किस मुँह से करें उन के तग़ाफ़ुल की शिकायत !!
ख़ुद हम को मोहब्बत का सबक़ याद नहीं है !!
भारतीय मूल के 34 वर्षीय ज़ोहरान ममदानी NewYork City Hall में न्यूयॉर्क शहर के 112वें मेयर के रूप में शपथ ले रहे थे और इधर दिल्ली में ज़ोहरान ममदानी का उमर ख़ालिद के नाम लिखे लेटर की चर्चा शुरू हो गई थी.
कहा जा रहा है कि वो सिर्फ़ एक व्यक्तिगत सहानुभूति नहीं, बल्कि भारत की न्यायिक प्रक्रिया और आंतरिक संप्रभुता पर सीधा सवाल खड़ा करने जैसा है। लेकिन सवाल यह के किसी विदेशी जनप्रतिनिधि को यह मौक़ा क्यों मिलता है और कौन देता है कि वह भारत के भीतर चल रहे संवेदनशील मामलों पर नैतिक उपदेश दे?
बीजेपी का यह कहना कि “भारत के अंदरूनी मामलों में दख़ल बर्दाश्त नहीं” यह महज़ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और संवैधानिक चेतावनी भी हो सकती है। मगर अमेरिका पर इसका क्या असर होगा? शायद कुछ भी नहीं !!!
और वैसे भी इंसाफ़ सुनिश्चित करने की बात करना, सुझाना और याद दिलाना ये सब देश के स्वाभिमान को बढ़ाता है घटाता नहीं है. अलबत्ता अमेरिका जब भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर भारत वापस भेज रहा था और दुनिया इस नज़ारे को देख रही थी तब ज़रूर देश का स्वाभिमान धूमिल हो रहा था. अफ़सोस के इसपर कोई टिपण्णी सर्कार में बैठी पार्टी के नेताओं की तरफ़ से नहीं आई थी.
सवाल हुआ कि क्या ज़ोहरान ममदानी ने भारत की अदालतों में जाँच एजेंसियों के ज़रिये जमा दस्तावेज़ जो उमर खालिद को मुजरिम ठहराने के लिए जमा किये गए थे उनको पढ़ा है? और क्या Agencies 5 साल का लम्बा वक़्त गुज़र जाने के बाद भी इनको मुजरिम ठहराने के लिए दस्तावेज़ इकट्ठे नहीं कर पाईं?
जवाब यह दिया जाता है के जिस आरोपी को अपने बेगुनाह होने का मौक़ा ही न मिला हो, उसको लगातार 1800 दिनों से ज़्यादा जेल में क़ैद रखा हो. इसके बाद जांच एजेंसियों के दस्तावेज़ देखने की ज़रुरत कहाँ बचती है. उसके बाद उमर की गिरफ़्तारी कितनी सही और ग़लत का अंदाज़ा खुद बखुद लगाया जा सकता है.
यूँ तो हालिया दिनों में भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में कई ऐसे बड़े फैसले देश और दुनिया के सामने आ चुके हैं जो या तो आस्था की बुनियाद पर दिए गए थे या फिर सरकारी दबाव में.
ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री के दोस्त के मुल्क के राजनेता की चिट्ठी जिसको भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा रहा है, उसके अमेरिका में क्या मानी निकाले जा रहे हैं. भारत के परिपेक्ष में ट्रंप की नीतियों के कारण पहले से ही भारत-अमेरिका संबंधों में काफी खटास आ चुकी है, NewYork मेयर के लेटर से रिश्तों में और दरार बढ़ जाने के इमकान बढ़ गए हैं.
लेकिन याद रहे ममदानी अकेले नेता नहीं हैं जो उमर ख़ालिद की हिमायत में आये हैं, उनके अलावा अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई दुसरे सांसदों ने भी उमर ख़ालिद के मामले में एकजुटता दिखाते हुए उसकी ज़मानत की मांग राखी है.
अमेरिकी सांसद जिम मैकगवर्न जो ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट भी हैं और जेमी रस्किन द्वारा अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा को लिखे पत्र में ख़ालिद को ज़मानत देने की अपील की गई है. साथ ही ख़ालिद का जुडिशल ट्रायल शुरू किए जाने की भी मांग की गई है.
मैकगवर्न और रस्किन के अलावा, पत्र पर डेमोक्रेटिक सांसद क्रिस वैन होलेन, पीटर वेल्च, प्रमिला जयपाल, जैन शाकोव्स्की, रशीदा तालिब और लॉयड डॉगेट के हस्ताक्षर शामिल हैं.
सांसदों ने कहा है कि ट्रायल शुरू हुए बिना ख़ालिद की लगातार बरसों की हिरासत अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मानदंडों का उल्लंघन है. मैकगवर्न ने इस चिट्ठी को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर साझा किया है.
