
Ali Aadil Khan Editor’s Desk
हमास कब , क्यों और किसने तैयार किया ?
क्या इसके बाद अरब देशों पर इज़राइल का कण्ट्रोल हो जाएगा ?
क्या होगा इस जंग का नतीजा , तहक़ीक़ाती नज़रिया
सबसे पहले यह बता दें कि इस्लाम दुश्मन मीडिया , इज़राइली अवाम को मासूम और हम्मास को दहशतगर्द के रूप में पेश कर रही है। और यह नज़रयाती इख़्तेलाफ़ की वजह से होता है। एक क़ौम या संस्था किसी के लिए दहशतगर्द होसकती है तो वही दूसरों के लिए मुजाहिदीन या देशभक्त हो सकते हैं। और यह कोई पहली बार नहीं है ऐसा होता आरहा है।
आज मुसलमानों के ख़िलाफ़ यही NARRATIVE कमोबेश पूरी दुनिया में बनाया गया है। मुसलमानों पर ज़ुल्म हो तो दुनिया खामोश , ज़ुल्म पर RETALIATION हो तो मुस्लमान दहशतगर्द। वाह क्या इन्साफ है दुनिया का !! और अजीब बात यह है कि मुस्लमान के मुक़ाबले में लगभग पूरी दुनिया एक है। और सिर्फ इसलिए कि मुस्लमान तौहीद परस्ती की बात करते है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आखरी रसूल मानते हैं।
यहाँ मिसाल के तौर पर एक बात समझते हैं , भारत में अँगरेज़ साम्राज्य्वादी हुकूमत के खिलाफ जो स्वतंत्रता संग्राम हुआ जिसमें कहीं कहीं संग्रामियों को अँगरेज़ क़ौम पर उनके सिपाहियों पर हमले किये गए अँगरेज़ मरे भी गए तो इसको क्या दहशतगर्दी का नाम दिया जाना चाहिए। हालाँकि वो अँगरेज़ हुकूमत कि नज़र में आतंकी ही थे मुजरिम थे।यहाँ मिसाल के तौर पर एक बात समझते हैं , भारत में अँगरेज़ साम्राज्य्वादी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम हुआ जिसमें आज़ादी के मतवालों ने हमले किये अँगरेज़ मरे तो इसको दहशतगर्दी का नाम दिया जाना चाहिए ?
जबकि अँगरेज़ हुकूमत की नज़र में आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले आतंकी ही थे और हुकूमत के मुजरिम थे। इसी तरह फलस्तीनी अपनी ज़मीन औरज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं तो इनको क्योंकर आतंकी कहा जाता है ? लेकिन दुनिया की बड़ी आबादी इनको संग्रामी या मुजाहिदीन कहती है।
दूसरी बात अगर आज भारतीय फ़ौज चीन के क़ब्ज़े से अपनी ज़मीन खाली कराने के लिए वहां मौजूद चीनी सिपाहियों पर हमला करे उनको क़ैदी बना ले तो क्या इन भारतीय फ़ौजियों और जांबाज़ों को आतंकी कहा जायेगा ?? अगर फलस्तीनियों के निहत्थे मासूमों के क़त्ले आम पर , औरतों और बच्चों पर घोर अत्याचार करने वाले यहूदी सैनिकों को किसी क़ौम , संस्था या देश ने आतंकी कहा होता और आज वो हम्मस को आतंकी कहते तो एक हद तक चल सकता था कि उन्होंने उसको भी ज़ुल्म समझा और इसको भी ज़ुल्म समझ रहे हैं तो जाइज़ है।
मगर जब कोई क़ौम , संस्था या देश आज यहूदियों पर बदले की कार्रवाई के दौरान होने वाली मौतों पर इकतरफा डफली बजा रहे हैं वो एकदम इंसानियत और नैतिकता के ख़िलाफ़ है।
हम्मास कब क़ायम हुआ और इसके बानी कौन थे
