योगेन्द्र यादव Social Reformer
कहते हैं झूठ के पांव नहीं होते। नहीं होते होंगे, लेकिन पंख जरूर होते हैं। यकीन न हो तो देख लीजिए कि पिछले दो सप्ताह से देश और दुनिया में 21 मिलियन डॉलर वाला झूठ कितनी तेजी से घूमा। चाहें तो इस बहाने यह भी समझ लीजिए कि पब्लिक की आंखों में धूल झोंकने का यह गोरखधंधा चलता कैसे है।
बात शुरू हुई अमरीका से। राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प ने धन्नासेठ एलन मस्क को जिम्मेदारी दी कि वह अमरीकी सरकार के खर्चे में कटौती करें। मस्क के दफ्तर ने सबसे पहले अमरीका के विदेश मंत्रालय की मार्फत दुनिया में सहायता बांटने वाली संस्था यू.एस. एड (USAID) को बंद करने की घोषणा की।
फिजूलखर्ची के सबूत के तौर पर एक लिस्ट जारी की, जिसमें भारत में मतदान बढ़ौतरी के लिए दी जाने वाली 21 मिलियन डॉलर (आज लगभग 170 करोड़ रुपए) की ग्रांट रद्द करने का जिक्र था।
पिछली सरकार का मखौल उड़ाते हुए राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी इसी उदाहरण को दोहराया और पूछा कि आखिर राष्ट्रपति बाइडेन की सरकार भारत के चुनाव में ‘किसी और’ को जिताना चाहती थी?
बस अब क्या था। भारत में इसे यूं पेश किया गया कि अमरीकी सरकार ने पिछले लोकसभा चुनाव में दखलअंदाजी करने के लिए पैसा दिया था। आरोप संगीन था।
लेकिन किसी को जांच करने की या यह पूछने की भी फुर्सत नहीं, कि आखिर मोदी सरकार की नाक के नीचे अमरीकी सरकार भारत में मोदी को हराने के लिए पैसे भेज कैसे सकती थी। अगर यह हो सकता है तो फिर कुछ भी हो सकता है क्योंकि सरकार सो रही क्या ?
आनन-फानन में सभी लोग पिल पड़े। लोकसभा में भाजपा के निशिकांत दुबे, पूर्व मंत्री राजीव चंद्रशेखर, प्रधानमंत्री के आॢथक सलाहकार संजीव सान्याल और आई.टी. सैल के अमित मालवीय समेत पूरा सरकारी तंत्र, दरबारी मीडिया और भक्त मंडली टूट पड़ी।
कांग्रेस और विपक्षी दलों पर उंगलियां उठाई गईं। यही नही, अमरीकी पैसा किस-किस पत्रकार और आंदोलनजीवी के पास पहुंचा होगा, उसकी सूची और फोटो भी चल निकली। लेकिन हाय, जल्द ही सारा गुड़ गोबर हो गया।
देश के एक अखबार ‘इंडियन एक्सप्रैस’ ने इस खबर की जांच करने की जहमत उठाई और पाया कि सारी कहानी कपोल-कल्पित थी। यानी कि यू.एस. एड द्वारा भारत को ऐसी कोई 21 मिलियन डॉलर की ग्रांट दी ही नहीं गई थी।
अगर इस राशि की कोई ग्रांट थी तो वह बंगलादेश में चुनावी जागरूकता के लिए ‘नागोरिक प्रोजैक्ट’ के तहत दी गई थी। शायद एलन मस्क के दफ्तर ने बंगलादेश और भारत में घालमेल कर दिया होगा।
अगले दिन भारत सरकार के वित्त मंत्रालय की 2023-24 की रिपोर्ट भी मिल गई, जिसमें यू.एस. एड की भारत में हुई सारी फंडिंग का ब्यौरा है। उसमें चुनाव से जुड़ी किसी ग्रांट का जिक्र नहीं है।
पता लगा कि जिस यू.एस. एड (USAID) को देश के लिए खतरा बताया जा रहा था, उससे भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों का घनिष्ठ रिश्ता है, ज्वायंट प्रोजैक्ट चल रहे हैं, बैठकें हो रहीं हैं। स्मृति ईरानी इसी यू.एस. एड की एम्बैसेडर रह चुकी हैं।
