मैं अपना ख़ून दे कर मुत्मइन हूँ, गुलिस्तां में बहार आए न आए’

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एग्ज़िट पोल पर मत जाइये, ये गोदी मीडिया का एग्ज़िट पोल है, जो वेस्ट-बंगाल, तमिलनाडु और बिहार में अपनी रुस्वाई करवा चुके हैं*

Kalimul Hafeez Politician

*लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जहाँ बहुत-सी ख़ूबियाँ हैं वहीं पर एक कमज़ोरी भी है। उसकी ख़ूबियों का ज़िक्र करें तो वो ये है कि इस निज़ाम में लोगो को अपनी पसंद की हुकूमत बनाने का इख़्तियार है, हर पाँच साल में उसे मौक़ा मिलता है, अपनी बात कहने की आज़ादी होती है, सरकार की आलोचना भी की जाती है, हालाँकि आलोचना के दरवाज़े धीरे-धीरे बन्द किये जा रहें हैं, इसके बावजूद भी इन्साफ़-पसन्द आवाज़ें उठती रहती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के अलावा दूसरी व्यवस्थाओं में ये ख़ूबियाँ नहीं हैं। लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि यहाँ वोटों के बँट जाने की वजह से अक्सरियत की पसंद के ख़िलाफ़ उम्मीदवार जीत जाता है।*

*अभी-अभी पाँच राज्यों में जो चुनाव हुए हैं, वहाँ कुल 60 से 65 प्रतिशत पोलिंग हुआ। इसका मतलब ये हुआ कि एक तिहाई लोगों ने अपनी कोई राय ही नहीं दी। डाले गए वोटों में भी अधिकतर जगहों पर तीन से अधिक उमीदवार शरीक हुए। अगर जीतने वाले को आधे वोट भी मिलेंगे तब भी वो कुल वोट का 50% से कम ही रह जाएगा। जबकि अधिकतर सीटों पर जीतनेवाले उम्मीदवार को आधे वोट से कम वोट ही हासिल होतें हैं। यह एक ऐसी ख़राबी है जो इस निज़ाम की तमाम ख़ूबियों पर पानी फेर देती है।*

 

*इस कमज़ोरी की वजह से कम तादाद में वोट लेनेवाला मेजोरिटी पर हुकूमत करता है जबकि लोकतन्त्र की स्पिरिट ये है के लोगों की मेजोरिटी की मर्ज़ी की हुकूमत बने। इस नुक्ते पर इलेक्शन कमिशन के ज़िम्मेदारों को ज़रूर तवज्जोह देनी चाहिये। कोई ऐसी कार्य योजना ज़रूर बनानी चाहिये कि 100% पोलिंग हो और जीतने के लिए कम से कम 60% वोट हासिल किये गए हों। बहुत-से देशों में इस तरह की व्यवस्था बनाई गई है। यही वजह है कि हमारा देश आबादी के अनुपात से माइनोरिटी को हुकूमत में हिस्सेदारी नहीं मिलती और वो लगातार पिछड़ेपन की तरफ़ धकेली जाती रही हैं।*

 

*अभी-अभी पाँच राज्यों के चुनाव शान्तिपूर्ण तरीक़े से हुए हैं, जिसके लिये चुनाव आयोग बधाई का पात्र है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में शान्तिपूर्ण पोलिंग करा देना किसी कमाल से कम नहीं है। कल नतीजे भी आ जाएँगे। नतीजों से पहले एग्ज़िट पोल हम सभी के सामने हैं। ज़्यादातर एग्ज़िट पोल में पंजाब में आम आदमी पार्टी और मणिपुर और उत्तर प्रदेश में बी.जे.पी स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा किया जा रहा है। आज तक ने तो यूपी में 326 सीटें तक बीजेपी की झोली में डाल दी हैं। उत्तराखंड और गोवा में काँटे की टक्कर दिखाई जा रही है। यह एग्ज़िट पोल ख़ुद गोदी मीडिया का है।*

*लेकिन कुछ अन्य एग्ज़िट पोल के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बीजेपी अपनी मौजूदा सीटों में से 100 से अधिक सीटें गँवा रही है। उदाहरण के लिये इकोनॉमिक टाइम्स, ज़ी न्यूज़ के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 246 सीटें मिलने की उम्मीद है। वहीं इंडिया न्यूज़ और इंडिया टीवी के अनुसार यह संख्या 180 से 220 तक है। न्यूज़-एक्स के अनुसार बीजेपी को केवल 211 सीटें हासिल होंगी। देशबंधु ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी गठबंधन सरकार बनाने की बात कही है। अभी ये अन्दाज़े ही हैं, फ़ाइनल नतीजों के लिये कुछ घंटे सब्र करना ही होगा। पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु के चुनावों के मौक़े पर हम एग्ज़िट पोल का हश्र देख चुके हैं। चूँकि मीडिया का 99% गोदी मीडिया है इसलिये वो वही बात बोलेगा जो उनके मालिक चाहेंगे। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और भी हो सकती है।*

 

चुनाव के नतीजे जो आएँगे वो क़ुबूल किये जाएँगे। नतीजों के बाद तमाम पार्टियाँ अपनी-अपनी समीक्षा भी करेंगी। एक-एक सीट के आँकड़े मिलेंगे। उसके बाद अगले चुनाव के लिये पॉलिसी तय की जाएगी। उत्तर-प्रदेश का चुनावी माहौल सत्ता-पक्ष के ख़िलाफ़ था, पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश समाजवादी गठबन्धन के साथ खड़ा था। मुसलमानों ने कुल हिन्द मजलिस इत्तिहादुल मुस्लेमीन को भी अपनी बेपनाह मुहब्बतों से नवाज़ा, लेकिन मुहब्बत करने के बावजूद कुछ सीटों पर उसे सिर्फ़ इसलिये वोट नहीं किया कि कहीं फिर से बीजेपी न आ जाए।*

