क्या गांधी के लोग समझ पायेंगे ?

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Daya Singh Social Worker & Thinker

 

मैं कोई गांधीवादी नही हूँ परंतु गांधी को समझने का प्रयास तब किया जब गांधी के नाम पर एक टोपी पहना आदमी का अवतार गांधी वादियों ने दिल्ली में india against corruption के नाम पर दूसरे गांधी की बात कर दी ज़िसमें न सहुर था न शिक्षा थी, न विचार था उसे खड़ा कर दिया उनको यह भी पता न चला कि इसके पीछे की ताकत संघ (RSS ) हैं जो मन मोहन सिंघ की सरकार को न निगल पा रही थी न उगल पा रही थी .

क्योंकि एक सिख वह भी गैर राजनीतिक 145 के आंकडे 2004 में बना हो वही 2009 में अद्वानी जैसे व्यक्तित्व को पीछे छोड़ 206 का आंकडा पार कर जाये उसको हटाने का प्रयास ही था , इसीलिये मृणाल पांडे हिन्दोस्तान की सम्पादिका ने टिप्पनी की थी कि संघ को एक इसे व्यक्ति की तलाश थी जो स्वच्छन्दता से संघ के सांसकृतिक अजेंडा को लागू करे और उसके राज में कोई यह न कह सके कि वह वंदे मात्रम नही गायेगा यह 2014 का ही वाक्य हैं जैसा मुझे समरण हैं l

गांधी तो इसलिये गांधी हो गए क्योंकि विदेशी अदालत में पगड़ी पहन कर एक मुकदमें की पैरवी करने के लिए पेश हुए जब उनको पगड़ी के बिना पेश होने का आग्रह किया ज़िसको गांधी ने ठुकरा दिया , गांधी कोई गरीबी से नही उठे थे परंतु किसानो के हालात को देख और महसूस करते हुए अपने वस्त्र में केवल एक धोती को पहनावा बना दिया.

1919 की जलियांवाला बाग की त्रासदी जो रोलट एक्ट के खिलाफ आवाहन था उसके बाद बाबा खड़क सिंघ जो सिखों के बेताज बादशाह के तौर पर जाने जाते थे उनके बुलावे पर सिख लीग की बैठक में मोती लाल नेहरू मोहम्मद अली जोहर और शौकत अली के साथ आये जहां से सिख, मुस्लिम और हिन्दुओं ने मिलकर अंग्रेज हकुमत से निजात पाने का संकल्प लिया l गांधी के कारण ही विभाजन के समय सिख और मुस्लिम को संजोया गया वही उनकी मौत कारण बनी क्योंकि संघ इसे बर्दास्त करने के लिए त्ययार नही था l

2014 से तो गांधी यदि 1948 में शारीरिक तौर पर मार दिये गए तो दौर चला उनके विचारों को भी स्वाह कर दिया जाये तो पहला कदम अहिंसा दिवस को झाडू दिवस स्थापित कर दिया गया और अब तो साफ कर दिया कि गांधी को तो उनके नाम पर 1982 में बनी फिल्म से ही उनको ख्याति मिली नही तो वे क्या थे कौन जानता था l जिस नफरत के खिलाफ गांधी खड़े हुए जिस सत्यता को अपनी लाठी बनाया उसी गांधी को इस हालात में पहूँचा दिया गया , यही हैं विडम्बना ?

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