
एल. एस. हरदेनिया
भारत आजाद होने के कुछ समय बाद सरदार पटेल महात्मा गांधी से मिलने गए। पटेल ने बापू से कहा कि अब हम आजाद हो गए हैं इसलिए सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्वार किया जाना चाहिए। बापू ने कहा अवश्य किया जाना चाहिए पर सरकारी पैसे से नहीं।
बापू ने सुझाव दिया कि इसके लिए ट्रस्ट बनाया जाए और उसमें पैसा इकट्ठा किया जाए और उस पैसे से ही मंदिर का रिनोवेशन किया जाए।
तदानुसार ट्रस्ट गठित किया गया और स्वयं सरदार पटेल उसके अध्यक्ष बनाए गए। उनके जीवनकाल में रिनोवेशन का कार्य पूरा नहीं हो पाया। उनकी मृत्यु के बाद श्री के. एम. मुंशी ट्रस्ट के अध्यक्ष बने।
जब जीर्णोद्वार का कार्य पूर्ण हो गया तब मंदिर के उद्घाटन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को निमंत्रित किया गया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजेन्द्र बाबू से कहा कि वे उद्घाटन करने अवश्य जाएं पर व्यक्तिगत हैसियत से।
गांधी जी ने सरदार पटेल को यह सलाह इसलिए दी थी क्योंकि भारत एक बहुधर्मी देश है। यदि पूजाघरों पर सरकारी पैसा खर्च होने लगेगा तो बजट का एक बड़ा हिस्सा पूजाघरों पर ही खर्च हो जाएगा।

फिर वर्तमान में सरकारी पैसा सिर्फ हिन्दू मंदिरों पर खर्च हो रहा है। यह संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं यह कहना बहुत मुश्किल है परंतु कल्पना करिए कि यदि मस्जिदों, चर्चों और गुरूद्वारों से संबंधित कार्यों के लिए भी सरकारी पैसे की मांग होने लगी तो क्या स्थिति होगी।
वैसे भी चाहे मंदिर हो, चर्च हो, मस्जिद हो या गुरूद्वारा – उनके पास पैसे की कमी नहीं होती। मनुष्य जितनी उदारता से अपने-अपने धर्मों के पूजाघरों के लिए दान देता है उतना किसी और कार्य के लिए नहीं देता।
यदि देश का हर नागरिक इतनी ही श्रद्धा और ईमानदारी से टैक्स अदा करे तो सरकार का खजाना लबालब भर जाएगा। इस समय सब कुछ इसके विपरीत हो रहा है।