याद रहे उमर ख़ालिद को दिल्ली दंगों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, इत्तिफ़ाक़ यह है कि उन्हीं दिनों अमेरिकी ट्रम्प भी भारत के दौरे पर थे जब दिल्ली सांप्रदायिक दंगों में जल रहा था. शर्मनाक यह है कि दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपी को बरी कर दिया गया था और वो NCT दिल्ली के कानून एवं न्याय मंत्री का पद भार संभाल रहे हैं.
उमर खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि प्रशासनिक चूक, स्टाफ की कमी और जांच अधिकारी की अनुपस्थिति जैसे कारणों से सुनवाई में 55 बार से ज्यादा देरी हुई है। उन्होंने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन बताया है।
सिब्बल का कहना है कि सरकार उमर खालिद को सजा देने पर तुली हुई है और अदालतें मामले को अंतहीन रूप से खींचकर इसमें मदद कर रही हैं, जिसे अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने “अन्याय” का सबसे बड़ा रूप बताया है।
जेल की बुलंद दीवारों के अंदर सलाखों के पीछे JNU के एक तालिबे इल्म और अमेरिका की सबसे घनी आबादी के शहर Newyork के city हॉल में शपथ लेने वाले Mayor के बीच रिश्तों की कहानी की हकीकत को समझने की कोशिश की तो पता चला दर्द सीनों में अभी ज़िंदा है.
अमेरिका के संसद भवन तक पहुँचने वाली मानवाधिकार की यह खबर दुनिया में ज़िंदा दिलों की दास्ताँ को बयाँ करती है. अगर यह दर्द ज़ोहरान ममदानी तक सीमित होता तो इसको रसूल SAW की हदीथ “إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ”
अनुवाद: “यकीनन मोमिन (आपस में) भाई-भाई हैं।” से जोड़ लेते लेकिन वहां तो कई अमेरिकी ईसाई सांसद और मानवाधिकार संस्था के चेयरमैन इंसाफ़ की इस लड़ाई में शामिल हो चुके हैं.
हालांकि यह सवाल भी हो रहा है कि ये सांसद ग़ाज़ा के मासूमों पर होने वाले तारीख़ के बदतरीन ज़ुल्म और नाइंसाफी के दौरान कहाँ थे ?
हालाँकि देश की अदालतों में लंबित मामलों की सूची बहुत लम्बी है, आपको मालूम है भारत की Courts कुल लंबित मामले कितने हैं ? सभी स्तरों पर देखा जाए तो 5 करोड़ 25 लाख से ज़्यादा मामले पेंडिंग हैं, जिसमें से 4 करोड़ 6 लाख से ज़्यादा मामले निचली अदालतों में हैं.
उच्च न्यायालयों में 63 लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट में 86,000 से ज़्यादा मामले सितंबर 2025 तक लंबित पड़े हुए हैं. आपको बता दें High courts और Sub_Ordinate Courts में 32 लाख से ज़्यादा मामले 10 सालों से ज़्यादा समय से पेंडिंग हैं.
अदालतों में जजों,न्यायिक अधिकारियों और अन्य न्यायिक कर्मचारियों की भारी कमी इसकी वजह बताई जाती है , जिससे मामलों का निपटारा नहीं हो पा रहा है. इस तरफ किसी सरकार का कोई ध्यान नहीं गया है, और जाए भी क्यों सरकार में बैठे लोगों को तो इंसाफ़ मिल ही जाता है.
बल्कि यूँ कहें न्याय उनकी बपौती होती है, और अक्सर सर्कार में बैठे लोगों पर जुर्म के सुबूत के बावजूद बरी कर दिया जाता है. इसकी घटनाएं आम तौर पर सामने आती ही रहती हैं. उन्नाव रेप मामले के मुल्ज़िम कुलदीप सिंह सेंगर की ताज़ा मिसाल सामने है.
हर साल बड़ी संख्या में नए मामले दर्ज होते हैं, जिससे अदालतों पर दबाव बढ़ता है. राष्ट्रीय लोक अदालतों के ज़रिए बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा किया जाता है, लेकिन यह कुल मुक़द्दमों की पेंडेंसी के मुक़ाबले बहुत कम है.
ऐसे में उमर खालिद और उनके साथियों के लिए दुनिया भर में इनको बरी किये जाने की मांग उठने लगी है. ज़ाहिर है यह मामला अब सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. देखना यह है कि सरकार अंतर्राष्ट्रीय दबाव में इंसाफ़ करती है या संवैधानिक तरीके से उमर खालिद उनके साथियों और इन जैसे लाखों बेगुनाह आरोपियों को कब तक इंसाफ़ दे पाती है.
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