कोर्ट ने कहा पुलिस ,दोषियों को बचाने की कर रही है कोशिश , इससे पहले भी कई बार पुलिस को
लगी है फटकार , लेकिन क्या फटकार इस सरकारी अपराध का समाधान है ?
दिल्ली दंगों का मामला : भले दिल्ली वासी इन दंगों के दर्द और जलते , लुटते घरों दहकती आग की लपटों के दृश्यों को भूल गए हों .
और हर भयानक लम्हों को भूलने की कोशिश करनी भी चाहिए . मगर कई माओं और परिवार वालों के लिए कुछ ऐसे ज़ख्म होते हैं जो हमेशा हरे रहते हैं .
लेकिन यह दर्द ग़ुस्से में उस वक़्त तब्दील हो जाता है जब पुलिस के संरक्षण या खुद पुलिस कर्मचारियों या अधिकारीयों द्वारा ऐसे घिनोने कृत्य किये जाते हैं . जिनसे इंसानियत शर्मसार होती है और पुलिस की साख दाव पर लग जाती है .
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को 2020 दिल्ली दंगों में मारे गए 23 साल के फ़ैज़ान की हत्या का केस केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया.
आपको बता दें इन दंगों में 53 लोगों की जान गई थी. दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़, मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे.
दंगों के बाद 2619 को गिरफ्तार किया गया था , 758 पर FIR दर्ज हुई थी जबकि 2094 ज़मानत पर बाहर आगये थे . 183 बरी हुए , 75 मामले रद्द हुए जबकि 43 को दोषी पाया गया . इसमें कितने मुसलमान कितने हिन्दू ये आंकड़ा आपको हम नहीं देंगे.
क्योंकि इससे नफ़रत का माहौल बनता है और हम इससे समाज को बचाना चाहते हैं . हालांकि पुलिस स्तर पर जो Discrimination (भेदभाव ) दिल्ली दंगोंमें देखने को मिला और दीगर कई जगह दखने को मिलता है उससे आप बखूबी परिचित हैं.
दिल्ली दंगों 53 लोग मारे गए फ़ैज़ान इनमें से एक था
दंगों के दौरान एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमे कुछ पुलिसवाले पाँच लड़कों को पीटते नज़र आ रहे थे और उन्हें राष्ट्रगान गाने के लिए दबाव डाल रहे थे . फैज़ान भी उन्ही पाँच लोगों में से एक था .
इस घटना के बाद उन्हें दिल्ली के ज्योति नगर पुलिस स्टेशन में एक दिन हिरासत में रखा गया . वहां उनके साथ क्या सुलूक हुआ होगा कोई नहीं जानता . लेकिन वहाँ से छूटने के दो दिन बाद यानी 27 फ़रवरी 2020 को फैज़ान की मौत हो गई थी.
हालाँकि, चार साल बाद भी इस केस में न तो उन पुलिस वालों की पहचान हुई है,जो इसको मार रहे थे न ही कोई Charge sheet अभी तक फ़ाइल हुई है.
घटना की निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए फै़ज़ान की माँ किस्मतुन ने 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. उन्होंने इस घटना की निष्पक्ष जाँच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) की माँग की.
मंगलवार को उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी और कहा कि इस मामले में जल्दी जांच शुरू करें. कोर्ट ने कहा, “अब तक की जाँच लापरवाह और ढीली रही है और ऐसा लगता है कि पुलिस,अभियुक्तों को बचा रही है.”
इससे पहले 2020 दंगों के कई मामलों में भी अलग-अलग अदालतों ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली की कड़ी आलोचना की थी. और पुलिस कर्मी , साफ़ तौर पर लूटमार करते और आग लगाते दंगाइयों का साथ देते वीडियो में दिखाई दे रहे हैं .
जस्टिस अनूप भंभानी की बेंच ने दिल्ली पुलिस के रवैये की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि पुलिस वालों द्वारा पाँच लड़कों को पीटना “धार्मिक कट्टरता से प्रेरित था और इसलिए ये एक ‘हेट क्राइम’ माना जाएगा” जिस पर कार्रवाई और तेज़ी से होनी चाहिए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच “उम्मीद के मुताबिक़ तेज़ी” से आगे नहीं बढ़ रही है.कोर्ट ने पुलिस के तर्कों पर भी सवाल उठाए. जस्टिस अनूप की बेंच ने कहा कि फ़ैज़ान का ख़ुद से पुलिस थाने में रुकना, जब उसके परिवार वाले उसे ढूँढ रहे थे “सामान्य आदमी के व्यवहार के विपरीत” जाता है. याद रहे पुलिस ने इस मामले में रिपोर्ट लगाई थी की मृतक फैज़ान अपनी मर्ज़ी से थाने में रुका था .
इसके अलावा कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए यह भी पूछा कि घायल फैज़ान का इलाज करवाने के बजाए थाने क्यों ले गए .
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जतायी थी कि अब तक इस पर कोई तहक़ीक़ात नहीं हुई कि जिस रात फ़ैज़ान थाने में थे, उस रात वहाँ क्या हुआ था. कोर्ट ने कहा ऐसे अहम मौक़ों पर पुलिस थाने के सारे सीसीटीवी का ख़राब हो जाना भी पुलिस की नीयत को शक में डालता है .
“अगर यह मान भी लिया जाए कि हिरासत में कोई हिंसा नहीं हुई थी तो भी यह सच है कि पुलिस ने फै़ज़ान को पुलिस स्टेशन में तब रखा जब उसे स्पष्ट रूप से गंभीर चिकित्सीय देखभाल की आवश्यकता थी. ऐसा करना ख़ुद में ही पुलिस के कर्तव्य की आपराधिक उपेक्षा थी.”
कोर्ट का कहना था कि मामले को ट्रांसफ़र करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि घटना के अभियुक्त उसी विभाग से हैं.याद रहे पुलिस इस मामले में विभागीय जांच की बात करके अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहती है .
लेकिन अदालतें इंसाफ़ के लिए वचनबद्ध होती हैं और ईश्वर की शपथ ले चुकी होती हैं .ऐसे में Court से ही पीड़ितों को इंसाफ़ की उम्मीद बची होती है .
कोर्ट ने कहा पुलिस ,दोषियों को बचाने की कर रही है कोशिश , जबकि इससे पहले भी कई बार पुलिस को उसकी ला पर्वाही या नागरिकों पर हिंसा के लिए कोर्ट की फटकार पड़ती रही है.
लेकिन क्या फटकार इस सरकारी अपराध का समाधान है ? या इंसाफ़ और क़ानून का राज स्थापित करने के लिए दोषी पुलिस वालों को उनके जुर्म के लिए सज़ा होना ज़रूरी है .
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