पानी पर जंग, सड़कें खून से लाल

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दोस्तों बहुत ख़ौफ़नाक है बोलिविया में हुए जल युद्ध की हकीकत –

दोस्तों , धरती पर बेशुमार नेमतें रब ने इंसान के लिए पैदा की हैं , इनमें पानी कुदरत का अनमोल तोहफा है जो हर एक के लिए फ्री करदिया है , इसी तरह हवा और सूरज की रौशनी भी रब की बड़ी नेमतों में शुमार होती हैं ,और ये सब उपहार मानव समेत तमाम जीव जंतु के लिए आम है .

जल बिना धरती की कल्पना अधूरी है. बिना पानी ये महज मिट्टी का एक गोला मात्र है. जल ही है, जो धरती को हरियाली देता है और सभी जीवों को जीवन भी .

Cochbamba Boliviya

दुनिया भर में पानी की बढ़ती कमी, एक बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है. धरती पर मौजूद पीने लायक पानी की मात्रा बहुत तेजी से कम हो रही है. कई बड़े विशेषज्ञों को मानना है कि दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ही होगा.

दोस्तों ज़रा सोचो क्या हो, जब इसी जल पर कड़ा पहरा लगा दिया जाए.और आपसे कहा जाए की पानी की क़ीमत अदा करो वार्ना सजा भुगतने को तैयार होजाओ और तब दुनिया इस बात का अंदाजा लगाए कि पानी के लिए होने वाली लड़ाई कैसी होती है?

इसका एक उदाहरण दक्षिणी अमेरिकी के बोलिविया देश का हमारे सामने मौजूद है .दोस्तों बहुत खौफनाक है बोलिविया में हुए जल युद्ध की हकीकत –

सरकार ने किया पानी का निजीकरण

इस कहानी की शुरूआत होती है, साल 1999 में, जब विश्व बैंक के सुझाव पर बोलिविया सरकार ने संसद से कानून 2029 को पारित कर कोचाबांबा की जल प्रणाली का निजीकरण कर दिया. फिलहाल आप भारत में किसान बिल को ज़ेहन से निकाल दें .और विश्व बैंक को ज़ेहन में रखें .और Covid के परिपेक्ष में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO को भी होसके तो ज़ेहन में रखिएगा काम आएगा .

Bolivia Cochamba City

बोलिविया सरकार ने जल प्रणाली (Water Resources ) को ‘एगुअस देल तुनारी’ नाम की एक कंपनी को बेच दिया, जोकि स्थानीय व अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों का एक संघ था.

निजीकरण से पहले तक कोचाबांबा की 80 प्रतिशत आबादी के पास खुद की स्थानीय जल व्यवस्था थी, जोकि एक स्थानीय संस्था द्वारा मुहैया कराई गई थी. यह संस्था लोगों से केवल बिजली व कुछ छोटे-मोटे खर्चे लेकर उन्हें पर्याप्त पानी देती थी.

मगर बोलिविया सरकार व बड़ी Private कंपनियों की नजरों में यह स्थानीय संस्थाएं किसी लुटेरे से कम नहीं थीं.और जनता को यही बताया गया था की ये बिचौलिया को हम हटा देंगे और देश की जनता को सस्ता और साफ़ पानी मोहय्या कराएँगे . अब आप फिर अपने ज़ेहन में कृषि क़ानून को भी रखिएगा

ऐसे में जल प्रणाली का निजीकरण होते ही इन सभी संस्थाओं की दुकानें बंद हो गईं. कानूनी तौर पर अब कोचाबांबा की ओर आने वाले पानी और यहां तक कि वहां होने वाली बारिश के पानी पर भी ‘एगुअस देल तुनारी’ कंपनी का अधिकार होगया था .यहाँ अडानी अम्बानी का कोई ज़िक्र नहीं है …..

बूँद बूँद को मोहताज हुए लोग

निजीकरण के कुछ समय बाद ही कंपनी ने घरेलू पानी के बिलों में भारी बढ़ोतरी करनी शुरू करदी . उन्होंने आम लोगों में पानी की अधिक मांग को देखते हुए उसके दाम एकाएक बढ़ा दिए. इससे लोग बौखला गए.कुछ लोग जो सरकार के भक्त या Private कंपनियों के पालतू कुत्ते थे वो बोलिविया की सड़कों और दुकानों पर कहते घुमते थे पानी की क़ीमतो के बढ़ने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता अगर 100 डॉलर लीटर भी होजाता है . अब इस पूरे परिपेक्ष को आप Petrol के बढ़ते दामों से जोड़कर फिलहाल आप न देखें .

Europe में लोग इस तरह की कीमतों के बढ़ने के आदि हैं , उनकी Monthly आमदनी अच्छी होने की वजह से उनपर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता अगर ब्रिटेन जैसे देश की बात करें, तो वहां के लोगों को इस प्रकार के अधिक दामों की आदत है, क्योंकि वहां पर लोगों के पास जीविका कमाने के पर्याप्त साधन हैं. इसकी तुलना में यदि गरीब देशों की बात की जाए, यहां के लोग मुश्किल से महीने में 80 से 100 डॉलर ही कमा पाते हैं.