हमास का इस्टैब्लिशमेंट शेख अहमद यासीन नामी एक मुफक्किर ने 1985 में शुरू किया था।।।। हैरत की बात यह है की वो जिस्मानी तौर से माज़ूर थे व्हील चेयर पर चलते थे। उनको फलस्तीनी नौजवानों और वहां मज़लूम नस्ल इ इंसानी से ख़ासा प्यार था।।। दरअसल फलस्तीन की नौजवान नस्ल को एक साज़िश के तहत ऐश परस्त और फैशन का आदि बनाया गया , साथ ही फलस्तीनी नस्ल को तालीम से भी दूर रखा गया था। और इन हालात पर शेख यासीन की पैनी नज़र थी । फलस्तीनी नौजवानों में वो हर बुराई आम तौर से मौजूद थी जो किसी मग़ज़ूब क़ौम में पाई जाती हैं।
शेख अहमद यासीन ने फलस्तीनी नौजवानों को बड़ी मोहब्बत , शफ़क़त और हिकमत के साथ खुद से क़रीब करके उनकी तरबियत करना शुरू की और बहुत कम वक़्त में शेख यासीन की पुरखुलूस मेहनत रंग लाई और फलस्तीनी नौजवानों का बड़ा तब्क़ा अपनी ज़िंदगी के शबो रोज़ को मामूल पर ले आया ।। वक़्त पर सोने उठने और अहकाम इ इलाही का पाबन्द होने लगा।। इन नौजवानों का एक तब्क़ा आला तालीम के हुसूल के लिए बैरून का सफर करने लगी ,,, फलस्तीन के अहले सर्वात और अमीर लोगों को इस बात के लिए तैयार किया गया की वो नौजवानो की तालीम Sponsore करें और Fellowship भी दें और लोगों ने शेख यासीन की बात को माना और ऐसा ही किया ///
इसराइल की ग़ासिबाना और जारिहाना पालिसी के चलते फलस्तीन का 55 % हिस्सा israel ने क़ब्ज़ा कर लिया और इसमें फलस्तीनी अय्याश हुक्मरान का बड़ा रोल रहा।। तारीख इस बात की शाहिद है की क़ौमें , हुक्मरान की अय्याशी और नफ़्स परस्ती (स्वार्थ ) की वजह से अक्सर मज़लूम बनी है।। इसकी अलग तारिख है, फिर किसी मौके पर ब्यान करूँगा ।।
शेख यासीन की इस मुख्लिसाना मेहनत के नतीजे में कुछ ज़ीहोश और हक़परस्त नौजवान तैयार हो गए , जो इस्लाम के खिलाफ आलमी मंज़र नामे को मज़हबी आईने में zionist forces या सहयोनि ताक़तों की साज़िशों को समझ गए और यूनाइटेड नेशन के दोहरे करैक्टर को भी समझ गए , और फिर वो ज़ुल्म और इस्तबदाद के खिलाफ बाज़ाब्ता हम्मस की शक्ल में एक तहरीक बन गए ।
फलस्तीनियों पर ज़ुल्म के पसमंज़र में इस्राइली , सहयोनि और zionist ताक़तों को इलज़ाम देने से पहले हमको उस्मानिया दौर के हुक्मरान की बेराह रवि और दकयानूसी सोच पर भी ग़ौर करने की ज़रुरत है। जब इस दौर में मदरसों में सिर्फ क़ुरआन की रिवायती तालीम हाफ़िज़ा , और फ़िक़ह पढाई जा रही थी ,जबकि यूरोप के मदरसों और कॉलिजों में मज़हबी तालीम के साथ आला असरी तालीम , टेक्नोलॉजी और जदीद साइंस के तजर्बात की तरबियत दी जा रही थी।
एक दौर वो था जब पूरा यूरोप तालीम और टेक्नोलॉजी में तत्कालीन इस्लामी हकूमत Spain यानी (हस्पानिया ) का मरहूने मिन्नत रहा है।पूरा यूरोप तालीम और हुनर सीखने के लिए अपने नौजवानो को Spain के मदरसों में भेज रहा था ।
जैसे जैसे हस्पानिया के मुस्लिम हुक्मरान में ऐशपरस्ती बढ़ी , मज़हबी अक़ाइद कमज़ोर हुए और तालिमो हुनर से दिलचस्पी घटी ,रफ्ता रफ्ता स्पेन कमज़ोर होता गया और हालात यहाँ तक पहंचे कि पूरा स्पेन मुल्क ही मुसलमानो के हाथों से निकल गया। ऐसी ही रूदाद कमोबेश हर एक मुस्लिम मुल्क की है । हालिया 2 दशकों में इराक और लीबिया इसकी मिसालें हैं , ऐशपरस्ती उसकी बड़ी वजह रही थी। दुश्मन का तो काम है कमज़ोर करना , सवाल यह है की आप क्या कर रहे हैं ?