 

*मजलिस के चुनावी जलसों में हज़ारों का मजमा शरीक हुआ, जिसने बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी को अपना सियासी लीडर तस्लीम किया, लेकिन उसने बहुत-सी जगहों पर मस्लिहत की ख़ातिर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को वोट किया। मैं उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के ख़ुलूस पर शक नहीं करता, उन्होंने मजलिस, उलेमा कौंसिल, पीस पार्टी के मुक़ाबले तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को ज़्यादा वोट किया। इसके बाद भी अगर तथाकथित सेक्युलर पार्टियाँ अपनी इज़्ज़त बचाने में नाकाम रहेंगी जिसकी उम्मीद की जा रही है, तो उनके लिये सोचने का मक़ाम होगा।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों ने जो भूमिका निभाई उस पर इत्मीनान किया जा सकता है। मजलिस की मौजूदगी से ये चुनाव मज़हब के नाम पर पोलाराइज़ नहीं हुआ। असदुद्दीन-ओवैसी साहब की तक़रीरों ने मुसलामानों के दिलों से ख़ौफ़ निकाल कर उनमें जोश, हिम्मत और हौसला पैदा किया है। उन्होंने ज़ालिमों के ख़िलाफ़ खड़े हो कर नई नस्ल को एक राह दिखाई। पीस पार्टी का साथ देकर उम्मत को इत्तिहाद का पैग़ाम दिया। दलित और ओ. बी. सी. के साथ गठबंधन करके मज़लूमों को बोलने का हौसला दिया है। ये मजलिस की बड़ी कामियाबी है। इस चुनाव से बड़ी तादाद में मुसलमानों में लीडरशिप पैदा होगी, जिसको आनेवाले दिनों में काम के लायक़ बनाया जा सकता है।

ये नताइज इंशाअल्लाह मुसलमानों को नींद से बेदार करने का काम करेंगे। उनकी आखों पर से पर्दा हटाएंगे। उन्हें इस ग़लती का अहसास कराएंगे कि काश हम अपनी लीडरशिप को मज़बूत करते, इसलिए कि जिस सेक्युलरिज़्म को मुसलमान अपने कन्धों पर उठाए फिर रहे हैं, उसे देशवासियों ने कभी का उतार कर फेंक दिया है। ये नतीजे मुस्लिम लीडर्स को मजबूर करेंगे कि वो अपने अन्दर इत्तिहाद पैदा करें और भविष्य के लिए कोई सियासी गठबन्धन का प्लेटफ़ॉर्म बनाएँ। ये नतीजे बताएँगे कि किसी भी जंग को जीतने के लिए संगठन को ढाँचा देना कितना ज़रूरी है। इसलिए कि उत्तर प्रदेश की योगी हुकूमत की तमाम नाकामियों के बावजूद अगर बीजेपी. की हुकूमत बनाती है तो ये उसके संगठन का कमाल होगा। मैं हमेशा ये बात कहता रहा हूँ कि आर. एस. एस. के कैडर का मुक़ाबला उस वक़्त तक नहीं किया जा सकता जब तब उसी तरह का कैडर मौजूद न हो।*

*उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने पिछले पाँच साल योगी जी के राज में गुज़ारे हैं। उन्हें डरने और घबराने की जरूरत नहीं है, अलबत्ता अपनी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाने के ज़रूरत है। चुने गए नुमाइंदो से अपने असल मसले हल कराने के हुनर को इस्तेमाल करने की ज़रूरत है। ज़मीर और ईमान फ़रोशी को तर्क करने की ज़रूरत है, ग़ैर-ज़िम्मेदार लोगों को मसनद, सदारत और निज़ामत से हटाने की ज़रूरत है। दुनिया दारुल-असबाब है। यहाँ अमल पर नतीजा निकलता है, मुसलमानों को अपनी हैसियत पहचानने की ज़रूरत है। वो सिर्फ़ एक क़ौम नहीं हैं, बल्कि ख़ैरे-उम्मत और दाई गरोह हैं। उनकी क़िस्मत के फ़ैसले उस पैग़ाम से जुड़े हुए हैं जिसके वो अमीन हैं, अल्लाह दिलों के हाल को जानता है, नतीजों से नियतों का फ़ैसला नहीं किया जा सकता।*

*अगर किसी ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों और मज़लूमों को सियासी लीडरशिप देने की कोशिश की थी, अपनी अनथक मेहनत के बावजूद अगर वो नाकाम होता है तब भी वो कामयाब है। आख़िरत में अल्लाह की तरफ़ से बदला सीटों की गिनती पर नहीं बल्कि नियतों के इख़्लास पर मिलेगा। नाकाम वो शख़्स नहीं जो अज़ान दे रहा था, बल्कि नाकाम वो लोग हैं जिन्होंने उसकी अज़ान के वक़्त अपने कानों में रूई ठूँस ली थी। चुनाव फिर आएँगे, अपनी ग़लतियाँ सुधारने का मौक़ा फिर मिलेगा। इसलिए मुस्लिम लीडरशिप रखने वाली सियासी जमाअतें और वो सियासी जमाअतें जो फ़ाशिज़्म के वाक़ई ख़िलाफ़ हैं उनको चाहिए कि बग़ैर रुके अपना अगला सफ़र शुरू कर दें।*

*मैं अपना ख़ून दे कर मुत्मइन हूँ।*
*गुलिस्तां में बहार आए न आए॥*

 

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