फ़लस्तीन की दास्ताँ Episode 2 …….

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Ali Aadil Khan Editor’s Desk

Episode 2


नकबा का इतिहास ,,,नकबा Day मनाने की शुरुआत 1998 में फ़लस्तीनी क्षेत्र के तत्कालीन राष्ट्रपति यासिर अराफ़ात ने की थी. 14 मई 1948 के दिन इसराइल के गठन के बाद लाखों फलस्तीनियों के बेघर और क़त्ल होजाने की घटना का दुख मनाते हैं मनाया जाता है और इस दिन को इबरत के तौर पर याद रखा जाता है . 1947 में फ़िलिस्तीन विभाजन योजना (संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 181 (ii)) ने 10 % यहूदियों को फिलिस्तीन की 55% भूमि दे दी गयी थी । United Nations General Assembly (UNGA) का यह फैसला फ़िलिस्तीनियों और पड़ोसी अरब देशों की अवाम को मंज़ूर नहीं था इसी बिना पर इस का विरोध हुआ और आज तक जारी है । आपको बता दें यह वही संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी United Nations General Assembly है जो दुनिया को मानवाधिकारों के पाठ का ढोंग करती है |

आज हम आपको एक और तारीखी सच बताने जा रहे हैं दोस्तों ,,, United Nations General Assembly द्वारा ब्रिटिश अनिवार्य अधिकार यानी (British Compulsory Rights) के तहत फलस्तीनी अवाम को जबरन उनका देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और Zionist मिलिशिया यानी यहूदी और ईसाई आतंकी group ने 1916 के बालफोर घोषणा (Balfore Declaration) के अनुसार उन पर कहर ढाने को अंतर्राष्ट्रीय संधि का नाम दिया गया था ।जो फलस्तीनी अरबों के चैन में चिंगारी थी और मानवाधिकारों का हनन भी ,अब , WE SUPPORT ISRAEL # चलाने वाले ज़रा इंसानियत के ऐनक से देखें अगर खुदा न खुअस्ता यह काम हम भारतियों के साथ होने लगे एक क़ौम आये और कहे चलो भारतीयों छोडो यह देश हमारा है और यह अधिकार हमें UNO से मिला है , तो क्या आप इसको क़ुबूल करलेंगे ,,,,,कम से कम हम तो इसको हरगिज़ नहीं मान सकते …

आपको आज एक और तारीखी सच बता दें जिसको सुनकर आप दंग रह जाएंगे , आपको मालूम है दुनिया से धित्कारे यहूदियों को फलस्तीन की सर ज़मीन पर पहली बार पनाह किसने दी थी ?? यहूदियों को फलस्तीन की सर ज़मीन पर पनाह देने वाला कोई और नहीं खुद फातेह बैतूल मक़्दस सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी रहमतुल्लाहि अलैह थे .सुल्तान का यह अहसान यहूदियों के लिए ना क़ाबिल इ फरामोश होना चाहिए था मगर यहूदी अपनी फितरत में हमेशा से धोखे बाज़ और ना फरमान ए रसूल रहे हैं उनसे सुल्तान को कोई उम्मीद भी नहीं थी ,,,,,सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपने मिज़ाज और इस्लाम की शान के मुताबिक़ यह क़दम उठाया था . लेकिन दुनिया सुलतान के इस अहसान और तारिख ए इस्लाम के सुनहरे दौर दौर को फरामोश रखने में ही अपनी भलाई समझती है , इसलिए इस वाक़िये को कभी तारीख़ का हिस्सा नहीं बनाया जाता , लेकिन हम आज आपको वो तमाम हक़ाइक़ बता रहे हैं जिसको यहूद , नसारा और मुश्रिकीन Historians ने ने साज़िश के तहत भुलाया .टाइम्स ऑफ़ पीडिया तारिख के इन हसीं और सुनहरे पन्नो को अब लगातार पलटेगा और दुनिया को सच दिखाने और हक़ को लगातार सामने लाने की जसारत करेगा .

यह बल्फ़ोर घोषणा और Sykes – Pikot एग्रीमेंट क्या है यह भी आज हम आपको बताते हैं ….

