चौंकाने वाली रिपोर्ट,आख़िर कैसे घटी गरीबी?

Date:

सत्ता पक्ष को क्यों अपनानी पड़ी ‘विपक्षी गठबंधन’ वाली राह ; बहुत कुछ जान सकेंगे इस खबर में

 

New Delhi //हालिया दिनों में नीति आयोग की रिपोर्ट में आंकड़े चौकाने वाले आये हैं।रिपोर्ट में बताया गया है की पिछले पांच साल में पूरे देश में तकरीबन 13.5 करोड़ लोग और अकेले उत्तर प्रदेश में 3.43 करोड़ लोग Multidimensional poverty यानी बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं।

लेकिन सवाल यह है की इसके बावजूद सत्ता पक्ष को आगामी लोकसभा चुनाव में सहयोगी दलों पर निर्भरता बढ़ रही है , तो यह प्रकरण जनता के लिए विचारणीय है । भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दावा किया कि 19 जुलाई को होने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में 38 दलों की भागीदारी रहेगी। इसके सामानांतर कांग्रेस ने भी बेंगलुरु में 26 दलों को जमा कर लिया है।

बड़ा सवाल है? आखिर देश में केवल पांच साल में ही 09.89 फीसदी बहुआयामी गरीबों की संख्या होने की रिकार्ड सफलता के बाद भी सत्ता पक्ष को सहयोगियों की संख्या को लेकर इतनी बड़ी बैठक क्यों करनी पड़ रही है? कई विश्लेषकों का मानना है की इस आंकड़े की सच्चाई को जानने के लिए निजी कंपनियों को इसकी तहक़ीक़ करनी चाहिए .

हालाँकि देश में बेरोजगारी अपने शीर्ष स्तर पर है। मंहगाई, घरेलू गैस के सिलेंडर, देश में सांप्रदायिक असमानता बढ़ने, खेती-खलिहानी, सीमा पर तनाव से जुड़े तमाम गंभीर समस्याओं के बाद भी मुख्य विपक्षी दलों को एकजुटता की जरूरत क्यों पड़ रही है?

सत्ता के भूखे दलों का जमावड़ा?

बेंगलुरु में विपक्ष की बैठक को भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने सत्ता के भूखे दलों का जमावड़ा बताया है। जेपी नड्डा ने इस एकता को खोखला करार दिया । नड्डा ने कहा कि न विपक्ष के पास नेता है और न निर्णय लेने की इच्छा शक्ति। जब पटना में विपक्षी दल एकजुट हुए थे, तो इसे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने फोटो सेशन करार दिया था।

भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका सबसे बड़ा माखौल आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल का अध्यादेश पर स्टैंड और महाराष्ट्र में अजित पवार के साथ एनसीपी के नेताओं के सरकार में शामिल होने पर उड़ाया था।

टूटे गुटों का गठबंधन

सत्ता पक्ष के इस तरह मखौल उड़ाने को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने जवाब दिया है। खरगे ने जवाब में कहा कि भाजपा ऐसे 30 से अधिक दलों का कुनबा तैयार कर रही है, जिसमें पता करना चाहिए कि कौन-कौन चुनाव आयोग में राजनीतिक दल के रूप में दर्ज हैं? यह तो टूटे गुटों का गठबंधन है।

खरगे ने कहा कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने इतना शानदार काम किया है और देश में उनके मुकाबले का नेता नहीं है, तो भाजपा को 30 से अधिक दलों को जुटाने की जरूरत क्यों पड़ रही है ?

पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने कहा कि पटना में विपक्षी दलों की बैठक ने भाजपा की घबराहट और हड़बड़ी बढ़ा दी है। अब उन्हें एनडीए याद आ रहा है। एनसीपी के अनिल देशमुख कहते हैं कि थोड़ा सा और इंतजार कर लीजिए। हमारे नेता शरद पवार भी बेंगलुरु में हैं।

देशमुख ने मखौल के अंदाज़ में कहा हमें छोड़कर गए अजित पवार रोज माफी मांगने, आशीर्वाद लेने शरद जी के पास हाज़री दे रहे हैं । उन्होंने कहा कि हम ज्यादा नहीं बोलते ढोल के अंदर पोल है सब जानते हैं। अरविंद केजरीवाल से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी बैठक में अपनी अहम मौजूदगी जता रही हैं। कांग्रेस के नेता रोहन गुप्ता कहते हैं कि भाजपा का दुष्प्रचार भी सामने आ जाएगा।

इस तरह की बेचैनी घेर रही

जब सत्ताधारी राजनीतिक दल हुकूमत में रहने के बाद , जब जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते तो चुनाव नजदीक आने पर उनकी बेचैनी काफी बढ़ जाती है। और आज भाजपा को इस तरह की बेचैनी घेर रही हो।

सीएसडीएस के राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले रजनी कोठारी ने निजी अख़बार को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि व्यक्ति, राजनेता या संस्था कुछ भी हो, इतिहास हमेशा उसका पीछा करता है।उस वक़्त साये भी डराते हैं और संगठन इस डर से उसे तात्कालिक राहत देता है।

इससे प्रतीत होता है कि विपक्षी दलों की एकता बैठक में कहीं न कहीं हार की बोखलाहट और एक आहट मिल रही है। कोई भी अकेला राजनीतिक दल सत्ता पक्ष के सामने उसकी नाकामियों को नहीं रख पा रहा है।

 

2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत और 2019 में प्रचंड बहुमत दिलाने वाले मोदी और उनकी पूरी जमात को इसका एहसास है की इस बार उनकी राह आसान नहीं है और उधर राहुल गाँधी लगातार प्रधानमंत्री मोदी और उनकी विचारधारा को देश के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं . जिसका प्रभाव भी दिखाई देने लगा है . इस बार सोची समझी रणनीति के साथ एकजुट होने की भले कोशिश कर रहा है , मगर विपक्षी दलों के नेताओं के अंदर पनपने वाला स्वार्थ , मोह और कुर्सी हथ्याने वाला कीड़े को कोई त्याग और तपस्या की राजनीती करने वाले नेता मार पाने में सफल हो पायेगा यह देखना बाक़ी है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

Judaism, Zionism, and the Politics of Perception

Beyond the Narrative: Judaism, Zionism, and the Politics of...

Israeli strike damages Qatar-based Al Araby TV office in Tehran

A US–Israel strike hit a building housing the Al...

Donald Trump के ख़िलाफ़ US में भड़क उठे प्रदर्शन

Edited by Maroof Raza अमेरिका के कई बड़े शहरों में...

اسلام آباد میں مسلم ملکوں کے وزرائے خارجہ کا مشاورتی اجلاس

پاکستان کی میزبانی میں سعودی عرب، مصر اور ترکیہ...