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Mind Blowing Article 1st time

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Apradhmukr bharat ne

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

लद्दाख, उत्तराखंड और I Love Mohammed(PBUH) पर Mind Blowing Article ज़रूर पढ़ें

ये लूट ये ख़ूंरेज़ी ये रोज़ के हंगामे – गुलशन के निगेहंबान ने आदत ही बना ली है

हम तो नक़ली जिहाद की बात कर रहे थे उत्तराखंड में नक़ल जिहाद की बात छिड़ गई .वैसे
जिहाद की बात जितनी भारत में होती है इतनी दुनिया के किसी मुस्लिम देश में भी नहीं होती होगी . मुस्लमान जिहाद लफ्ज़ से डरते हैं और हमारे देश के नेता हर 4 – 6 महीने में जिहाद की एक नई परिभाषा तैयार कर लेते हैं .

इस्लामिक Terminology में देखें तो बुराई और ज़ुल्म के खिलाफ अच्छाई और अमन के लिए लड़ी जाने वाली जंग को जिहाद कहा जाता है . लेकिन हमारे देश में इसका ज़बानी इस्तेमाल सत्तापक्ष और उसके सहयोगियों की तरफ से देश की बहुसंख्यक के दिल में मुसलमानों का ख़ौफ़ और उनसे नफ़रत पैदा करने के लिए किया हो रहा है .

ताज़ा मामला उत्तराखंड का है जहाँ मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने नक़ल जिहाद का शगूफा छोड़ा है. हास्यास्पद बात यह है कल तक नक़ल की बात को खारिज करने वाली धामी सरकार आज खुद मुख्यमंत्री धामी नक़ल जिहाद की बात कर रहे हैं.

इससे पहले उत्तराखंड के CM पुष्कर धामी लव जिहाद , लैंड जिहाद जैसे शोशे छोड़ते रहे हैं. मज़े की बात यह है थूक जिहाद , करोना जिहाद, चूड़ी जिहाद, UPSC जिहाद जिसको मुसलमानो से जोड़ा गया था इस बार जिहाद को नक़ल जिहाद से जोड़कर हिन्दू आंदोलनकारियों को ही जिहादी बना दीया गया है. और UK सरकार ने PAPER LEAK मुद्दे से युवाओं का ध्यान भटकाने के लिए Paper out का नाम दिया है.

उत्तराखंड में पेपर लीक मामले में बेरोज़गार संघ , छात्र संघ तथा युवा संघ के GENZ का सामूहिक धरना किसी बड़े आंदोलन का इशारा करता है. पेपर लीक मामलों के नेता और समाज सेवी बॉबी पवार पहले ही कह चुके हैं अगर पेपर लीक में CBI की निष्पक्ष जांच न कराई गई तो इस बार उत्तराखंड की जनता और GENZ वर्ग सरकार को उखाड़ फेकेगा.

जिहाद और हिन्दू मुस्लमान के नाम पर साम्प्रदायिकता का toolkit फ़िलहाल उत्तराखंड की सियासत के कंधे पर लाद दिया गया है. जहाँ भी सरकार फंसती है हिन्दू मुसलमान वाले सांप्रदायिक टूल से चल पड़ती है.

और इस टूल का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल वोट धुर्वीकरण के लिए किया जाता है. नफरत का यह टूल कभी कभी slip कर जाता है तो काम उल्टा हो जाता है. अब कानपुर में I Love मुहम्मद (SAW) के पोस्टर पर योगी सर्कार ने इसको इस्तेमाल किया मगर वो स्लिप हो गया.

सत्तावर्ग की मनमानी , द्वेष और दमनकारी नीति के खिलाफ पूरे भारत में I Love Mohammed (SAW) के जुलूस निकलने लगे social मीडिया “I Love Mohammed (PBUH) से पुता पड़ा है और यह अभियान आज देश का सबसे बड़ा अभियान बन गया.

हालाँकि उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन के अधिकारीयों ने बताया कि I Love Mohammed कहने या लिखने पर मुस्लिम युवा को गिरफ्तार नहीं किया गया बल्कि जो टेंट लगाए गए थे वो permited जगह पर नहीं थे और इन्हीं टेंट्स पर “I Love Mohammed (PBUH)” के भी पोस्टर्स लगाए गए थे. इसके लिए गिरफ़्तारी हुई थी नाकि “I Love Mohammed (PBUH)” के लिखने या बोलने पर.

