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क्या बिहार का उप मुख्यमंत्री मुसलमान ही होगा ?

क्या बिहार का उप मुख्यमंत्री मुसलमान ही होगा ?

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Ali Aadil Khan Editor’s Desk

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: जातिगत-धार्मिक समीकरण — एक विश्लेषण
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में AIMIM को 10 से 15 सीटें मिल सकती हैं

बिहार के विधानसभा चुनाव महज नीति-विकास की लड़ाई पर नहीं होते, बल्कि ये अक्सर जातिगत और धार्मिक समीकरणों की राजनीति द्वारा आकार लेते हैं या अकार दिए जाते हैं। और यह बिहार की ग़ुरबत,बेरोज़गारी और वहां से भारी तादाद में निवासियों के पलायन की बड़ी वजह है.लेकिन इससे राजनीतिज्ञों को क्या फ़र्क़ पड़ता है

2015, 2020 और अब 2025 के चुनावों में यह देखने को मिल रहा है कि सियासी पार्टियाँ सिर्फ विकास की बातें नहीं करतीं बल्कि वे जातिगत समीकरण पर वोट बैंक Strategies, और धर्म आधारित राजनीति को भी बड़ी बारीकी से जोड़ती हैं। इस लेख में हम यह देखेंगे कि बीते दस बरसों में क्या ये समीकरण बदल गए? और 2025 में कौन से नए पैटर्न बनते दिख रहे हैं। 

आइये सबसे पहले caste equations की background को समझते हैं

2023 में बिहार की जाति जनगणना के आंकड़े सामने आये , जिनमें दिखाया गया कि लगभग 36% आबादी Extremely Backward Classes यानी (EBC) की है, जबकि 27.1% other backward Caste यानी OBC 19.7%, सक 1.7% , ST 15.5% ऊंची जातियाँ और मुस्लिम आबादी 17.7 % है।

इस Caste Census ने राजनितिक पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण सियासी संकेत दिया. इसके अनुसार EBC और OBC जातियों की कुल प्रतिशत 63 बनती है .इसके बाद हरेक पार्टी इन जातियों का वोट हासिल करने की जुगत में दिखाई दी. ये 2 वर्ग जिस तरफ भी जाते हैं तो उसको सत्ता में आने से कोई दूसरा सियासी समीकरण नहीं रोक सकता.

लेकिन यह किसी एक पार्टी के हक़ में चला जाए ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि ३७ % जनता भी तो बिहार की है लिहाज़ा इसके हितों को भी सामने रखकर ही पार्टी मेनिफेस्टो और सरकारी योजनाएं बनाई जाती हैं .

यह बात सब जानते हैं कि RJD और समाजवादी पार्टी का कोर वोट “MY कॉम्बिनेशन” यानी (Muslim और यादव पर आधारित है, याद रहे बिहार में Yadav (14.46%) जबकि मुस्लिम 17.7 % है. दोनों मिलकर लगभग 32 % हो जाता है जो RJD को सत्ता के सिहांसन तक पहुंचा सकता है .

मगर इस बार ओवैसी की AIMIM और प्रशांत किशोर की जनस्वराज में मुस्लिम वोट का विभाजन होने की संभावनाएं ज़्यादा हैं . जिसका सीधा फायदा NDA ब्लॉक को होने जा रहा है. यदि RJD ने मुस्लिम बहुल क्षेत्र में अपने candidates बढाए होते तो नतीजे अलग हो सकते थे .

लेकिन यह देखना है कि क्या बिहार का मुसलमान इस बार बीजेपी आजायेगी के डर से बाहर निकलकर AIMIM पर अपने धार्मिक सम्मान और सामाजिक सुरक्षा का दांव खेलता है या झिझक कर फिर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों पर विश्वास करता है .

