वो आईना जिसने सिहासन हिला दिया , क्या एक सच्चा पत्रकार अपने Camera से सत्ता की चूलें हिला सकता है ?
आज मीडिया में 2 धड़े हैं एक को पुचकारा जाता है दुसरे को धुतकारा जाता है किसी को समाज धुत्कातरा है उसी को सरकार पुचकारती है और किसी को समाज पुचकारता है उसको सरकार धुत्कारती है. जनता और सर्कार के बीच के फ़र्क़ को आप इस बात से भी समझ सकते हैं !!
बीजेपी जब सत्ता से बाहर थी तब रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली जैसे उनके बड़े नेता कहा करते थे के Press लोकतंत्र का पहरेदार है. अब इससे आप अंदाजा लगाएं की सियासत में बोल , वादे और जुमले कैसे बदले जाते हैं. आज कितनी विचित्र बात है सत्ताधारी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए आधार कार्ड का विरोद्ध किया फिर सत्ता में आते ही पूरे भारत की जनता के Biometrics और पहचान उनको बेच दी गई .
अब उसी आधार को जिसमें प्रत्येक नागरिक की सारी जानकारी मौजूद है उसको बिहार मतधिकार सूची के लिए अमान्य कर दिया गया जब दबाव बना तो उसको कह दिया अच्छा लेलो आधार को भी चला लो .इसी बीच सर्कार की उपलब्धियां भी हैं जैसे राम मंदिर का निर्माण , योग दिवस की स्थापना , 371 का हटाना , तीन तलाक़ बिल को लाना,वक़्फ़ क़ानून बनाना ,प्रधानमंत्री संग्रहालय, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, राष्ट्रीय पुलिस स्मारक, जलियांवाला बाग स्मारक और 11 आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय जैसे संस्थान बनाये गये.
आप कहेंगे की इससे आम जनता का क्या लाभ हुआ , तो 85 करोड़ को मुफ्त राशन से किसको फ़ायदा हुआ जनता को ही तो हुआ आप इसपर भी कहेंगे इससे तो गरीबी बढ़ेगी अब आप तो हर योजना को ही इस तरह से वोट की राजनीती से जोड़त रहोगे तो कैसे बात बनई बाबू ……
अच्छा अब आपसे ही सवाल है???? क्या देश के करोड़ों लोगों को उनके नागरिक अधिकारों से वंचित होते मूकदर्शक रहा जाए या सरकार की जनविरोधी योजनाओं के खिलाफ और देश के लोकतंत्र तथा संविधान को बचाने के लिए मैदान में आया जाए ??? स्थिति लगभग अँगरेज़ साम्राज्य के दौर की है. जो उनके मुखपत्र बने हुए थे उन में अधिकतर नवाब और राजा बनाये जा रहे थे . और जो उनके ज़ुल्म और जनविरोधी योजनाओं के ख़िलाफ़ बोल रहे थे उनको फांसी पर लटकाया जा रहा था .
एक आंकड़ा यह है 2014 से 19 तक 200 पत्रकारों पर मुक़दमे दर्ज हो चुके हैं और ये सब वो पत्रकार हैं जो सरकार से सवाल पूछते हैं या जनविरोधी योजनाओं और कारोबार में कालाबाज़ारी, मिलावट खनन माफ़िया या भूमाफ़िया के ख़िलाफ़ लिखते या बोलते हैं .मध्य प्रदेश का बहु चर्चित व्यापम घोटाला आपको याद है ?? जिसमे 40 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई जिनमें तक़रीबन 2 दर्जन पत्रकारों को भी Assasinate किया गया .
आज सच्ची और Ground पत्रकारिता को जुर्म बताया जा रहा है . बिहार के मतगणना सूची में धान्द्ली के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई अजीत अंजुम की नहीं बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व और मुल्क के भविष्य की है . सवालों की पत्रकारिता को ख़त्म करने की लगातार कोशिश है.और इसमें सरकारें Involve हैं .विडंबनात्मक है
ताज भोपाली के बक़ौल : पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर ;;;; किस्से कहें की पैर का काँटा निकाल दो
अब हाल तो यह है की देश को वापस ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ने की तरफ ले जाया जा रहा है .आप सड़क पर बिना tax दिए चल नहीं सकते …. तो ऐसे में आपकी उम्मीद अजीत अंजुम जैसे पत्रकार ही हैं जो शायद देश और जनता के पैर का काँटा निकाल सकते हैं .
