लंगर चला के भूखों को खाना खिलाइये

कलीमुल हफ़ीज़
मुसलमानों को साबित करना होगा कि वो इन्सानियत के लिये ज़रूरी भी हैं और फ़ायदेमन्द भी
रिज़्क़ अता करना एक ऐसी ख़ूबी है जो सिर्फ़ अल्लाह ही के पास है, वही सारी मख़लूक़ को रिज़्क़ पहुँचाने वाला है। वो सीप में बन्द कीड़े को भी पालता है और हवा में उड़ते परिन्दों को भी। उसने तमाम मख़लूक़ के रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी ले रखी है।
अल्लाह को ये बात बहुत पसन्द है कि उसके बन्दे उसके रंग में रंग जाएँ। मुहब्बत का तक़ाज़ा भी यही है कि मुहब्बत करनेवाला अपने महबूब की तमन्नाओं पर पूरा उतरे, उसके इशारों पर चले, उसकी पसन्द को अपनी पसन्द बनाए। खाना खिलाने का अमल इन्सान को अल्लाह की नज़र में पसन्दीदा भी बनाता है और उसके क़रीब भी करता है। जो लोगों को ख़ूब खाना खिलाता हो, वो इन्सानों की नज़र में भी महबूब बन जाता है।
नबी अकरम (सल्ल०) लोगों को ख़ूब खाना खिलाते थे। मस्जिदे-नबवी के बाहर बने चबूतरे ‘सुफ़्फ़ा’ की हैसियत, सराय, मदरसा और लंगर ही की थी। मदीना पहुँचकर आप (सल्ल०) ने सबसे पहली तालीम भूखों को खाना खिलाने ही की दी थी, बहुत-से सहाबा का रोज़ का काम था कि वो बग़ैर मिस्कीन को साथ लिये खाना नहीं खाते थे। क़ुरआन में खाना ना खिलाने वालों को आख़िरत का इनकार करने वाला तक कहा गया है।
क़ुरआन मजीद में कहा गया है कि जहन्नम में जानेवालों से जब ये मालूम किया जाएगा कि तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम में ले आई तो वो दो बातें कहेंगे, एक ये कि हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे, दूसरे ये कि हम मिस्कीन को खाना नहीं खिलाते थे।
हवा और पानी के बाद इन्सान की बुनियादी ज़रूरत दो वक़्त का खाना है इसी दो वक़्त की रोटी के लिये इन्सान सारे जतन करता है। खाने की इसी अहमियत को देखते हुए तमाम धर्मों में खाना खिलाना पुण्य और सवाब का काम समझा जाता है। सभी धर्मों की इबादतगाहों में बिना किसी भेदभाव के भूखों के लिये खाने का इन्तिज़ाम किया जाता रहा है। खाने के इस एहतिमाम और इन्तिज़ाम को लंगर कहा जाता है। जिस जगह पर खाना खिलाया जाता है या खाना बाँटा जाता है उसे “लंगर-ख़ाना” कहते हैं।
तारीख़ी एतिबार से ये बात नहीं बताई जा सकती कि लंगर की शुरुआत किसने की। अलबत्ता मुसलमानों की हुकूमत के दौर में हुकूमत की तरफ़ से मुफ़्त खाने (लंगर) का इन्तिज़ाम हर बड़े शहर में किया जाता था। ये इन्तिज़ाम मस्जिदों के तहत और हर मज़हब के लिये था। मुसाफ़िरों के लिये जहाँ सराय थीं वहाँ लंगर ख़ाने भी थे। तमाम बुज़ुर्गों की ख़ानक़ाहों में भूखों को खाना खिलाने का ख़ास इन्तिज़ाम था। मोहताजों, फ़क़ीरों और भूखों को खाना खिलाना इस्लामी पहचान थी।
मुस्लिम दौरे-हुकूमत के बाद से हुकूमत की सरपरस्ती में लंगर ख़ानों का रिवाज ख़त्म हो गया। अलबत्ता हिन्दू आश्रमों, गुरुद्वारों, ख़ानक़ाहों में आज भी लंगरख़ाने क़ायम हैं। लेकिन उनकी उमूमी हैसियत में फ़र्क़ महसूस किया जाने लगा है। अब लंगर का एहतिमाम ख़ास दिनों या ख़ास त्योहारों के मौक़े पर होता है। ज़्यादातर मक़ामात पर ज़रूरतमन्दों के बजाय अक़ीदतमन्द ही फ़ायदा उठाते हैं। अक्सर जगहों पर पेट भर खाने के बजाय “तबर्रुक” बाँटा जाता है।
मुसलमानों को इस्लाम की तालीम है कि वो भूखों को खाना खिलाएँ, उनको इस बात पर बार-बार मुतवज्जेह किया गया है कि वो खाना खिला नहीं सकते तो कम से कम दूसरों को खाना खिलाने पर उकसाएँ। यानी एक ऐसी तहरीक चलाएँ कि लोग खाना खिलाने पर आमादा हों, ऐसा कुछ इन्तिज़ाम करें जहाँ खाने वाले और खिलाने वाले अपना-अपना किरदार अदा कर सकें। लेकिन ज़माने के उलट-फेर के साथ-साथ मुसलमान भूखों को भी भूले और ख़ुदा को भी भूल बैठे जिसके नतीजे में शायद ख़ुदा ने भी इन्हें भुला दिया है।