अगर वाक़ई यही बात है तो 4 सितम्बर से और बरैली Police लाठी चार्ज तक यानी 22 दिन तक हालात को भभकने ही क्यों दिया गया. क्या जान बूझकर ऐसे हालात पैदा किये गए ? पुलिस प्रशासन ने तत्काल प्रेस Conference करके National Media और Social Media पर इस मैसेज को क्यों नहीं फैलाया कि गिरफ़्तारी कि असल वजह “I love MOhammed (PBUH)” नहीं बल्कि Non Permited इलाक़े में लगाए गेट टेंट थे. हालांकि दुसरे धार्मिक सम्मलेन और कार्यक्रम अक्सर सार्वजानिक स्थानों पर ही होते हैं. बल्कि कई जगह रोड के बीचोबीच होते हैं.  इसका मतलब यह नहीं कि मुस्लमान भी ऐसा करने लगें. मुस्लमान जिस मुहम्मद सल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम पर जुलूस कर रहे हैं वो आप (SAW) वाले किरदार , अख़लाक़, आमाल क्यों पेश नहीं करते? मुसलमानों के मिज़ाज में आजज़ी, नरमी, क़ौल में सच्चाई, हलाल कमाई, मख्लूक़ से मोहब्बत , नादान, ग़रीब, मोहताजों, बेवाओं और परेशां हालों की ग़मखुआरी और खिदमत गुज़ारी क्यों नहीं करते है? तहारत और पाकीज़गी का ख्याल क्यों नहीं है? शायद इसी की नहूसत है जो आज पूरी दुनिया में मुसलमान नाकाम , नामुराद ,ज़लील और खुआर है.अगर I Love Mohammed # चलाने वाले नबी की सीरत पर Practice करने लगें तो दुनिया में अमन शान्ति और विकास का बोलबाला हो जाए , मगर अफ़सोस……..मुस्लमान अमल से खाली है इसी लिए नफ़रत की बहाली है….

 दूसरी तरफ़ कुछ अहंकारी और घमंड में चूर मुख्यमंत्री अपने राजपाट के भरोसे तानाशाहों और बेलगाम डिक्टेटर्स वाले वयवहार से बाज़ नहीं आते तो पड़ोस के हालात से सबक़ तो ले सकते हैं,जो खुद इन अहंकारी पाखंडियों और देश के काम आ सकता है.

देवों की भूमि हिमालय की जड़ में GENZ आंदोलन ने पहले नेपाल में ऐतिहासिक क्रांति पैदा करके सिर्फ ३ दिन में OP Sharma की सरकार को घुटनो पर लाकर खड़ा कर दिया था .

अब लद्दाख और उत्तराखंड में GENZ के विद्रोह देखने को मिले. लद्दाख में 4 नौजवानो की जान चली गयी , 70 से ज़्यादा लोग गंभीर रूप से घायल होगये पुलिस के जवान भी ज़ख़्मी बताये जा रहे हैं .

और अब पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को गिरफ्तार करके जोधपुर जेल लाया गया है. इसके बाद लद्दाख के मुद्दों का ऊँट किस करवट बैठेगा यह भविष्य के गर्भ में है. मगर हालात अच्छे नहीं हैं ..

देवभूमि और हिमालय की जड़ से निकलने वाले विद्रोहों को सरकार अब हलके में न ले क्योंकि इसमें देवी शक्तियों की नाराज़गी वाली बू आने लगी है ख़ास तौर से हम उत्तराखंड की बात कर रहे हैं .

सत्ता वर्ग इन विद्रोहों को नक़ल जिहाद का नाम देकर सांप्रदायिक रंग देने की बजाये राजधर्म निभाएं और Damage Control करने के सियासी ढोंग से बाहर निकलकर प्रदेश के युवाओं के Sentiments और भावनाओं को भी समझे.

अब पूरे देश में युवाओं को रोज़गार के अवसर , मंहगाई पर control , Social Justice , Law and Order ,अम्न- शान्ति, दलित और अल्पसंख्यकों के साथ इन्साफ और आर्थिक बहाली की Serious कोशिश करें. क्योंकि अब किसी भी जाती या धर्म का युवावर्ग राजनेताओं के हर खेल और पाखंड को समझ चूका है.

ऐसा लगता है सोनम वांगचुक का शान्ति पूर्ण धरना सरकार को पसंद नहीं था शायद उसे हिंसात्मक प्रदर्शन करने वालों की तलाश थी. 5 साल से लद्दाख राज्य की शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से मांगें उठाने वाले वांगचुक जिन्होंने सेना के लिए Solar से चलने वाले Airconditioned tent तैयार किये.

वातावरण नियंत्रण,और water Preservation जैसे Projects पर देश की सेवा की. लद्दाख से दिल्ली तक 125 से ज़्यादा साथियों के साथ पैदल मार्च किया, ऐसे महान साइंटिस्ट और पर्यावरणविद जो देश के लिए धरोहर के रूप में जाने जाते हैं उन पर देशद्रोह का मुक़द्दमा लगाना कितना उचित होगा यह आने वाला समय बताएगा … .

