि कुछ सोसाइटीज में मुस्लिम खरीदार को मकान नहीं खरीदने दिया गया ।इस तरह इन्टोलेरेंस और साम्प्रदायिकता के चलते विकास की उम्मीद कीजाए या विनाश की ? इस राजनीती से सत्ता में तो आसकते हैं किन्तु सत्यता नहीं आसक्ती। यह साज़िश है सांप्रदायिक पार्टियों  और संस्थाओं की कि बड़े पैमाने पर दंगे न होने दिए जाएँ जबकि छोटे दंगों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि नफरत का माहौल क़ायम रहे और चुनाव के समय उसको कैश किया जासके ।

 

यह जानने के लिए हम एक वाकिया आपके सामने रसूल (स.अ.व.) कि ज़िन्दगी का रखना चाहते हैं जिसको  Proff .V .K . Tripathi अपने भाषण में अक्सर बयान करते हैं ,”जब मुहम्मद स.अ.व. दुनिया के बनाने वाले रब और खुद को उसका दूत होने का परिचय करा रहे थे ,इस दौरान उनको बेहद सताया गया उनपर और उनके साथियों पर ज़ुल्म के पहाड़ तोड़े गए ,यहाँ तक कि उनके चाचा जो उनके समर्थक थे उनको क़त्ल करदिया गया और उनके नाक ,कान , और कलेजा चबा लिया गया ।मुहम्मद को उनके रब कि तरफ से मक्काह छोड़ने का हुक्म हुआ यह मदीना चले गए वहां इनको मानने और सुनने वालों कि संख्या देखते ही देखते अच्छी खासी होगयी फिर मुहम्मद को हुक्म हुआ कि अब अपने रब और दीन का परिचय लोगों की भलाई के लिए खुल्लम खुल्ला करो ,अवाम को क़बीले के सरदारों , हुक्मरानों की ग़ुलामी से आज़ाद कराओ उन्होंने ऐसा ही किया और सिर्फ 10 वर्षों में उनके सवा लाख अनुयायी होगये अब इनको हुक्म हुआ की मक्काह जाओ वहां जाकर उमराह और हज करो तथा लोगों को पूंजीवादी और अवसरवादि राजाओं के  ज़ुल्म से  आज़ाद कराओ और दीन समझाओ ।

 

अब यहाँ दिलचस्प बात यह है की जब मुहम्मद (स.अ.व.) की सवा लाख फ़ौज मक्काह में प्रवेश कररही थी पूरे हत्यारों और साज़ ओ सामान से लेस थी मक्काह के बड़े बड़े सरदार जिन्होंने इनको सताया था ज़ुल्म किये थे उनके चाचा के नाक कान  चाबे थे वो सब सकते में थे और कहते थे अब हम में से कोई नहीं बच पायेगा और सबको क़त्ल कर दिया जाएगा ,लेकिन मामला इसके पलट हुआ और मुहम्मद (स.अ.व.)  ने आम ऐलान करदिया आज किसी पर कोई ज़ुल्म नहीं होगा जो ख़ाने काबे में आजायेगा हमारी बात को मानेगा वो अम्न ओ शांति में रहेगा लिहाज़ा किसी के साथ कोई बुरा सुलूक नहीं हुआ और सभी ने  चैन की सांस ली ।तो ये है वो दीन जो सिर्फ अम्न ओ अमां ,प्यार ओ हमदर्दी का पाठ सिखाता है ।

 

आज जो लोग सत्ता और स्वार्थ की खातिर राजनीती करके  इंसानियत का खून करते हैं और ज़मीन पर फसाद फेलाते हैं जनता को उनके अधिकारों से वंचित रखते हैं ,पूँजीवाद और सामंतवाद को बढ़ावा देते हैं तथा  मन  घड़ंत  दीन  और  धर्मों  पर  चलते  हैं  बहुत जल्द वो मौत का मज़ा चखलेंगे और अपने कर्मों की सजा भुकतेंगे……editor’s desk

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