बिहार मताधिकार सूची प्रकरण में अजित अंजुम के द्वारा दिखाए गए सच के खिलाफ FIR में लिखा है की वो Restricted Area में बिना Permision के गए … तो वो राष्ट्रीय सुरक्षा की हाई Level secret किसी मीटिंग को cover करने नहीं गए थे यह पब्लिक Place है लोग वहां आ रहे हैं जा रहे हैं वो भारत की किसी और हाई सिक्योरिटी जोन में नहीं गए थे BLO ने उनको बुलाया वो गए सारी बातचीत open कमरे में कर रहे हैं कोई सीक्रेट मीटिंग उन्होंने किसी अधिकारी से की सब कुछ खुला है public किया गया Videos मौजूद हैं ..उनकी ख़बर में कोई ख़ामी नहीं है उनके खुलासे में कोई ख़ला नहीं है….उनके खिलाफ FIR में कोई आधार नहीं है .
दरसल दिक़्क़त यह है की अजित अंजुम की हिम्मत कैसे हुई उस सच्चाई को दिखाने की जिसको छुपाने और बनाने में इतनी शक्ति लगाईं जा रही हो. हाँ अजित पर FIR होनी चाहिए !!! क्योंकि उसने जुर्म किया है सच को दिखाने का लोकतंत्र को बचाने का.
अजीत अंजुम जैसे सैंकड़ों नामालूम और अज्ञात पत्रकार ऐसी हिम्मत कर रहे हैं. इसलिए उन सबके खिलाफ भी FIR होनी चाहिए. उसके बाद ही तो पत्रकारिता में इंक़लाब आएगा. और ऐसा लगता है इस इंक़लाब की शुरुआत बिहार की क्रांतिकारी धरती से हो गई है .
आज आनंद वर्धन सिंह के Youtube Channel पर अजीत अंजुम की सॉलिडेरिटी में एक प्रोग्राम रखा गया जिसमें 50 से ज़्यादा पत्रकारों ने अजीत अंजुम को अपना समर्थन दिया. इस शो में महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश पोहरे ने खुलासा किया की महाराष्ट्र में रोज़ 15 किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन सरकार की सख्त हिदायत है पुलिस को के इसको Accidental मौत लिखो आत्महत्या Record पर नहीं आना चाहिए.
दरसल सियासी संरक्षण में रहकर पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता करना कायरता है. मुल्क और अवाम से बगावत है.चंद कौड़ियों और चार दिन के ऐश की ख़ातिर ग़लत को सही कहना, देश की प्रभुता और अस्मिता एकता और अखंडता, समता और सफलता से खिलवाड़ है और यह देशद्रोह है.और इसकी सजा वही होनी चाहिए जो एक मुल्क के बाग़ी की होती है. मगर विनाशकाल है इसलिए चाटुकारों को तरक़्क़ी और आलोचकों को सज़ा दी जा रही है.
एक विडंबना यह है कि निरंकुश शासक इस बात को समझ रहे हैं कि मतदाताओं में लोकतंत्र को चलाने के लिए ज़रूरी क्षमता नहीं है। नागरिक न केवल उदासीन हैं, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी भी बहुत कम है , और इसमें सच्चाई है ,अक्सर कहा जाता है, “लोकतंत्र के ख़िलाफ़ सबसे अच्छा तर्क औसत मतदाता के साथ पाँच मिनट की बातचीत है।” इसके बाद पता चल जायेगा की वो लोकतंत्र को कितना समझता है .
अजीब सी बात है जो वोटर आजतक मतदान शब्द के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज न करा सका हो (जिसका सही शब्द मताधिकार है ) और अपना मत यानी Vote दान में देकर चला आता हो तो उससे आप मज़बूत लोकतंत्र को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.
