मंदिरों पर PIL डालने की तैयारी/ मस्जिदों पर बुलडोज़र एक्शन पर पाबन्दी!!
मस्जिदों के ख़िलाफ़ बार-बार की जाने वाली PILs पर Delhi High Court ने सख्त नाराज़गी का इज़हार करते हुए याचिकाकर्ता प्रीत सिरोही और Save India Foundation को फटकार लगाईं है. कोर्ट ने सवालिया अंदाज़ में कहा कि PIL दायर करने वाला व्यक्ति World रिकॉर्ड बनाना चाहता है ??
कोर्ट ने PIL के दुरुपयोग पर नाराज़गी जताई और याचिकाकर्त्ता सिरोही के लिए कहा कि यह व्यक्ति सिर्फ मुस्लिम धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहा है जबकि दूसरे Encroachments की अनदेखी कर रहा है.
देश में साफ़ पानी का मसला है लोग ज़हरीला पानी पीकर मर रहे हैं , लोगों के पास रहने को घर नहीं है इसकी कोई चिंता नहीं है इन लोगों को …. ��
गिरी नगर मस्जिद मामले की सुनवाई कर रही 2 जजों की बेंच में चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया ने कहा कि PIL का इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए , न कि किसी एक संप्रदाय या समुदाय के ख़िलाफ़ भेदभावपूर्ण कार्रवाई करवाने में। High Court के इस फ़ैसले को उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा रहा है.
फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद को सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण बताने वाली PIL में वक़्फ़ अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि यह वक़्फ़ संपत्ति है। लेकिन मस्जिद फैज़ इलाही मामले में अदालत के अंतिम फैसला आने से पहले ही MCD ने सत्तावर्ग के दबाव में बुलडोज़र कार्रवाई कर दी .
याद रहे कोर्ट ने ऐसी फ़र्ज़ी याचिकाओं पर भी रोक लगाने का संकेत दिया जिसमें जनता की भलाई न होकर किसी वर्ग या समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ नफरत दिखाई देती हो | साथ ही कोर्ट ने अपने दुसरे निर्देशों में बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी अवैध निर्माणों पर समान कार्रवाई के आदेश दिए हैं ।
इसी बीच Civil Societies और वकीलों की कई संस्थाओं ने यह मश्वरा किया कि वो भी देश में सभी धार्मिक स्थलों और अवैध निर्माणों के विरुद्ध ड्राइव चलाएंगे. इसमें RTI और PIL के ज़रिये किसी भी तरह के अवैध निर्माण के विरुद्ध अदालतों का रुख किये जाने की बात की गई है. एक सामाजिक संस्था का कहना है कि जितने भी मंदिर सरकारी भवनों या पुलिस Stations में बनाये गए हैं उन सबके विरुद्ध PIL डाली जाएंगी और उम्मीद है उनको सुना जायेगा .
क़ाबिले ग़ौर बात यह है कि अगर देशभर में अदालतें सिर्फ मस्जिदों के ख़िलाफ़ याचिकाओं को सुनने बैठेंगी तो दुसरे सिविल और criminal मैटर्स की सुनवाई के लिए वक़्त ही नहीं मिल पायेगा. देश के करोड़ों मामले जो पहले से लंबित हैं यानी pending हैं ऐसे में उनकी सुनवाई के लिए मज़लूमों और पीड़ितों के साथ इंसाफ़ कैसे और कब होगा ?
मौजूदा सरकार के दौर में कई ऐसे संकेत दिखाई देते हैं जिनसे यह बहस तेज़ हुई है कि क्या अदालतों पर परोक्ष यानी बिल्वास्ता तौर पर सत्तावर्ग का दबाव बढ़ा है।
जनता की ऐसी धारणा और राये कुछ हस्सास मामलों में देरी के चलते बनी है जैसे ……चुनावी बॉन्ड, कई बहु चर्चित रेप पीड़ितों को इंसाफ़ का न मिलना या देरी से मिलना , नागरिक स्वतंत्रता के मामले , सामाजिक सुरक्षा , लिंचिंग मामले, अधिकतर इकतरफ़ा बुलडोज़र कार्रवाई, UAPA जैसे मामलों में लंबे समय तक सुनवाई टलना वग़ैरा मामलात शामिल हैं ।
कई मामलों में देखा गया पहले कार्रवाई हो जाती है, बाद में अदालतें सुनवाई करती हैं। इसी तरह की कार्यशैली से “पहले सज़ा, बाद में सुनवाई” जैसी धारणा बनती है, जो न्यायपालिका के उसूलों से मेल नहीं खाती या कहें की ज़ालिमों के होंसले बुलंद करती है.