और वैसे भी अब हिन्दू राष्ट्र की औपचारिकता पूरी करने में uniform civil code का आना ही तो बचा है बाक़ी सब तो उसी हिसाब से चल रहा है. मदरसों मस्जिदों मक़बरों और क़ब्रस्तानों पर जमकर बुलडोज़र चल रहा है …. Objection मस्जिद मदरसे की तामीर पर है, नमाज़ और अज़ान पर है … क्या मंदिरों मठों और गुरुकुलों के कागज़ात जमा करने के लिए कोई आखरी तारिख का ऐलान सुना आपने …. 

POWER SHARE का खेल भी आपको अच्छे से समझना चाहिए क्योंकि यह ऐसी चाबी है जिससे सभी ताले खुलते हैं मगर याद रहे रब की मर्ज़ी के साथ 

आपको याद होगा लालू यादव ने 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी का रथ बिहार आने से रोका…. हालाँकि मस्जिद के विध्वंस को लालू नहीं रोक पाए. सिर्फ आडवाणी के रथ को रोकने का इनाम बिहार के मुसलमानों ने यह दिया कि RJD को 1990 से लेकर 2005 तक लगातार 15 बरस सिंहासन पर बैठाया.

अगर रथ बिहार में आजाता तो मुसलमानों पर क़यामत नहीं टूट जाती मगर यही सियासी अवसर होते हैं जब किसी क़ौम के वोटों का बयाना दिया जाता है . चुनाव में उसकी भरी क़ीमत वसूली जाती है .

टिकट बंटवारे को लेकर होना यह चाहिए कि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी , लेकिन यहाँ RJD ने टिकट बंटवारे में सीधे सीधे यादवों की हिस्सेदारी उनके अनुपात से 4 गुना रखी है जबकि मुस्लिम प्रत्याशियों का अनुपात आधे से भी कम है.

और यही ऐतराज़ हमारा ओवैसी की पार्टी AIMIM पर भी है, वो ज़्यादातर मुस्लिम कैंडिडेट्स खड़े कर रहे हैं, हिन्दू जातियों से क्यों नहीं ? इस बार RJD द्वारा टिकट बंटवारे से मुसलमानों में नाराज़गी पाया जाना स्वाभाविक है….. और वैसे भी मुसलमान को पावर share से सभी पार्टियां दूर ही रखना चाहती हैं जबकि इसका वोट share बीजेपी के सिवा सबको चाहिए !

लेकिन यह भी सच है कि बिहार के मुसलमान वोटर की पहली पसंद RJD और कांग्रेस होती है. और नितीश बाबू की JDU को भी मुसलमान वोटर मायूस नहीं करता! बाद में यही नितीश बाबू सांप्रदायिक पार्टी के साथ जाकर विश्वासघात करते हैं. लेकिन बिहार में RJD और देश में कांग्रेस ने मुसलमान को किस Field में सशक्त किया कोई बता सकता है ?

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सच्चर रिपोर्ट ने मुसलमानो के हालात दलितों से बदतर बताकर साफ़ कर दिया कि देश में मुसलमान ठगा गया जो कांग्रेस की सियासी छत्रछाया में पल रहा था . हालांकि कांग्रेस के दौर में यह सब हुआ जो खुद कांग्रेस के हित में नहीं था लेकिन कांग्रेस ने यह सब सच्चाई से देश के सामने रखा यह भी सच्चाई है . हालाँकि राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली आजकी कांग्रेस मुख्तलिफ नज़र आती है …

“बिहार… वो राज्य जो कभी ज्ञान का केंद्र था — आज सियासी गणित का मैदान बन चुका है।
जहाँ जातियाँ वोट में बदल जाती हैं, और जनता के सवाल नारों में । 2025 का चुनाव सिर्फ़ एक मुकाबला नहीं, बल्कि 30 साल के समाजिक समीकरणों की अग्नि परीक्षा है।”

एक तरफ हिंदी मुसलमानों को पावर शेयरिंग से रफ़्ता रफ़्ता दूर किया गया और मुसलमानों की आर्थिक , शैक्षिक, सामाजिक और राजनितिक पिछड़ेपन को बनाये रखने में रही सही कसर मुस्लिम leadership ने निकाल दी. मुस्लिम नेता क़ौम की नुमाइंदगी भूलकर स्वार्थ में विलीन हो गए .