वांगचुक की ज़िंदगी से प्रेरित होकर Three Ediots फिल्म बनाई गई. जिसको Internation Popularity मिली. देश के अधिकतर Journalist की Reports सोनम को असली देशभक्त होने का सुबूत दे रहे हैं.

अब असली या नक़ली का चलन शुरू हो गया है ,क्योंकि जबसे फ़र्ज़ी देशभक्तों के अच्छे दिन आये हैं तो अवाम के लिए देशभक्ति की परख मुश्किल हो गई है. लेकिन देश में नफरत और साम्प्रदायिकता की आग लगाने वाले अगर खुद को देश्भक्ति से जोड़ते हैं तो यह दोहरा अपराध है.

सोनम वांगचुक के अनशन तोड़कर Ambulance से घर चले जाने को सरकारी तंत्र शक की निगाह से देख रहा है.चीन का एजेंट बताया जा रहा है. कहा जा रहा है की सोनम को चाहिए था की वो GENZ को नियंत्रित करते .

भला बताइये जहाँ युवाओं को काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पडी हो 4 प्रदर्शनकारियों की मौत,70 से ज़्यादा गंभीर रूप से घायल हो गए हों .

ऐसे में युवाओं के भयानक आक्रोश और विद्रोह को सोनम जैसा व्यक्तित्व कैसे रोक सकता था? लेकिन फिर भी वांगचुक के साथियों की तरफ से युवाओं को समझाने की कोशिश की गई …. मगर …चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये लेकिन सावन जो अगन लगाए उसे कौन बुझाये ??

हो सकता है अब लद्दाख राज्य के लोगों की मांगे पूरी हो जाएँ , क्योंकि बहरी सरकारों को भगत सिंह की आवाज़ सुनाई देती है, जिसका नमूना लद्दाख में दिखाई दिया.और ऊतराखंड में भी दहकते लावे को समय रहते धामी सरकार ने परख लिया और युवा शक्ति के सामने सरकार को झुकना पड़ा.

पुष्कर धामी ने युवा संगठन की तमाम मांगो को धरना स्थल पर जाकर मान लीं. समय रहते धामी प्रशासन ने स्थति को परखते हुए यह फैसला लेकर किसी भी बड़ी घटना से प्रदेश को बचा लिया.

दूसरी तरफ लद्दाख में ऐसा माना जा रहा है सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी आज़ाद वांगचुक से ज़्यादा खतरनाक हो सकती है जैसाकि वो खुद भी कह चुके हैं.

किसानों की आवाज़ उठाने वालों को खालिस्तानी , आतंकवादी, मुसलमानों की बात करने वालों को जिहादी और लद्दाख के चरवाहों की बात करने वाले सोनम वांगचुक को देशद्रोही बताने वाले भूल रहे हैं इन जुमलों से देश के दुश्मनो के होंसले और बुलंद होते हैं .

लेकिन चरवाहों की धरती लद्दाख और ज़मीन की जन्नत कश्मीर के कुदरती ख़ज़ानों और संसाधनों पर किसको बैठाया जा रहा है या बैठाया जायेगा इसपर भी आपकी नज़र रेहनी चाहिए I

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार को जल्दी से जल्दी लद्दाखवासियों से बात करनी चाहिए और उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए। याद रहे फारूख अब्दुल्लाह उस वक़्त के J&K मुख्यमंत्री का तज़र्बा रखते हैं जब लद्दाख भी उसका हिस्सा हुआ करता था .

उन्होंने इस बात का भी इशारा किया की लद्दाख के बारे में चीन की निगाह ठीक नहीं है. और दुनिया जानती है चीन ने पहले ही हमारे इलाक़े पर क़ब्ज़ा किया हुआ है , और इस हकीकत को हम कब तक छुपायेंगे?

देश के बुद्धिजीवियों का भी यह मानना है के सरकार अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए “कोड़ा जमाल शाही पीछे देखे मार खाई” का खेल अब न खेले क्योंकि यह दौर सुपर AI का दौर है. पूरे देश में युवा सड़कों पर है.

अब तो लद्दाख के वरिष्ठ भाजपा नेता और लद्दाख के पूर्व सांसद ने बुधवार को सुरक्षा बलों की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत पर केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की तीखी आलोचना की है. पूर्व सांसद जामयांग नामग्याल ने उपराज्यपाल कविन्द्र गुप्ता को पत्र लिखकर मौतों पर दुख व्यक्त किया और जवाबदेही की मांग की. उन्होंने कहा कि जनता का विश्वास कम हुआ है.

नामग्याल ने लिखा, “इस संकट को धैर्य के साथ संभाला जा सकता था. हालांकि हिंसा और आगजनी की निंदा की जानी चाहिए, लेकिन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी ने जनता के विश्वास को हिला दिया है.”