आपको याद होगा कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और Retired जजों ने खुलकर कहा है कि “आज न्यायपालिका पहले से ज़्यादा दबाव महसूस कर रही है।” कॉलेजियम और जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच खींचतान भी संस्थागत तनाव को दर्शाती है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को हल्के में नहीं लिया सकता ।
जबकि ✔️ कई मामलों में अदालतों ने सरकार के ख़िलाफ़ भी सख़्त आदेश दिए हैं। ✔️ सुप्रीम कोर्ट और कुछ हाईकोर्ट ने बुलडोज़र जस्टिस, अभिव्यक्ति की आज़ादी और नाजाइज़ गिरफ़्तारियों पर स्पष्ट टिप्पणियाँ भी की हैं। इसके बावजूद सत्तारूढ़ पार्टियों से जुड़े लोगों पर कोई Significant असर नहीं दिखाई दे रहा है और सामाजिक ना इंसाफ़ी का सिलसिला जारी है.
मस्जिदों के सर्वे के सम्बन्ध में हालिया दिल्ली High court के फैसले से जनता में इत्मीनान महसूस किया रहा है. साथ ही कई संस्थाओं और NGOs की अदालतों से मांग और अपेक्षा है कि एक ख़ास संप्रदाय, संस्था या पार्टी के उद्देश्यों के लिए छोड़े गए Trollers या Youtubers पर पाबंदी लगाई जाए.
जो लगातार एक ख़ास धर्म के लोगों को अपराध के लिए उकसाने का काम कर रहे हैं, और यह कृत्य IPC तथा CRPC की कई धाराओं के अंतर्गत बड़े अपराध की श्रेणी में आता है .
ऐसे में इन Trollers और Youtubers को प्रतिनब्धित किया जाए कि बिना अदालती आदेश के किसी धार्मिक परिसर में उनका प्रवेश अपराध माना जायेगा. कुछ संस्थाओं से जुड़े लोग इस तरह से धार्मिक स्थलों, आम नागरिकों और कारोबारी संस्थानों के कर्मचारियों से ऐसे सवाल करते हैं मानो यह किसी investigation Agency के अधिकारी हों.
इस प्रकार के कृत्यों से भारत के लोकतंत्र, संविधान, गौरव, गरिमा, और क़ानून का मज़ाक़ बनता जा रहा है. कभी कभी लगता है यहाँ संविधान , विधि और क़ानून नहीं बल्कि किसी पार्टी या संस्था विशेष का क़ानून चलता है.
विडंबना यह है कि सरकारी एजेंसियां सत्तारूढ़ व्यक्तियों के आदेश को अपनी मजबूरी समझकर अधिकतर मामलों में actions ले रही हैं.
जिससे आम लोगों में सरकार और अदालतों के प्रति अविश्वास बढ़ा चला जा रहा है जो देश के साथ विश्वासघात की श्रेणी में आता है, यानी देशद्रोह में आता है. पहले कहा जाता था चल तुझको अदालत में देखूंगा, अब कहा जाता है तुझको सड़क पर देखूंगा,
🔹Prophet मुहम्मद Saw ने कहा था जिसका मफ़हूम है “तुमसे पहले लोग इसलिए तबाह हुए कि वे इंसाफ़ करने में पक्षपात करते थे।” 📖 (मुस्नद अहमद – मफ़हूम)
🔹 Law की किताबों में William E. Glad stone का मशहूर saying पढ़ाया जाता है कि “न्याय में देरी, न्याय से इनकार के समान है। 🔹 विलियम कहता था “न्याय की ताक़त, ताक़त के न्याय से हमेशा बड़ी होनी चाहिए।”
🔹 डॉ. भीमराव आंबेडकर का कहना था “संविधान केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का औज़ार है।”
🔹 मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा “कहीं भी होने नाइंसाफी, हर जगह के न्याय के लिए ख़तरा है।”
🔹 अरस्तू ने कहा था “न्याय का अर्थ है — समान लोगों के साथ समान व्यवहार।”
🔹 जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर ने कहा था “न्याय केवल अदालतों में नहीं, समाज की आत्मा में बसता है।”
🔹 नेल्सन मंडेला का कहना था “सच्चा न्याय वही है जो पीड़ित को उसकी गरिमा लौटाए।”
अंत में कह सकते हैं नाइंसाफी और अन्याय की धारणा और चलन को जंगलराज कहा जाता है. और अन्याय मुल्कों को दीमक की तरह चाट जाता है जिसके बाद देखने को सिर्फ तबाही बचती है .
“नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी कश्ती-ए-वीराँ से,
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी।”
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