यहाँ हमको एक बात और समझनी है कि मुल्क की पावर शेयर में किस तरह से रेवड़ी बांटी जाती हैं . कांग्रेस सत्ताकाल में भी मुसलमानों को उनकी पापुलेशन के हिसाब से हिस्सेदारी नहीं मिली.

हालाँकि क्षेत्रीय पार्टियां बनने से पहले मुस्लिम वोट 85 से 93% कांग्रेस को ही मिलता रहा. सत्ता और शासन वर्ग से क़ौम के हमदर्द मुस्लिम नेताओं को दूर रखा गया. हम जानते हैं किसी भी जाती या क़ौम के वही नेता पार्टियों की पहली पसंद होते हैं जो उनका वोट तो हासिल करें मगर उनके मसलों को हल करने में सक्षम न हों .

हमको यह भी समझना है ‘कि ” बिहार में यादव 14.26% जो OBC का सबसे बड़ा वर्ग है और मुसलमान 17.7% है यानी पाँच में से एक व्यक्ति मुस्लिम है और यही RJD का मुख्य आधार है। लेकिन सीट बंटवारे में यहाँ भी वही जातिवाद आड़े आगया.

2025 विधानसभाव चुनाव में RJD के 143 Candidates में से 51 यादव और 19 मुस्लिम उतारे हैं , जबकि जनसँख्या अनुपात के हिसाब से 25 से 26 मुस्लिम कैंडिडेट होना चाहिए थे और यादव जिनकी अनुपात के हिसाब से 20 से 21 उम्मीदवारों को टिकट होना चाहिए था .

पार्टियों से मुस्लिम उम्मीदवारों की लगातार घटती संख्या power politics की तरफ इशारा है। मुस्लिम प्रत्याशियों की यह घटत सिर्फ संख्या की नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास का भी मुद्दा है और उनके अस्तित्व का भी.

 बीजेपी भूले से भी किसी मुस्लिम को अपना प्रत्याशी नहीं बनाती. और आरोप यह है कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देते. अगर मुसलमानों को बीजेपी उनके जनसँख्या के हिसाब से टिकट देदे तो मुस्लिम जमातों के कई ज़िम्मेदारों का मानना है कि हम बीजेपी को सपोर्ट का देशभर में ऐलान करदेंगे. और यह तजर्बा देश में दोनों को एक बार ज़रूर करके देखना चाहिए. इससे देश की धर्मनिरपेक्ष Politics का भी अंदाज़ा हो जाएगा.

इस बार बिहार में Congress (कांग्रेस) 61 सीटों पर विधानसभा चुनाव चुनाव लड़ रही है इनमें 10 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे गए हैं। कांग्रेस ने यहाँ मुस्लिम जनसँख्या के अनुपात के हिसाब से टिकेट दिए हैं . वहीँ 21 स्वर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिए गए हैं , इनमें 6 ब्राह्मण candidates का सत्यापन किया गया है जो उनकी जनसंख्या के अनुपात से दुगना हैं.

दोस्तों आपको मालूम है 2020 में किस पार्टी से कितने मुस्लिम mla बने और उनका क्या % था , आइये आपको इसके बारे में बताते हैं

जैसा की हमने आपको बताया कि बिहार में मुसलमान लगभग 18% हैं और 2020 की बिहार विधान सभा में 24 मुस्लिम विधायक चुनकर आये थे यानी सदन के सदस्यों की कुल संख्या 243 का लगभग 9.8% हिस्सा थे ।बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में जनता दल (यूनाइटेड) JDU ने कुल 115 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।इनमें 11 मुस्लिम उम्मीदवार थे —उनमें से 6 उम्मीदवार विजयी हुए थे, यानी 55 % कामयाब हुए.