फलस्तीन में एक बहुत बड़े दानिश्वर , सियासी और मज़हबी रहनुमा मुफक्किरे इस्लाम और इंसानियत रहे थे मुफ़्ती अमीरुल हुसैनी जो राबिता आलमे इस्लामी के मेंबर भी थे। और यह मौलाना अली मियां नदवी और मुफ़्ती मौलाना मंज़ूर नौमानी साहब के साथियों में थे।
मौलाना अमीरुल हुसैनी बीसवीं सदी के अवाइल में यानी शुरू में जब यहूदी फलस्तीन में आबादकारी का प्लान कर रहे थे और फलस्तीनियों से महंगे दामों पर ज़मीनें खरीद रहे थे , उस दौर में मुफ़्ती अमीरुल हुसैनी वहां जाकर फलस्तीनियों को समझा रहे थे की ज़मीनें न बेचो क्योंकि यह सिर्फ ज़मीन नहीं ले रहे बल्कि यूरोप और अमेरिका यहूदियों को तुम्हारे सीने पर बिठाना चाहते हैं अपनी बला तुम्हारे सर डाल रहे हैं ।
मगर पैसे और अय्याशी के लालच में फलस्तीनियों को यह बात उस वक़्त समझ नहीं आई।और नतीजा दुनिया के सामने है। दरअसल यहूदी अपनी हरकतों की वजह से कई मुल्कों से निकाले गए , ये ज़ालिम रहे इन्होने अपने दौर के नबियों तक को क़त्ल किया। इलज़ाम तराशियाँ कीं। खुद हज़रात ईसा अलैहिस्सलाम को रोमन गवर्नर से कहकर सूली पर चढ़वाया दिया गया।।।
यह अलग बात है अल्लाह अपने नबियों या रसूलों को सूली या फांसी की मौत से मेहफ़ूज़ रखते हैं और हज़रत ईसा को भी रब ने अपने हुकुम से आसमानों में उठा लिया।।। और वो दुनिया में वापस आएंगे और मसीही दज्जाल और उसकी क़ौम का क़त्ल करेंगे ।
अक्टूबर 1973 में भी मिस्र और उर्दुन के हज़ारों मुजाहिदीन फलस्तीन की आज़ादी के लिए इज़राइल से जंग कर चुके हैं। जुनून इमानि और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का जज़्बा था उन नौजवानों में भी। वो मिस्र और उर्दुन की हुकूमतों के मुलाज़िम नहीं थे बल्कि वो बैतुल मक़्दस के तहफ़्फ़ुज़ और उसकी बाज़याबी की खातिर लड़ रहे थे। इज़राइल को पासपाई होने लगी थी।
योरोप और अमेरिका के लिए यह सियासी और मज़हबी हार थी इसलिए उस वक़्त भी अमेरिका ने इजराइल का साथ दिया और इस बार फिर जंग का आग़ाज़ अक्टूबर में ही हुआ और फिर से अमेरिका और यूरोप ने इज़राइल की मदद का ऐलान किया है।
मुस्लिम मुमालिक उस वक़्त भी इसको फलस्तीन की हार समझकर खामोश रहे और इस बार भी मुस्लिम मुल्क तक़रीबन खामोश हैं जबकि यहूदी तख्ते दाऊदी पर अपने मसीह दज्जाल को बिठाकर पूरी दुनिया पर हुकूमत करने के अपने हदफ़ को सामने रखकर तैयारी करते रहे हैं और वो आज भी अपने अहद की पासदारी केलिए कोशां और Determined हैं जबकि मुसलमान आज भी ऐश परस्ती और हुसूले दुनिया में लगे हैं ।
क्या हम्मस जंग जीत पायेगा ?