बोलिविया के लोगों के लिए इतनी उच्च दरों पर पीने का पानी खरीद पाना मुमकिन नहीं था. निजीकरण के कारण जल्द ही लोग पानी के लिए मोहताज होने लगे.अब पानी के लिए लोगों को भारी कीमतें चुकानी पड़ रही थीं और लोगों के पास उन्हें चुकाने के लिए पैसे भी नहीं थे. ऐसे में लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश पनपने लगा.और देखते ही देखते विद्रोह शुरू होगया .

वैसे डासना के मंदिर में एक नाबालिग को पानी पीने के जुर्म में इसलिए नहीं पीटा गया था की वहां पानी मोल का था , बल्कि वहां तो इंसानियत ही मुर्दा हो गयी थी , मंदिरों में प्याऊ लगाए जाते थे , अब ……

विरोध की जंग में जो सबसे पहला संगठन आगे बढ़कर आया उसका नाम था फैबराइल्स. यह संगठन कोचाबांबा के फैक्टरी कर्मचारियों का था. उन्होंने सरकार के फैसले का विरोध किया और निजी कंपनियों की मनमानी को रोकने की गुहार लगाई.

धीरे-धीरे स्थानीय लोग भी इस संगठन के साथ मिलकर सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़े होगये .
और पानी की यह लड़ाई अब एक बड़े विद्रोह का रूप ले चुकी थी. लड़ाई में फैबराइल्स संगठन विद्रोहियों का केंद्र बिंदु बन गई थी .

अपने हक और निजीकरण के खिलाफ लिए हथयारबन्द लोग सड़कों पर उतर आए थे और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे थे. स्थिति इस कदर खराब हो गई कि बोलिविया सरकार को पुलिस व सुरक्षा दस्तों को सड़कों पर तैनात करना पड़ा. इसके बाद इस विद्रोह ने एक जंग का रूप ले लिया.अब देश की जनता और मिलटरी तथा police आमने सामने थी .

Statue of cristo de la concordia

अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली जनता को रोकने के लिए सुरक्षा बल की ओर से गैस के गोले छोड़े गए और उन पर भरी लाठीचार्ज और गोली तक चलाई गयी . मगर लोगों का गुस्सा इतनी जल्दी शांत होने वाला नहीं था.

खैर लोगो के आंखों की पट्टी खुली तो जमकर विरोध हुआ। अनेको लोगो को गोलियों से भून दिया गया।क्योंकि पुलिस और फ़ौज तो होती ही सरकार के लिए,और सरकार होती है पूंजीपतियों की जेब मे।शायद हमारी तो जेब नहीं है बल्कि ….

इस दौरान गुस्साई भीड़ ने भी पुलिस पर हमला बोल दिया और पैट्रोल बम, लाठी और पत्थर इत्यादि का जमकर उपयोग किया गया .जिसके नतीजे में सैकड़ों लोग शदीद घायल हुए,और दर्जनों मारे गए , घायलों में पुलिस वाले भी शामिल थे.

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इस विद्रोह के चलते साल 2000 के अप्रैल महीने तक हालात इतने खराब होगये थे कि कोचाबांबा समेत कई शहरों की व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई.पूरा बोलिविया जब जलने लगा तब सर्कार की नींद खुली और बोलिविया सरकार को जल प्रणाली के निजीकरण के अपने फैसले को वापस लेना पड़ा. सरकार द्वारा पहुंचाई गई क्षति के हरजाने के रूप में अदालत में याचिका भी दायर की गई, हालांकि सरकार द्वारा फैसला वापस लेने के बाद भी काफी समय तक यह जंग जारी रही. जिसके चलते साल 2006 में एक जल मंत्रालय स्थापित किया गया.

बोलिविया में पैदा हुए इन हालात के लिए दुनिया भर में सरकार की निंदा हुई ,मौजूदा सरकार लोगों के मौलिक अधिकार देने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है. नतीजतन देश में हालात इस कदर बेकाबू हुए.

इसके 3 वर्ष बाद साल 2009 में बोलीविया के संविधान के तहत जल प्रणाली के निजीकरण की संभावना का प्रावधान भी दर्ज किया और सरकार ने 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा से इस अधिकार की सफलतापूर्वक मान्यता भी प्राप्त की.

बोलीविया के निजीकरण के इस उदाहरण ने दुनिया और ख़ास तौर से भारत जैसे Developing Nations के लिए एक सबक़ दिया के वो किसी भी क्षेत्र में निजीकरण से पहले सरकार जनता के मूड को समझे या उसके लिए Refrendom कराये अन्यथा देश में विद्रोह उतपन्न होगा और देश में विकास की राह में बड़ी अड़चन पैदा होगी साथ ही दुश्मन देशों को भी हमलावर होने का मौक़ा मिलेगा .ऐसे में जब भारत पहले ही आर्थिक मंदी , बेरोज़गारी और कुपोषण के साथ covid महामारी से जूझ रहा हो , देश में साम्प्रदायिकता , अराजकता और अलगाववाद तथा नक्सलवाद जैसी घटनाएं भारत को बहुत पीछे करदेंगी .

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