क्या जिस क़ौम के लीडर क़ुरबानियाँ देते हैं वो क़ौम तरक़्क़ी की बुलन्दी हासिल कर लेती है?

एक शख़्स और घर की तरह क़ौमों के उतार-चढ़ाव में क़ुरबानी का अहम् रोल है। क़ौमों की तरक़्क़ी और ख़ुशहाली में क़ौम के रहनुमाओं की क़ुरबानियाँ काम कर रही होती हैं। जिस क़ौम के लीडर क़ुरबानियाँ देते हैं वो क़ौम तरक़्क़ी की बुलन्दी हासिल कर लेती है। इतिहास क़ौम के रहनुमाओं से जिस चीज़ की क़ुरबानी चाहता है वह शोहरत और पद की ख़्वाहिश है। यानी वह चाहता है कि क़ौम के लीडर पद और ओहदे के लालच में क़ौम का सौदा न करें, ज़ाती फ़ायदों की ख़ातिर इज्तिमाई फ़ायदे क़ुरबान न किये जाएँ। वे कुरदोग़लू का किरदार अदा न करें, ईमान बेचने का कारोबार न करें।
आप हर क़ौम का इतिहास पढ़ लीजिये, जब-जब उस क़ौम के फ़ायदों की ख़ातिर ख़ुद को सूली और फाँसी तक पहुँचा दिया, उनको भी इज़्ज़त मिली और उनके बाद उनकी क़ौम को भी तरक़्क़ी हासिल हुई। भारत में हमारी पड़ौसी क़ौम जो इस वक़्त तरक़्क़ी हासिल कर रही है उसके पीछे उनके बुज़ुर्गों की बड़ी क़ुरबानियाँ हैं। संघ के सर-संघचालकों ने शादियाँ नहीं कीं, उन्होंने अपने निजी भविष्य की क़ुरबानी देकर क़ौम के भविष्य को उज्जवल बनाया, कौन नहीं चाहता कि उसका घर हो, उसके बीवी बच्चे हों, उसका वंश बाक़ी रहे, लेकिन उनके लीडर्स ने त्याग और बलिदान का रास्ता अपनाकर क़ौम की तरक़्क़ी का रास्ता बनाया।
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हम इस पर बहस करते रहे कि ग़ैर-शादी शुदा ज़िन्दगी फ़ितरत और दीन के ख़िलाफ़ है। अपनी महफ़िलों में उनकी जिन्सी ज़िन्दगी पर कीचड़ उछालते रहे, हमारी आँखें उनकी क़ुरबानी को न देख सकीं, आलिम उन्हें जहन्नमी कहते रहे और उन्होंने आलिमों की दुनिया ही जहन्नम बना दी। योगी और मोदी को बुरा कहनेवाले ज़रा संघ की 96 साल की मेहनत का भी अन्दाज़ा करें। 96 साल के लम्बे सफ़र में संघ में लीडरशिप को लेकर कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, वे संघठित रहे, उनमें किसी बात को लेकर कोई गरोह-बन्दी नहीं हुई और हमारी दीनी तंज़ीमें तक बार-बार बँटती रहीं। हमारे रहनुमा ‘अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और गरोहों में तक़सीम न हो जाओ’ की तिलावत करते रहे और टुकड़े टुकड़े होकर गरोह बनते रहे। ‘आपस में रहमदिल’ का झण्डा उठाने वाले एक-दूसरे के क़त्ल के दर पे हो गए। जिसका नतीजा हमारे सामने है।
मेरे अज़ीज़ो ! भारत के मुसलमानों की मौजूदा सूरते-हाल में अगर बदलाव चाहते हो तो क़ुरबानी का हौसला पैदा करो। पदों और ओहदों की ख़्वाहिश से ख़ुद को पाक रखो। इस दौड़ में ख़ुद को शामिल करके इज्तिमाइयत को बर्बाद मत करो। मैं देख रहा हूँ कि हममें से हर शख़्स अपनी इज्तिमाइयत का सरबराह बनना चाहता है। ख़िदमत के नाम पर पद की तमन्ना रखता है। उसके लिये भागदौड़ करता है। सिफ़ारिशें करवाता है। चापलूसी करता है। ना-अहल होते हुए भी ज़िम्मेदारियों का ताज पहनना चाहता है।
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हमारी ये रविश दीन और दुनिया दोनों मामलों में है। माफ़ कीजियेगा दीन के ठेकेदारों में भी यही सब कुछ हो रहा है और दुनिया की समाजी और सियासी तंज़ीमों में भी यही खेल जारी है। जब तक ये रवैया नहीं बदलेगा, क़ौम की तक़दीर नहीं बदलेगी। जब तक हम अपने जज़्बात, अपनी ख़ाहिशात, अपनी आरज़ूओं और तमन्नाओं का ख़ून नहीं करेंगे किसी इन्क़िलाब की उम्मीद पैदा नहीं होगी। इसलिये कि कोई भी इन्क़िलाब ख़ून बहाए बग़ैर नहीं आता वो ख़ून चाहे रगों में दौड़नेवाला हो, या आरज़ू और तमन्ना की शक्ल में।
ईदुल-अज़हा का मुक़द्दस और मुबारक त्यौहार और सैयदना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी हमें यही सबक़ देती है कि हम ज़ाती फ़ायदों पर इज्तिमाई फ़ायदों को प्राथमिकता दें। इसलिये कि हर आदमी का मुस्तक़बिल उसकी क़ौम के भविष्य से वाबस्ता है। ये हरगिज़ मुमकिन नहीं कि क़ौम ज़लील और ग़ुलाम हो और उस क़ौम का आदमी बा-इज़्ज़त और आज़ाद हो। आइये इस ईद पर हम अहद करें कि हम अपने घर और क़ौम की ख़ुशहाली के लिये हर तरह की क़ुरबानी देंगे।
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