आह ,शफी खान (बेकल उत्साही) नहीं रहे

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गीतों में हुस्न ए ग़ज़ल ,ग़ज़लों में गीतों का मिज़ाज
मुझको बेकल तेरा असलूब ए सुख़न अच्छा लगा

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मशहूर ओ मारूफ़ साहित्यकार , शायर , कवि , पूर्व राज्ये सभा सदसय ,पदम् श्री सम्मानित ,गंगा जमनी तहज़ीब के अलम बरदार , देहात को नई पहचान देने वाले मुहिब्बे वतन जनाब शफी खान लोधी बेकल उत्साही साहब दार ए फानी से कूच कर गये ।iइस वक़्त आपकी उम्र 92 साल थी ।अल्लाह पाक मरहूम की रूह को सुकून अता करे और जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम दे , तमाम अहल ए खाना को सब्र ए जमील अत करे आमीन सुम्मा आमीन ।मरहूम ने अहल ए खाना में अपनी शरीक ए हयात के साथ चार बेटियां और दो बेटे छोड़े हैं ।

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बेकल उत्साही का जन्म एक जून 1924 को हुआ था। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के उतरौला के रहने वाले उत्साही का असली नाम मुहम्मद शफी खान था। गुलामी के वक्त अपने गीतों की वजह से उत्साही को कई बार जेल भी जाना पड़ा. मरहूम उत्साही को कांग्रेस की ओर से 1986 में आँजहानी राजीव गाँधी ने राज्ये सभा की सदसयता देने के लिए खुद टेली फ़ोन पर पेशकश की थी ।मरहूम इस वाक़ये को मुझसे बयान करते थे । बज़्म ए चराग़ां उर्दू सीरियल की शूटिंग के दौरान मुझे मरहूम की सोहबत में रहने का काफी मौक़ा मिला ।

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