भाजपा नेताओं के (USAID) के प्रतिनिधियों के साथ दर्जनों फोटो निकल आए। कायदे से तो झूठ का गुब्बारा फटने के बाद इसका प्रचार करने वालों को माफी मांगनी चाहिए थी। कम से कम यह फेक न्यूज बंद हो जानी चाहिए थी।
लेकिन माफी मांगने की बजाय आई.टी. सैल अब ‘इंडियन एक्सप्रैस’ के पीछे पड़ा। भंडाफोड़ होने के बाद भी विदेश मंत्रालय ने बयान दिया कि अमरीका से आई खबर चिंताजनक है, इसकी जांच की जाएगी। गोदी मीडिया ने भंडाफोड़ की खबर नहीं छापी, विदेश मंत्रालय का बयान छापा।
झूठ पर लीपापोती के लिए अब भक्त मंडली ने तीन नए तर्क पेश किए। पहला यह कि (USAID) की यह ग्रांट अभी आई नहीं थी, आने से पहले ही मस्क ने रद्द कर दी। तर्क हास्यास्पद था, चूंकि अगर अब तक आई नहीं थी तो 2024 के लोकसभा चुनाव पर असर डालने का आरोप बेतुका है।
इस तर्क की रही-सही हवा अमरीकी अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने निकाल दी। उसने अमरीका में USAID के दफ्तर में जांच करके बताया कि भारत के चुनाव से संबंधित कोई भी ग्रांट न तो दी गई थी, न ही उसका कोई प्रस्ताव था। इसलिए रद्द करने का सवाल ही नहीं होता।
ध्यान बंटाने के लिए भक्त मंडली ने दूसरा तर्क यह दिया कि असली मामला तो 2012 में कांग्रेस सरकार के दौरान USAID से मिली ग्रांट का है। वॉशिंगटन पोस्ट ने उसका भांडा भी फोड़ दिया और बताया कि 2012 में यू.एस. एड के जरिए भारत के चुनाव आयोग को ग्रांट मिली थी, लेकिन उसका भारत से कोई लेना-देना नहीं था।
यह ग्रांट इसलिए थी कि भारत का चुनाव आयोग अफ्रीका और अन्य देशों की चुनावी मैनेजमैंट में मदद कर सके। अब झूठ के सौदागरों के पास एक अंतिम तर्क बचा था – आखिर खुद अमरीका के राष्ट्रपति ने ऐसा माना है। USAID के बारे में उनसे ज्यादा किसे पता होगा?
यह बात भी हास्यास्पद थी, चूंकि ट्रम्प और झूठ का चोली-दामन का साथ है। अमरीका के अखबार तो बाकायदा ट्रम्प के झूठ का स्कोर प्रकाशित करते हैं। एक गिनती के हिसाब से पहली बार राष्ट्रपति रहते हुए ट्रम्प ने 30,573 बार झूठ बोला था, यानी हर दिन 21 बार।
खैर, इस मामले में खुद ट्रम्प ने ही सारे आरोपों की हवा निकाल दी। पहले दिन बोला कि यह पैसा भारत के चुनाव में किसी और को जिताने के लिए दिया गया था। दूसरे दिन कहा कि यह तो भारत के जरिए अमरीका के डैमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं को दी गई घूस थी।
तीसरे दिन बोले कि यह पैसा ‘मेरे दोस्त प्रधानमंत्री मोदी को चुनाव में मतदान बढ़ाने’ के लिए गया। चौथे दिन 21 की बजाय 18 मिलियन डॉलर की बात की। जब मोदी का नाम ले लिया तो गोदी मीडिया को भी सांप सूंघ गया। अब उन्हें ट्रम्प में झूठ दिखने लगा।
आप सोचेंगे कि चलिए आखिर सच की जीत हुई। लेकिन जरा सोचिए। झूठ अगर सौ लोगों तक पहुंचा तो उसका भंडाफोड़ पांच व्यक्तियों तक भी नहीं पंहुचा। कुुल मिलाकर जनता को यही याद रहेगा कि अमरीकी पैसे वाला USAID का कुछ लफड़ा था।
और कुछ नहीं तो कम से कम महाकुंभ और नई दिल्ली स्टेशन में सरकारी लापरवाही से हुई मौतों की खबर दब गई। झूठ के सौदागरों का काम बन गया। तो इस तरह चलता है फेक न्यूज का कारोबार और धोखेबाज़ , नफरती व झूठ की सियासत का खेल ….
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