1915-16 की बल्फ़ोर घोषणा में हुसैन बिन अली अरब बादशाह और British सम्राट HENERY मैकमोहन के बीच हुसैन -मैकमोहन नाम से एक पत्राचार यानि Correspondence हुई थी जो बहुत मशहूर है (जिसमें MacMohan की तरफ से वादा किया किया गया था वो ऑटोमन Empire यानी सल्तनत ए उस्मानिया से अरबों को आज़ादी दिलाएगा ,सभी अरब रियासतें आज़ाद होंगी , जबकि इस धोखे वाले समझौते से अरब अवाम ना खुश थी ,सिर्फ लालची और मुनाफ़िक़ अरब हुक्मरान को इसमें उनका सियासी नफा और अय्याशी नज़र आ रही थी .

इसके फ़ौरन बाद यानी और 1916 में ब्रिटेन और फ्रांस ने गुप्त रूप से एक संधी की थी जिसका नाम था साइक्स-पिकोट संधी है इस Agreement या ख़ुफ़िया मुआहिदे को Italy और Rusia की सहमति से बनाया गया था ताकि उस्मानिया खिलाफत के विभाजन कोई देश अड़चन न बने , इसके तहत 1923 में सल्तनत ए उसमानिया के खात्मे के बाद अलग होने वाली अरब और गैर अरब रियासतों का बन्दर बाँट कर लिया गया जो तुर्की की उस्मानिया खिलाफत के ज़ेरे निज़ाम आती थीं , यानी हुआ यूँ की जो अरब देश के हुक्मरान इसको अपनी आज़ादी समझ रहे थे दरअसल वो अब France और Britain के ग़ुलाम बन गए थे , और कुछ Italy और रूस के मातहती में आगये थे .

मुख़्तसर यह है की 1917 में ब्रिटेन द्वारा यहूदी आज़ादी का आंदोलन शुरू किया गया , और यह बाल्फ़ोर घोषणा.के समर्थन में एक सार्वजनिक प्रतिज्ञा यानी पब्लिक Pledge के बाद वुजूद में आया था । इस घोषणा का मक़सद एक “राज्य” यानी फलस्तीन के विरुद्ध एक यहूदी “राष्ट्रीय निवास स्थान (नेशनल होम)” यानी Israel की स्थापना करने के लिए माहौल तैयार करना था , अब यहाँ यह सवाल पैदा होता है की अँगरेज़ हुकूमत अगर वाक़ई यहूदियों की हमदर्द थी तो उनको योरोप में क्यों नहीं बसाया गया , इसके पीछे २ बड़ी वुजूहात रहीं ।

एक तो ईसाई जो ईसा मसीह को अल्लाह का रसूल मानते हैं हैं वो यहूदियों को अपना दुश्मन मानते हैं क्योंकि हज़रत ईसा को सूली पर इन्ही यहूदियों ने चढाने की योजना बनाई थी , बाद में ईसा के रब ने उनको आसमानों पर उठा लिया था .

दूसरे यहूदियों की किताब तौरात में में फलस्तीन और Jerusalam के मुतबार्रिक और यहूदियों के लिए इस मक़ाम को Lucky माना गया है ,और इनके अक़ीदे के मुताबिक़ इनका आखरी नबी मसीही दज्जाल का नुज़ूल इसी Jerusalam में होगा , हालांकि वो नबी नहीं बल्कि बहुत भयानक फितना और काज़िब यानी झूठा होगा होगा . Jerusalam दरअसल इस्लाम , यहूद और नसारा यानी ईसाई तीनो ही मज़ाहिब के लिए बहुत मोतबररिक है . ये मक़ाम तीनो के लिए क्यों मोतबररिक और Importatant है इसके लिए आपको दास्ताँ ए फलस्तीन के Episode 3 को देखना होगा , अगर आप कुछ अपनी राये रखना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में लिखकर भेज सकते हैं . इस क़िस्म की तारीखी Vedios देखने के लिए आप Times Of Pedia को subscribe करें ताकि हर vedio आप तक वक़्त से पहुँच सके .शुक्रिया

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