दरअसल हदीस नबवी के मुताबिक़ बैतूल मक़्दस की बाज़याबी और उसके तहफ़्फ़ुज़ की जंग Finaly मुस्लमान जीतेंगे। लेकिन पूरी दुनिया से यहूदी फलस्तीन में दरयाए नील और फुरात के बीच ऐसे ही नहीं आगये हैं बल्कि ये अपने मसीह की तलाश और इंतज़ार में 70 ईस्वी के बाद दुबारा यहाँ भेजे गए हैं।
यह किसी भी क़ीमत पर इस खित्ते को नहीं छोड़ने वाले हैं। इनकी मज़हबी किताब ज़बूर के मुताबिक़ उनका मसीहा इसी खित्ते में आएगा लिहाज़ा ये उसके इंतज़ार में हैं। ये मुसलमानो से यहाँ लड़ने के लिए ही आये हैं और इनकी हर कोशिश का हासिल मसीही दज्जाल की हुकूमत का क़याम है।
अरब का बड़ा हिस्सा मुसलमानो के हाथ से निकल जायेगा
एक बहुत सख्त और तल्ख़ बात जो में कहने जा रहा हूँ वो आसानी से हज़म होने वाली नहीं है , लेकिन वो हक़ है सच है इसलिए केहनी पड़ेगी। और वो हक़ बात यह है कि इस मलऊन और मग़ज़ूब क़ौम को जिसको हम यहूद के नाम से जानते हैं अल्लाह ने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत की बेहतरीन क़ौम यानी अरबों की तबाही के लिए बचाकर रखा है। वर्ना अपनी नाफ़रमानियों और सरकशी की सजा में क़ौमे लूत , क़ौमे आद , क़ौमे समूद , क़ौमे शोएब और दीगर क़ौमों की तरह इसको भी तबाह कर दिए होता अल्लाह ने । पेशनगोई है कि एक वक़्त आएगा जब ज़मीन इंसानी लाशों से पट जायेगी और एक परिंदा परवाज़ के दौरान थक कर गिरेगा तो लाश पर ही गिरेगा।और ये लाशें इन्ही अरबों की होंगी .
इजराइल के चारों तरफ तक़रीबन 40 करोड़ आबादी वाले अरब मुल्क अपने ऐशों और दौलत के नशे के झरोखों से फलस्तीन के मज़लूम,महकूम और मासूमों को मरते , बिलकते और सिसकते देख रहे हैं ।और ज़ालिम , जाबिर , मग़ज़ूब , मलऊन दुश्मन के साथ दोस्ती और ताल्लुक़ात की बहाली की तजवीज़ पेश की जा रही हैं। अरे इस्लामी तक़ाज़ा तो यह था की मज़लूम किसी भी मज़हबो क़ौम से हो उसकी मदद की जाए न की कुल्लू मोमिन इख़्वा के मिस्दाक़ को ऐसे बे यारो मददगार छोड़कर सुकून से तुम भी कैसे रह सकते हो ?
इतना ही नहीं बल्कि ज़ालिम के साथ दोस्तियां की जा रही हैं। तो इसी बेहिसी , बेग़ैरती , बुज़दिली , कमज़ोरी और बेईमानी के वजह से अल्लाह ने इनपर इज़राइल को अज़ाब की शक्ल में मुसल्लत किया है अरबों के लिए ।
मज़हबी किताबों की पेशीनगोई के मुताबिक़ फलस्तीन ,सीरिया , जॉर्डन , इराक ,मिस्र , तुर्किया और सऊदी अरब का बड़ा हिस्सा ये सब मुसलमानो के हाथ से निकल जायेगा। अलबत्ता मदीने में ये न घुस सकेंगे। तो यह थे वो तल्ख़ बात जिसको फिलहाल हैं करना मुश्किल है मगर यह होना है। और इजराइल जिस बड़ी जंग की तैयारी कर रहा है या कर चूका है उससे ज़्यादातर मुस्लिम देश नावाक़िफ़ हैं और अपने ऐशों में मस्त हैं। लिहाज़ा हम्मास इस जंग को जीत तो न सकेगा अलबत्ता वो ताक़तवर मुल्कों के लिए एक नज़ीर ज़रूर बनेगा की ऐसा भी हो सकता है जिसको दुनिया ने हेरानकुन हमला कहा है ।
इसके बाद यहूदियों के बारे में भी पेशनगोई सुन लें , “यहूदियों का हाल यह होगा की अगर कोई यहूदी दरख़्त के पीछे छुपा होगा तो दरख़्त कहेगा की ओ मुस्लमान मेरे पीछे यहूदी छुपा है इसको क़त्ल करदे , पत्थर कहेगा ओ मुस्लमान मेरे पीछे यहूदी छुपा है इसको क़त्ल करदे। ” तो अभी आसमान और ज़मीन को बहुत कुछ देखना बाक़ी है , मगर हम किस जमात में हैं फ़िलहाल यह देखना ज़रूरी है , इनाम वालों में हैं या ग़ज़ब और अज़ाब वालों में
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