दिल तंग हुए, दस्तरख़्वान सिमट गया और तमाम अख़लाक़ी क़द्रें (Moral Values) को उठाकर ताक़ पर रखकर लोगों की भूख मिटाने वाले ख़ुद भूखों की क़तार में लग गए। लंगर के सिलसिले में पिछले सात महीनों में मुझे बड़े कडुवे तज्रिबात से गुज़रना पड़ा है। खाना बाँटते वक़्त जहाँ ऐसे लोगों से वास्ता पड़ा जो मुस्तहिक़ नहीं थे वहीँ छीना-झपटी का वो नज़ारा भी देखने में आया कि हमारे कारकुनों के कपड़े तक फट गए। ख़ैर हर नेक काम में परेशानियों का आना आम सी बात है।
हिन्दुस्तान के मौजूदा हालात में जबकि मुसलमानों की तस्वीर एक ऐसी क़ौम की बना दी गई है जो मुल्क पर बोझ है। जब इसको हर तरफ़ से धुतकारा जा रहा है। हर बदलता मौसम उनके लिये नए ज़ख़्म लाता है। जबकि पुराने ज़ख़्म मज़ीद हरे हो जाते हैं। उनको अपनी तस्वीर सुधारने के लिये ख़ुद को बदलना पड़ेगा ही। उन्हें इसके लिये बहुत से काम करने होंगे। उन्हें ये साबित करना होगा कि वो इन्सानियत के लिये ज़रूरी भी हैं और फ़ायदेमन्द भी।
इन कामों में एक काम लंगरख़ाने क़ायम करने का भी हो सकता है। इसके लिये बहुत ज़्यादा इनफ़्रा-स्ट्रक्चर की ज़रूरत भी नहीं है। हर शहर की किसी ऐसी मस्जिद या मदरसे को जहाँ से मुसाफ़िर गुज़रते हों लंगर ख़ाने के तौर पर ख़ास कर लिया जाए। मस्जिद, मदरसे में पानी का इन्तिज़ाम भी रहता है और बैठने की जगह भी, मदरसों में तो किचिन भी होता है और बावर्ची भी।
उस बस्ती के लोग लंगर फ़ण्ड क़ायम कर लें, जिससे जो बन पड़े उसमें दे, नक़द के अलावा अनाज वग़ैरा भी दिया जा सकता है। इस पर लंगर ख़ाने का बोर्ड हो, जनता को मालूम रहे कि यहाँ ज़रूरतमन्दों, मुस्तहिक़ों और भूखों को खाना मिलता है। खाने का मीनू ऐसा हो कि ग़ैर-मुस्लिम भी खा सकें। अगर बस्ती-बस्ती, शहर-शहर लंगर चलाए जाएँ तो कम से कम फ़ाक़े से किसी शख़्स की जान नहीं जाएगी।
भूखे इन्सान को ये यक़ीन हो कि उसे फ़ुलां जगह पर खाना मिल जाएगा। मानो लंगर क़ायम करने के लिये एक मस्जिद/मदरसा/या कुछ गज़ की कोई जगह, कुछ ज़िम्मेदार लोग, खाना बनाने और बाँटने वाले दो कारकुन, महीने-पन्द्रह दिन का राशन जमा करना होगा और लंगर शुरू हो जाएगा। नीयत में ख़ुलूस होगा और मामले साफ़-सुथरे होंगे तो अल्लाह की मदद ज़रूर आएगी। उसका फ़ज़ल बरसेगा। इन्शाअल्लाह कभी राशन कम नहीं पड़ेगा।
मेरी नज़र में इस राह की मुश्किलात हमारा मस्लकी इख़्तिलाफ़, हमारी ख़ुद ग़रज़ी, हमारी मुफ़्त-ख़ोरी की आदत और हमारा दिखावे का जज़्बा हैं। इन मुश्किलात से घबराने की ज़रूरत नहीं है। अगर काम करनेवालों का इरादा पक्का हो, और अल्लाह पर यक़ीन हो तो सारी मुश्किलें आसानियों में बदल जाती हैं।
कोरोना की वजह से लॉक-डाउन है। लोग खाने के लिये परेशान हैं। हम देख रहे हैं कि मुख़्तलिफ़ शहरों में मुख़्तलिफ़ लोगों ने ग़रीबों और राहगीरों के लिये खाने का इन्तिज़ाम किया है। यहाँ तक कि कुछ सियासी पार्टियों ने भी लंगर क़ायम किये हैं, सड़कों पर भी लोग खाना बाँट रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहुत-से ग़ैर-मुस्लिम भाइयों ने पोस्ट डाली हैं कि कई हज़ार किलो मीटर के लम्बे सफ़र में हमने देखा है कि मुसलमान बड़ी तादाद में खाना खिला रहे हैं।
ज़ाहिर है गोदी मीडिया को तो ये सब नज़र नहीं आएगा। लेकिन अल्लाह सब कुछ देख रहा है। इस वक़्त अच्छा मौक़ा है। ज़रूरत ईजाद की माँ है। (Necessity is the mother of invention) हमें इस मौक़े पर लंगर ख़ानों की अपनी रिवायतों को ज़िन्दा करना चाहिये। इससे हमारी तस्वीर दोनों जहान में सँवर जाएगी और तक़दीर बदल जाएगी। वो कहावत मशहूर है कि आदमी जिसका नमक खा लेता है उससे ग़द्दारी नहीं करता। किसी का दिल जीतने के लिये दस्तरख़्वान कामयाब वसीला है क्योंकि दिल का रास्ता पेट से होकर ही जाता है।
ग़ैरों के दिल को जीतिये अपना बनाइये,
लंगर चला के भूखों को खाना खिलाइये।
कलीमुल हफ़ीज़, नई दिल्ली
hilalmalik@yahoo.com
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