यूक्रेन-रूस संकट: भारत ने अपने नागरिकों के लिए हेल्पलाइन नंबर किया जारी

यूक्रेन-रूस अब जंग के मुहाने पर पहुंच गया है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है. पुतिन ने 24 फरवरी को यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई का ऐलान करते हुए कहा कि यूक्रेन-रूस के युद्ध को टाला नहीं जा सकता. पुतिन ने साथ ही कहा कि यूक्रेन की सेना ‘अपने हथियार डाल’ दे. यही नहीं पुतिन ने रूस और यूक्रेन के बीच दखल देने वालों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की भी बात कही है. वहीं, यूक्रेन ने देश में इमरजेंसी लागू कर दी है और रूस में रह रहे अपने सभी नागरिकों से वापस लौटने को कहा है.
कीव में भारतीय दूतावास ने यूक्रेन में रह रहे भारतीय नागरिकों और स्टूडेंट्स के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया है. दूतावास ने साथ ही कहा है कि यूक्रेन के एयरस्पेस को बंद करने के मद्देनजर विशेष फ्लाइटों को रद्द कर दिया गया है. भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है. दूतावास ने कहा है कि नागरिक अपने साथ अपना पासपोर्ट हमेशा रखें.
यूक्रेन में भारतीय नागरिकों के लिए जारी की गयी Advisory , राजधानी जाने से परहेज़ करें
यूक्रेन की राजधानी कीव में भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है. दूतावास ने कहा है कि यूक्रेन में हालात ठीक नहीं हैं, और जो कीव आ रहे हैं, वो अपने शहरों में वापस लौट जाएं.
अमेरिका अपने आईने से दिखाता है, वो बांग्लादेश युद्ध के समय भारत को भी विलेन बता चुका है.
Lt. Gen. Bhupendr singh (Retrd.)
चलिए, एक ऐसी बात करें जिससे सब वाकिफ हैं: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन एक दबंग तानाशाह हैं जो आज Ukrain पर चढ़ाई कर रहे हैं. वह अपने हठ के आगे बेबस हैं. उनसे पहले के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन सोवियत संघ के विघटन के अवशेषों से निकले थे और राजाओं की तरह सरकार चलाते थे (येल्तसिन इस बात के लिए बदनाम थे कि उन्होंने रूसी सेना को संसद में बमबारी करने और घुसने को कहा था).
रूस कभी एक लोकतांत्रिक देश नहीं रहा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनका प्रशासन तंत्र अनैतिक था- वह दूसरी व्यवस्थाओं से अलग था, और यह फर्क शायद सिर्फ रूसियों के लिए मायने रखता था (या उन्हें इस फर्क होने से कोई फर्क नहीं पड़ता था), लेकिन पश्चिम ने हमेशा रूस को एक अलग ही रंग में पेश किया- निर्दयी और निष्ठुर- रॉकी सीरिज के कैरेक्टर ईवान ड्रैगो जैसा. अमेरिकी राष्ट्रपति और हॉलीवुड के एक्टर रोनाल्ड रीगन तो सोवियत संघ को ‘एक दुष्ट साम्राज्य’ कहा करते थे.
रूसी हमेशा से विलेन रहे हैं

पश्चिम के दोहरे नजरिए के हिसाब से रूसी लोग हमेशा से विलेन रहे हैं और पुतिन उस कल्पना का साकार रूप हैं. यह स्पष्ट रूप से एक अति-सरलीकृत, सुविधाजनक और निर्मित धारणा है, जो जितना प्रकट करती है, उतना ही छिपाती भी है. ‘पश्चिम’ के हाथों पर खून के धब्बे हैं, लेकिन वह उसे बेहतरीन ढंग से ढंकना जानता है.
कॉरपोरेट के रंग में रंगने वाले पश्चिमी मीडिया की रुचि कभी आजादी, छानबीन और जांच पड़ताल में हुआ करती थी- भले थोड़ी ही- लेकिन वह नदारद हो चुकी है.
