नेताओं के पाला बदलने ने दी चुनावी मौसम की दस्तक

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परिस्थितियां जितनी बदलती हैं, उतनी ही एक समान भी रहती हैं – यह कहावत जितनी राजनीति के परिप्रेक्ष्य में सटीक उतरती है, उतनी शायद किसी और परिप्रेक्ष्य में नहीं। उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति के नित नए घटनाक्रम में ऐसा ही कुछ हो रहा है, जो मूल्यों की राजनीति के पूरी तरह से अप्रासंगिक होने का ही संकेत है।

हर चुनाव के कुछ महीनों पहले से ही स्थानीय नेताओं से लेकर प्रदेशस्तरीय नेता और यहां तक कि पूर्व मंत्री, विधायक आदि भी एक पार्टी छोड़कर दूसरी का रुख करने लगते हैं, और कुछ वरिष्ठ नेताओं का तो हवा का रुख पहचानने का इतना अच्छा अंदाज़ है कि उनके पार्टी बदलने से ही अगले नतीजे का संकेत मिल जाता है।

पिछले दिनों आगरा में जो कुछ भी हुआ, वह इससे एक कदम आगे है। आगरा में भारतीय जनता पार्टी की एक फायरब्रांड महिला नेता कुंदनिका शर्मा अचानक पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं। यह आगरा के एक वॉर्ड से सभासद हैं और पिछले महीने वहां विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद उन्होंने विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम के दौरान एक भड़काऊ भाषण भी दिया था, जिस सिलसिले में इनके खिलाफ मुकदमा भी चल रहा है। मामले में पार्टी के आगरा नेता और केंद्रीय मंत्री रमाशंकर कठेरिया और कुंदनिका दोनों के ही खिलाफ शिकायत हुई थी, लेकिन कठेरिया के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि कुंदनिका को गिरफ्तार भी कर लिया गया। कुंदनिका इस बात से नाराज़ थीं कि कठेरिया ने मुसीबत के दिनों में कुंदनिका का साथ नहीं दिया। कुंदनिका प्रख्यात साहित्यकार गोपालदास नीरज की पुत्री हैं। अब खबरें हैं कि कुंदनिका को समाजवादी पार्टी की ओर से आगरा की ही किसी सीट से विधानसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाया जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी ने इस झटके का जवाब ऐसे ही एक झटके से समाजवादी पार्टी को दिया। आगरा से ही समाजवादी पार्टी की एक मजबूत महिला नेता हेमलता दिवाकर ने अचानक पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। हेमलता को समाजवादी पार्टी ने आगरा ग्रामीण सीट से पार्टी का विधानसभा प्रत्याशी घोषित कर रखा था। इस गोपनीय मिशन को बीजेपी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की उपस्थिति में पूरा किया गया, और माना जा रहा है कि कुंदनिका के बीजेपी छोड़ सपा में जाने से जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई हेमलता के बीजेपी में आने से होगी। हेमलता ने वर्ष 2012 में सपा प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन दूसरे स्थान पर रही थीं। माना जा रहा है कि इस बार भी उन्हें डर था कि गुटबाजी के चलते वह इस बार भी सपा से नहीं जीत पाएंगी।

अब यह देखना बाकी है कि कुंदनिका के खिलाफ विवादास्पद भाषण देने के मुकदमे का क्या होगा, और उनके चुनाव प्रचार के दौरान इस भाषण का उल्लेख आने पर वह क्या कहेंगी। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि बीजेपी के प्रचार में उनके खिलाफ क्या कहा जाएगा। आगरा से ऐसी रिपोर्ट मिल रही हैं कि वहां के सपा समर्थक मतदाताओं का एक वर्ग कुंदनिका के सपा में आने से खुश नहीं है, क्योंकि उनके बयान अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ दिए गए थे। अब यही वोटर उन्हें सपा के प्रत्याशी के रूप में कैसे समर्थन दे, इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। माना जा रहा है कि कुंदनिका के सपा में आने के पीछे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और साहित्यकार नीरज की नजदीकियों की भी भूमिका हो सकती है, लेकिन आगरा के सपा नेताओं के बीच इस बात को लेकर बेचैनी बरकरार है।

कुछ ऐसा ही वाकया वर्ष 2009 में भी हुआ था, जब मुलायम सिंह यादव ने अप्रत्याशित रूप से बीजेपी के धुरंधर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को सपा में शामिल कर लिया था, और उसके नतीजे के तौर पर न केवल मोहम्मद आज़म खान ने सपा छोड़ दी थी, बल्कि 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा को इसका परिणाम भी भुगतना पड़ा था। कल्याण सिंह भी केवल बीजेपी के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व और अटल बिहारी वाजपेयी से विवाद के चलते ही पार्टी छोड़ सपा में शामिल हुए थे, लेकिन जल्द ही वह वापस बीजेपी में चले गए, और 2010 में आज़म भी वापस सपा में आ गए।

अगर एक कट्टर हिन्दुत्व की छवि वाले नेता को केवल इस बात के लिए सपा में लिया जाता है कि उनकी अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से अनबन हुई है, तो इसमें सपा को चुनावी लाभ मिलने पर एक बड़ा सवाल उठता है। हिन्दुत्ववादी ताकतों के विरुद्ध खड़े होने को तत्पर सपा आने वाले चुनाव प्रचार के दिनों में अपने ही मंच पर एक ऐसी नेता के रहने को कैसे उचित ठहराएंगे, यह देखना बाकी है। लेकिन यह तो साफ है कि कल्याण सिंह के सपा में अचानक आने और जाने के बीच हुए नुकसान की याद पार्टी को नहीं है। चूंकि राजनीति में सब चलता है, इसलिए ऐसी ही घटनाएं आने वाले दिनों में और होती रहें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

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