गृह मंत्रालय ने कहा कि वांगचुक ने अरब स्प्रिंग शैली और नेपाल में GENZ विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करके लोगों को भड़काया या गुमराह किया।

नेपाल में genz विद्रोह के बारे में पूरी दुनिया ने जान लिया लेकिन अरब स्प्रिंग शैली के बारे में भी हम आपको बता देते हैं. दरअसल अरब स्प्रिंग लोकतंत्र समर्थक , राजशाही और तानाशाही विरोधी प्रदर्शनों और मुसल्लाह या हथियारों से लेस विद्रोहों की एक Series थी जो 2010 के दशक की शुरुआत में अरब दुनिया के कई हिस्सों में फैल गई।

इसकी शुरुआत भ्रष्टाचार और आर्थिक मंदी के विरोध में ट्यूनीशिया से हुई थी। इसी के चलते लीबिया , मिस्र , यमन , सीरिया और बहरीन के बादशाहों का भी तख्ता पलट हुआ जिसमें हुस्न इ मुबारक और कर्नल कद्दाफी के नाम प्रसिद्द हैं .हालांकि कद्दाफी के खिलाफ सहयोनि पूँजीवाद की साज़िश थी. यह अलग Topic है जिस पर अलग से लिखा जाएगा I

किसी भी तानाशाह के लिए सबसे बड़ा खतरा अवामी बग़ावत के बाद सत्ता छीन जाने का होता है. इसके लिए उनके पास दमन और आपातकाल के सिवा कोई चारा नहीं बचता. इसी बीच लाखों नागरिकों का खून खराबा तानाशाह के लिए कोई बड़ी बात नहीं |

लद्दाख का GENZ अपने दफ्तरों और कारोबारों से छुट्टी लेकर वांगचुक की हड़ताल में शरीक नहीं हुआ था बल्कि यह वही बेरोज़गार युवा था जिसके लिए रोज़गार के अवसर मांगे जा रहे थे. ज़ाहिर है इन युवाओं को सोनम वांगचुक के आंदोलन में लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल होने और बेरोज़गारी जैसे मसलों का हल दिखाई दे रहा होगा.

गलतियां देश का सत्ता वर्ग करता रहे और उसकी सज़ा जनता को मिले ये कोनसा नियम है ? और कोनसा राजधर्म है? कुल मिलाकर लद्दाख में बीजेपी दफ्तर में आग लगाना और बीजेपी झंडे को उखाड़ फेकना कोई मामूली घटना नहीं है. बक़ौल प्रधानमंत्री के कव्वा कान ले रहा हो तो अपने कान टटोल लेने चाहिए …………..

जब देश की युवा शक्ति जो आजकल GENZ के नाम से मशहूर हुए है , उसने अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए सड़कों पर आने को अपनी मजबूरी माना है और अब युवा शक्ति जद्दोजहद करती दिखाई दे रही है.

अब देश का युवा सवाल पूछ रहा है कि जिहाद और हिन्दू मुसलमान, शमशान ,क़ब्रस्तान ,पाकिस्तान और सिन्दूर के जुमलों से काम चलाने वाली और 2047 तक के खुआब शर्मिंदा दिखाने वाली सरकार 85 करोड़ लोगों के हाथ से कटोरा कब तक छुड़ाएगी? मंहगाई पर काबू कब तक कर पायेगी? और पढ़े लिखे युवा को सरकारी रोज़गार के अवसर कब तक दिला पायेगी ? और बेरोज़गार कम पढ़े लिखे troll सैनिकों को कब तक लघु उद्योग या startup से जोड़ा जाएगा??

या फिर देश को ऐसी हालत पर छोड़ा जाएगा जहाँ हर तरफ वीरानी और ख़ौफ़ पसरा हो, इंसान इंसान को देखकर भाग रहा हो, खेत खल्यान उजड़े हुए हों, इमारतें मलबे का ढेर बन चुकी हों और हर तरफ मजबूर नागरिकों की सिसकियाँ हों .

क्योंकि जिस मुल्क में इन्साफ नहीं होता, कमज़ोरों और पीड़ितों पर रहम नहीं होता पसी सौहार्द और परस्पर प्यार नहीं होता, सांझा विरासत के वारिस नहीं होते वहां ऐसा ही होता हैI फैसला सत्तावर्ग को ही लेना होगा, मगर हमारी दुआ है हमारे देश में खुशहाली, सामर्थ और बहाली हो. हम दुनिया को ऐसा नमूना बनकर उभरें कि आने वाली सदियाँ भारत को अपना Ideal और गुरु माने I

बशीर बद्र कहते हैं की …
मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

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