आज का वोटर नेताओं के काम से कम और करतूतों ,काव्यशैली और नाटकीय भाषा से ज़्यादा प्रभावित होता है. और जनता की इस हकीकत को नेता वर्ग भी समझ गया है . हिटलर के प्रचार प्रमुख (Publicity Head) ,,,जोसेफ गोएबल्स के मुताबिक़ – “बार-बार बोला गया झूठ सच बन जाता है”। लिहाज़ा Hitler ने इसी को अपनाया था और आजके हिटलर भी इसी को अपना रहे हैं ..इसी आधार पर Comminist thinker लेनिन की यह आंतरिक सोच थी कि जो भी Script को नियंत्रित करता है, वह जनता को नियंत्रित करता है; और जो Media को नियंत्रित करता है, वही तक़दीर का निर्माण करता है। हालांकि यह लेनिन का अपना फ़लसफ़ा हो सकता है जिससे इत्तिफ़ाक़ ज़रूरी नहीं . हकीकत कुछ और भी है ….
इसी आधार पर प्राचीन यूनानियों का भी मत था कि लोकतंत्र एक बेतुका विचार है। इसके अलावा, कोई भी व्यक्ति जो थोड़ा भी समझदार है, यह देख सकता है कि नागरिक अपने नेता चुनने में बहुत समझदार और जागरूक नहीं हैं । कहने का तातपर्य है के लोकतंत्र भी आँखें बंद करके नहीं चलता उसके लिए नागरिकों को भी जागरूक रहना पड़ता है वरना लोकतंत्र देखते ही देखते तानाशाही में बदल जाता है फिर उसका शिकार पूरा देश होता है कोई एक समुदाय वर्ग या पार्टी नहीं
हमारा मानना है एक कामयाब लोकतंत्र तभी अस्तित्व में रह सकता है जब जनता wel educated, active और हर लिहाज़ से well informed हो। ज़रा सोचिए, देश में कितने लोग सचमुच इस Catagory के हैं ?
इस बीच सरकार के सहयोगी घटक के नेता चंद्र बाबू नायडू ने चिट्ठी लिखकर Election Commision के कामों पर ऐतराज़ जताया है जिसमें कहा गया है कि ECI की ऑडिट CAG से कराई जाए इसका मतलब साफ़ है की नायडू को ECI और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की कार्यशैली पर भरोसा नहीं है.सरकार पर कितना भरोसा है इसका कोई ज़िक्र उन्होंने नहीं किया है , अलबत्ता फिलहाल नायडू पर भरोसा करना सरकार की मजबूरी है , अगर नायडू विपक्ष में होते तो शायद उनके ख़िलाफ़ भी FIR हो गई होती .
और अगर नायडू की जगह यही काम कोई पत्रकार या विपक्षी दल का कोई नेता करता तो उसको चुनाव जिहादी ,वोट जिहादी और न जाने क्या क्या कह दिया जाता.क्योंकि जो ग्रुप, संस्था, पार्टी या लोग सत्तापक्ष के जनविरोधी कामों ,योजना और नीतियों पर सवाल खड़े करें वो सब जिहादी हैं, और यह सच है वो जिहादी हैं .
क्योंकि वो देश और जनता के हितों के लिए सरकारी तंत्र के ख़िलाफ़ जद्दो जहद कर रहे हैं यानी कठिन परिश्रम मेहनत और साहस कर रहे हैं ,इसी को जिहाद और जिहादी कहते हैं .और आज अजीत अंजुम उन्ही में से एक हैं. लिहाज़ा हम और हमारी संस्था हर उस जिहादी के साथ है जो देश की अस्मिता, सम्प्रभुता एकता और अखंडता , विकास और न्याय के लिए प्रयत्नशील है.
सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं!
इल्ज़ाम चाहे जो लगा लो, हम सच कहने के आदी हैं ! जय हिन्द शुक्रिया
Times Of Pedia Times of Pedia TOP News | Breaking news | Hot News | | Latest News | Current Affairs

