[]
Home » Editorial & Articles » चुनाव, पैसे से पैसे तक का खेल
चुनाव, पैसे से पैसे तक का खेल

चुनाव, पैसे से पैसे तक का खेल

Spread the love

जलाली  बादशाही  हो  के  जम्हूरी  तमाशा  हो !

आपको पता है ना 15 सितम्बर अन्तर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के लिए मशहूर है , मगर क्या यह हमारे देश में मनाया गया ?क्या आपने बड़े स्तर पर सरकारी या ग़ैर सरकारी कोई संगोष्ठी या छोटे मोटे प्रोग्राम का भी आयोजन होते कहीं देखा ? सिवाए इक्का दुक्का , इस बार लोकतंत्र दिवस की जगह “स्वच्छता ही सेवा ” ने लेली . क्या आपको नहीं लगता की लोकतंत्र और संविधान नाम को कहीं ना कहीं भुलाने की कोई कोशिश होरही है , कौन कररहा है यह तो आप ही बताएँगे? मगर आप याद रखें 15 सितम्बर अन्तर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है .

 

भारतीय मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी.रावत ने भारत में चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर पैसों के दुरूपयोग पर चिंता व्यक्त की.शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दिवस के अवसर पर वक्ताओं ने अपने भाषणों में चुनाव सम्बन्धी कई ख़ामियों को उजागर करते हुए लोकतंत्र के लिए चैलेंज बताया .

मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि चुनाव में पैसे के दुरुपयोग को रोकने के लिए आयोग राज्य से वित्तीय सहायता (स्टेट फंडिंग) से चुनाव लड़ने जैसे उपयों पर विचार कर रहा है.
रावत ने शनिवार को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस पर ‘भारत में चुनावी लोकतंत्र की चुनौतियां’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कहा,‘चुनाव में धन का दुरुपयोग भारत और भारतीय चुनावों के लिए मुख्य चिंता का विषय है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘चुनाव प्रचार में फंडिंग की पारदर्शिता के लिए कई सुझाव आए हैं, इनमें स्टेट फंडिंग भी शामिल है.’

रावत ने आगे कहा, ‘लेकिन मौजूदा कानूनी ढांचा, इस समस्या से निपटने में पूरी तरह से उपयुक्त नहीं है. इसलिए आयोग ने इस दिशा में कई सुधारात्मक उपाय सुझाये हैं.’

उन्होंने कहा कि जहां तक स्टेट फंडिंग का सवाल है, आयोग यह महसूस करता है कि धनबल पर प्रभावी नियंत्रण करना जरूरी है क्योंकि जब तक चुनावी अखाड़े में धनबल के स्रोत मौजूद रहेंगे तब तक स्टेट फंडिंग जैसी पहल अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पायेगी.

उन्होंने कहा कि भारत सहित अन्य लोकतांत्रित देशों में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए तकनीक के दुरुपयोग से डाटा चोरी और फर्जी खबरों (फेक न्यूज) का प्रसारण आज और कल के प्रमुख खतरे हैं.

रावत ने कैंब्रिज एनालिटिक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि फर्जी खबरों के बढ़ते खतरे से वैश्विक जनमत प्रभावित होने की चिंता भी बढ़ गई है.

लोकतान्त्रिक देशों में चुनाव प्रणाली में पैसे का बेजा इस्तेमाल का खेल भ्रष्टाचार के लिए रास्ते को आसान बना देता है , फेक न्यूज़ , डाटा चोरी ,पेड न्यूज़ और बूथ लूट जैसी घटनाएं आम बात है ,और जिसका कारण सिर्फ और सिर्फ सत्ता की भूक और पैसा है 

संगोष्ठी में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे, समाजशास्त्री प्रो. निरंजन साहू और वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए.

इसी अवसर पर बात करते हुए CEC रावत ने आयोग के नियमों को देश के लोकतंत्र के लिए खतरा बताकर देश में नई बहस छेड़ दी है , उन्होंने कहा है की आयोग के मौजूदा क़ानून में चुनाव के दौरान प्रत्याशियों द्वारा अंधाधुन्द पैसे के खर्च पर कोई मज़बूत क़ानून नहीं है . साथ ही सरकारी खर्च पर चुनाव लड़ने के खिलाफ कोई पाबंदी का विकल्प नहीं है .

यह बात सही है कि पैसे के अधाधुंध खर्च से लाडे गए चुनाव का नतीजा सिर्फ पैसा कमाना ही रह जाता है ,देश और समाज सेवा दुसरे नंबर पर आता है जबकि ग्राम पंचायत से पार्लियामेंट तक के हर चुनाव का उद्देश्य यदि देश और समाज कि सेवा नहीं है तो यह व्यर्थ है और एक कारोबार से ज़्यादा कुछ नहीं .

यह आम बात है कि कोई भी प्रत्याशी चुनाव से पहले मामूली नागरिक होता है और चुनाव जीतकर सीट पर बैठने के बाद मानो उसकी लाटरी लग जाती है , पैसा बरसने लगता है अगर खुद नहीं तो अपने परिवार या सहयोगियों के नाम पर पैसा इकठ्ठा करने का काम शुरू होजाता है ,

हालांकि आज भी गिने चुने नेता ऐसे हैं जो सियासत पैसे के लिए नहीं बल्कि सेवा भाव से ही करते हैं मगर उनकी संख्या न होने के बराबर हैं और उनके बारे में यह अफवाह या भरम पहला दिया जाता है कि यह बाँदा राजनीत के लिए FIT नहीं है , यानी यह भ्रष्ट नहीं है .

जब राजनितिक हलकों का यह हाल होजाये तो आप सहज ही देश के भविष्य का अंदाजा करसकते हैं , ऐसे में मुख्य कहुनाव आयुक्त के सुझाव या ब्यान बहुत हम हैं लेकिन देखना यह है कि यह श्रीमान राजनितिक माफियाओं कि पैसा कमाने कि चक्की के पाटों के बीच अपने को धुरी के साथ रखते हैं या फिर भरष्टाचार कि चक्की में पिस जाते हैं.

लेकिन यह सच है जबतक राजनीती को बुनयादी तौर पर पैसे और सत्ता के भिखारियों से दूर नहीं रखा जाता और तो देश में विकास और शान्ति तथा सद्भाव का खुआब सिर्फ खुआब ही रहेगा, और देश के लोकतंत्र एवं संविधान के लिए लगातार खतरा भी बना रहेगा .

जलाली  बादशाही  हो  के  जम्हूरी  तमाशा  हो !

जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी !!

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Scroll To Top
error

Enjoy our portal? Please spread the word :)