हां, ‘पश्चिम’ की किस्सागोई असरदार जरूर हुई है। वह लोकतंत्र की दुहाई दिए जा रहा है (हालांकि जब आप पश्चिम एशिया, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका या एशियाई महाद्वीप के उन देशों की हालत देखें, तो एकदम अलग परिदृश्य देखने को मिलता है. यह बात और है कि इस पर ज्यादातर लोगों ने आंखें मूंदी हुई हैं, या कम से कम उसे अनदेखा कर रहे हैं)।.
लेकिन भारत को उन यादों को टटोलना चाहिए जब शीत युद्ध के दिनों में वह सोवियत संघ का खास दोस्त हुआ करता था.
जब पश्चिम ने भारत को हमलावर बताया था
1971 में पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी था, जबकि भारत सोवियत कैंप में हुआ करता था. तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (जो जल्द ही बांग्लादेश बनने वाला था) में अमेरिकी कॉन्सुल जनरल आर्चर के ब्लड पाक सेना की करतूतों की रिपोर्ट भेजा करते थे. भारत में अमेरिकी राजदूत केनेथ बी कीटिंग ने निक्सन और किसिंजर की जोड़ी को व्यक्तिगत रूप से ‘नरसंहार के मामले’ की जानकारियां दी थीं (इन बहादुर राजनयिकों को उनकी अपनी सरकार ने सच बोलने की वजह से ‘पागल’, ‘देशद्रोही’ वगैरह कहा था).
खुद अमेरिकी विदेश विभाग ने पुष्टि की थी कि पाकिस्तान ने दो लाख हत्याओं (बाद की बांग्लादेश सरकार ने इस आंकड़े को 30 लाख बताया था), सामूहिक बलात्कार और लूट के युद्ध अपराध किए थे, फिर भी अमेरिका फिर भी आंखें मूंदे रहा, उसने खुलेआम नरसंहार के अपराधियों का साथ दिया, उन्हें हथियार दिए, उनसे नहीं कहा कि वे शांति की बहाली करें या नरसंहार रोकें. उसने नहीं कहा कि वे चुनावी नतीजों या इच्छा का सम्मान करें. न ही उन पर किसी किस्म के प्रतिबंध लगाए जिसका राग आजकल खूब अलापा जा रहा है.
चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने तब कहा था कि भारतीय को ‘सामूहिक अकाल’ झेलना चाहिए और उनके मसखरे चाकर कहलाने वाले हेनरी किसिंजर ने ‘मरते हुए बंगालियों’ के लिए ‘खून बहाने वालों’ का मजाक उड़ाया था.
इसके बाद अमेरिका ने अपने नौसैनिक जहाज को बंगाल की खाड़ी रवाना कर दिया था. उसका निशाना भारत था, पाकिस्तान नहीं. तमाम अत्याचार, तबाही और जबरदस्त लूट के बीच, ‘पश्चिम’ भारत को हमलावर बताता रहा, जब तक कि उस मनगढ़ंत कहानी को झूठ साबित करने वाले तथ्य सामने नहीं आ गए.
तालिबान और आईएसआईएस
अमेरिका बराबर झूठ बेचता है और दुनिया उसे खरीदती है. उसने उम्माह (मुस्लिम वर्ल्ड) पर बार-बार यह आरोप लगाया है कि वह धार्मिक रूप से उन्मादी और आतंक को पोषित करने वाला है. इस जोरदार झूठ में यह बात दब गई कि इन चरमपंथियों को पैदा किसने किया. इस जहर को बोने के बाद उसकी विषबेल में कौन खाद पानी डालता रहा. यह सब अमेरिका ने खुद किया. पर कौन नहीं जानता कि तालिबान ने 1980 के दशक में सीआईए-आईएसआई के गठबंधन से जन्म लिया और आईएसआईएस सद्दाम हुसैन की अपमानित इराकी सेना की ही उपज है जिसे खदेड़ दिया गया था.
दूसरी तरफ ईरान, जिसका 9/11 या अल कायदा, आईएसआईएस, बोको हराम, आदि की पैदाइश से कोई सीधा संबंध नहीं, वह ‘नंबर वन ग्लोबल टेरर स्पॉन्सर’ कहा जाता है.