वहीँ कांग्रेस 71 सीटों पर चुनाव लड़ी 19 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे उनमें 4 को सफलता मिली थी, यानि लगभग 21% सफल हुए .ओवैसी की AIMIM ने 2020 में कुल 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और इनमें से 5 उम्मीदवार जीते थे यानी 25% को सफलता मिली थी .RJD ने कुल 144 उम्मीदवार उतारे थे.

जिनमें 20 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़े और 9 मुस्लिम उम्मीदवार जीतने में सफल रहे, यानी 45 % सफल हुए , जबकि lOK JAN SHAKTI पार्टी ने 137 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था म्यूजिक …….

आइये अब ज़रा आपको यह भी बता दें की 2020 में किस पार्टी को कितना % मुस्लिम वोट मिला ?

2020 में किस पार्टी को कितना % मुस्लिम वोट मिला ?
2020 में कांग्रेस का बिहार में वोट-शेयर था 9.48%
जबकि कांग्रेस को मुस्लिम वोट 20 से 25% के बीच मिला था।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को कुल वोट-शेयर था 23.1%जबकि
RJD को मुस्लिम वोट लगभग 50% से 55% के बीच मिला था।
जनता दल (यूनाइटेड) – JD(U) को कुल 15.4% वोट मिला था
जबकि मुस्लिम वोट JDU को लगभग10–12% के बीच मिला था।
AIMIM का पूरे बिहार में वोट-शेयर लगभग 1.24% था।
जबकि सीमांचल क्षेत्र से लगभग 30% मुस्लिम वोट मिला था .

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हम आज यह भी जानेंगे कि बिहार में मुस्लिम बहुल सीटें कितनी हैं और उनकी क्या वोट परसेंटेज है

बिहार में मुस्लिम बहुल सीटें कितनी हैं
बिहार का सीमांचल क्षेत्र जिसमें (किशनगंज , अररिया
पूर्णिया , कटिहार , सुपौल वग़ैरा इलाक़ों में 24 से 26 सीटें
ऐसी हैं जहाँ मुस्लमान वोटर 40 से 70 % तक है. जबकि
33 सीटें जहाँ 25–40% मुस्लमान वोटर है और 47 सीटें
ऐसी हैं जहाँ 15–25% मुस्लिम वोटर है और अगर इन
सब सीटों पर मुसलमान Consolidate होकर Vote करे
तो 80 % यानी 62 से 63 सीटें मुस्लिम वोट से जीती जा
सकती हैं अब पार्टी जो भी हो .

दोस्तों आपको इसमें इंट्रेस्ट होगा कि बिहार में OBC , दलित और मुस्लिम वोट कॉम्बिनेशन वाली कितनी सीटें हैं ?

तो आइये हम आपको यह भी बताते हैं

बिहार में OBC , दलित और मुस्लिम वोट कॉम्बिनेशन
वाली कितनी सीटें हैं ?
बिहार में 22 से 24 ऐसी सीटें हैं जहाँ मुस्लमान 42–70% है
जबकि दलित और पिछड़ा वर्ग 25 से 30% है . 4 से 6 सीटें
ऐसी हैं जहाँ 22–35% मुस्लिम और 35 से 40% दलित और
पिछड़ा वर्ग है. 2 से 3 सीटें ऐसी हैं जहाँ 12 से 18% मुस्लमान
और 45–50% दलित और पिछड़ा वर्ग मिला जुला है .
इस बार इन तमाम सीटों पर ही AIMIM ने अपने प्रत्याशियों
को उतारा है .अगर यहाँ ओवैसी का जय मीम जय भीम
फार्मूला कामयाब हुआ तो AIMIM को 10 से 15 सीटें
मिल सकती हैं.

क्या आप यह जानना चाहेंगे कि स्वर्ण MLAs की संख्या सदन में क्या है ,
तो आपको बता दें ऊंची जातियों (जैसे राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार)
सदस्यों की संख्या बिहार विधान सभा में 2020 में बढ़ी और राजपूत
विधायकों की संख्या 28 तक पहुंची थी । ब्राह्मण विधायक
15 से 17 असेंबली में पहुंचे जबकि भूमिहार जो बिहार में सिर्फ 5.5% है
और वोट शेयरिंग भी 5 से 6 % ही है उनकी संख्या 21 थी

किस जाती के कितने मुख्यमंत्री बने यह जानना भी
आपके लिए दिलचस्प होगा……….
तो….यादव जो बिहार में 14.26% हैं RJD का प्रमुख वोट बैंक है
लालू राबड़ी और तेजस्वी राज्य के मुख्यमंत्री बने ,कुर्मी
2.87% इसी जाती के नितीश बाबू 5 बार मुख्यमंत्री बने
और NDA में प्रमुख भूमिका निभाई . ब्राह्मण 3.66% कांग्रेस के
1946 से 1988 तक 8 मुख्यमंत्री रहे. मगर 17 .70 %
मुसलमान सिर्फ 21 माह के लिए अब्दुल ग़फ़ूर को मुख्यमंत्री देख सके

, सवाल है ऐसा क्यों ? जवाब है , ********क्योंकि मुसलमान को Power शेयर से सभी पार्टियों ने दूर रखा, रही सही कसर मुस्लिम नेताओं ने निकाल दी वो अपनी पार्टी के वफादार रहे मगर अपनी क़ौम से ग़द्दारी की और किसी एक ने भी मुसलमानों के हित के लिए न तो रिजाइन किया और न ही कोई बड़ा प्रदर्शन…!!! हालांकि उनको क़ौम के मुद्दों को हल करने और उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए ही रखा गया था.

अब आप सोच रह होंगे कि बीजेपी का कोई ज़िक्र क्यों हुआ
वो इसलिए कि मुस्लिम वोटर की भागेदारी और उनके मुद्दों
पर बात करना थी जिसमें बीजेपी का कोई ज़्यादा सरोकार
नहीं है लेकिन फिर भी हम आपको बता दें बीजेपी को
किन जातियों का समर्थन रहता है …..
इसमें HIGHER CAST जैसे कुशवाहा / कोइरी 4.2% हैं
, राजपूत (ठाकुर), 5.2%, भूमिहार 5.8% भुमिज / कायस्थ
व् अन्य सवर्ण 1.5% , कुल मिलाकर इनकी आबादी
लगभग 16 .7 % है . ये सब पारंपरिक ऊँची जातियां अधिकाँश
BJP की वोटर हैं .आपको बता दें 2020 में पूरे बिहार से
19.46 % वोट लेकर बीजेपी ने 74 सीटें हासिल की थीं.

बिहार में CAST BASED विधायकों की संख्या जानने में भी आपकी दिलचस्पी होगी , तो हम आपको बता दें
कि इसमें सबसे बड़ी संख्या सवर्णों की है हालाँकि इनकी
जनसँख्या मुसलमानों से भी कम है
(सवर्ण): ~ 26.3% MLAs
(OBC): ~ 18.9% MLAs
Yadav: ~ 22.2% MLAs
(SC/ST): ~ 16% MLAs
Vaishya: ~ 9.9% MLAs
Muslim: ~ 7.8% MLAs

सदन में अल्पसंख्यकों की साझेदारी आधे से भी कम है इससे मुस्लिम समुदाय के बीच नाराज़गी ज़रूर है मगर बीजेपी आजाएगी का डर बताकर तथाकथित सेक्युलर पार्टियां मुस्लिम वोट उड़ा ले जाती हैं मगर उनके विकास पर कोई काम नहीं होता .

दूसरी तरफ बीजेपी हिन्दुओं को मुसलमानों का ख़तरा दिखाकर वोट लूट लेती है और हिन्दुओं के विकास पर काम नहीं करती. इस बार हिन्दू और मुसलमान दोनों तय कर लें कि पार्टी को नहीं प्रत्याशी की क़ाबलियत के हिसाब से वोट करेंगे तो बिहार के विकास की उम्मीद बढ़ जाएगी. और यही फार्मूला लोकसभा आम चुनाव में अपनाया जाए तो देश की हालत सुधर जायेगी !!!

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